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भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू, हिंदू पक्ष का दावा- 'कभी मस्जिद थी ही नहीं'

Updated: Mon, 06 Apr 2026 11:10 PM (IST)

धार की ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप निर्धारण पर इंदौर हाई कोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई। याचिकाकर्ता हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने कहा कि एएसआई रिपोर्ट के अनुसार भोजशाला कभी मस्जिद नहीं थी। उन्होंने मंगलवार की पूजा अनुमति में संशोधन कर 24 घंटे पूजा की मांग की।

धार भोजशाला (फाइल फोटो)

धार भोजशाला (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, इंदौर। धार की ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप के निर्धारण को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वे की रिपोर्ट पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सोमवार से नियमित सुनवाई शुरू हुई। याचिकाकर्ता हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने कहा कि भोजशाला कभी मस्जिद थी ही नहीं। यह बात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट में सामने आ चुकी है।

दो घंटे चली सुनवाई

उन्होंने सात अप्रैल 2003 के आदेश में संशोधन की मांग करते हुए कहा कि हिंदू पक्ष को सिर्फ मंगलवार को पूजा की अनुमति दी गई है। यह सही नहीं है। भोजशाला में 24 घंटे पूजा की अनुमति दी जाए और नमाज पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। सुनवाई दोपहर 2.30 से 4.30 बजे तक चली। सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी।

बताया राष्ट्रीय महत्व की धरोहर

एडवोकेट जैन ने कहा कि भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार इसके धार्मिक चरित्र के विपरीत जाकर कोई काम नहीं किया जा सकता। अगस्त 1935 से पहले तक यहां कभी नमाज नहीं पढ़ी गई। संरक्षित धरोहर होने से इसे मूल स्वरूप में बनाए रखा जाना था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और नमाज की अनुमति दे दी गई।

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1875 में लंदन ले जाई गई थीं प्रतिमाएं

एडवोकेट जैन ने अपने तर्कों के समर्थन में कई पुस्तकों का उल्लेख किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वर्ष 1875 में धार से वाग्देवी और अंबा देवी की प्रतिमाओं को लंदन ले जाया गया था। इसके बाद से वे वहां के संग्रहालय में हैं। देश के स्वतंत्र होने के बाद पुरातत्वविद् विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन जाकर इस बात की पुष्टि की थी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से इन प्रतिमाओं को वापस लाने की गुहार भी लगाई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। एडवोकेट जैन ने कहा कि हमने फोटोग्राफ प्रस्तुत किए हैं। जिनमें स्पष्ट है कि भोजशाला सरस्वती सदन, सरस्वती मंदिर था। यहां संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी। एएसआइ के सर्वे में मिले साक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं।