ताजमहल के बाद शाहजहां की मोहब्बत का एक और प्रमाण! 4x4 इंच के 'प्रेम पत्र' में महबूबा के हुस्न का ऐसा वर्णन... पढ़कर आप भी कहेंगे वाह-वाह
ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत पांडुलिपियों के संग्रहण के दौरान सामने आईं चिट्ठियां। दतिया से मिले मुगलकाल के शासकों के 15 से अधिक अति गोपनीय पत्र।

शाहजहां द्वारा फारसी में लिखा गया प्रेम पत्र।
HighLights
शाहजहां का 4x4 इंच का दुर्लभ प्रेम पत्र मिला।
पत्र में मुमताज महल के हुस्न का भावपूर्ण वर्णन है।
ज्ञान भारतम मिशन के तहत दतिया में खोजा गया।
शशिकांत तिवारी, भोपाल। ताजमहल को प्रेम की सबसे बड़ी निशानी बनाने वाले मुगल शासक शाहजहां की एक छोटी-सी फारसी पाती ने इतिहास और प्रेम की एक नई कहानी को चर्चा में ला दिया है। महज चार गुना चार इंच के इस पत्र में एक प्रिय के चेहरे पर बने खूबसूरत तिल और उसके हुस्न का बेहद भावपूर्ण वर्णन किया गया है। माना जा रहा है कि शाहजहां ने ये पंक्तियां अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल के लिए लिखी होंगी।
पत्र में लिखा है— “मेरे महबूब के चेहरे पर जो यह सुंदर तिल है, यह उसकी खूबसूरती को बयां करने वाला दूसरा सबसे बड़ा गुण है। उसके रूप और सुंदरता का यह नजारा ऐसा है, मानो कोई कुशल नाविक या कोई बड़ा उस्ताद इस हुस्न की कश्ती को चला रहा हो।”
यह दुर्लभ पत्र ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत चल रहे पांडुलिपियों के संग्रहण और सर्वेक्षण के दौरान सामने आया है। दतिया पुरातत्व विभाग के पुराविद् डॉ. वसीम खान को दतिया निवासी राधावल्लभ मिश्रा के संग्रह से ऐसे करीब 15 पुराने शाही पत्र मिले हैं। इनमें अकबर और नूरजहां से जुड़े पत्र भी शामिल बताए गए हैं।
पुरानी किताबों की दुकानों से जुटाया गया दुर्लभ संग्रह
राधावल्लभ मिश्रा लंबे समय से पुराने पत्रों और सिक्कों का संग्रह कर रहे हैं। उनके संग्रह में शामिल अधिकतर पर्चीनुमा पत्र आगरा की पुरानी किताबों की दुकानों और अन्य स्थानों से जुटाए गए हैं। इन्हीं पत्रों में शाहजहां की यह प्रेमभरी पाती भी शामिल है।
डॉ. वसीम खान के अनुसार, मुगलकाल में शाही संदेश पहुंचाने के लिए विशेष प्रजाति के कबूतरों का उपयोग किया जाता था। पत्रों को बेलनाकार ताबीज जैसी संरचना में रखकर कबूतरों के गले में बांधा जाता था। इस तरह संदेश संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाए जाते थे।

शेरो-शायरी में छिपे रहते थे गोपनीय संदेश
इन शाही पत्रों की खासियत यह थी कि इनमें सीधे शब्दों के बजाय शेरो-शायरी और सांकेतिक भाषा में गोपनीय बातें लिखी जाती थीं। कई पत्रों पर सोने की डस्ट का भी उपयोग किया गया है।
कुछ पत्र नूरजहां से संबंधित बताए गए हैं, जिनमें स्वर्ण मिश्रित स्याही से मोमबत्ती का चित्रण किया गया है। डॉ. वसीम खान के अनुसार, इस तरह की पर्चियों की पहचान उनके प्रतीकों, लेखन शैली और उन पर प्रयुक्त सामग्री से की जा सकती है।
मुगलकाल में कबूतरों से संदेश भेजने की परंपरा काफी प्रचलित थी। अबुल फजल की रचना आइन-ए-अकबरी में भी इस व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। इसी दौर में सैय्यद मोहम्मद मूसावी ने कबूतरों और संदेश व्यवस्था से जुड़ी ‘कबूतरनामा’ पुस्तक भी लिखी थी।

अकबर की पाती में दुआ और समर्पण
मिले पत्रों में अकबर से संबंधित एक पाती भी शामिल है। इसमें फारसी में लिखा गया है— ‘निगारा बर सरत ताज-ए-करम बाद’, जिसका आशय है कि आपके सिर पर हमेशा कृपा, उदारता और बड़प्पन का ताज सजा रहे।
वहीं दूसरी पंक्ति— ‘सरत मन जेर-ए-पायत दम-ब-दम बाद’ का अर्थ है कि मेरा सिर हर पल आपके चरणों में झुका रहे। पत्र की भाषा से सामने वाले व्यक्ति के सम्मान, वैभव, सलामती और खुशहाली की कामना व्यक्त की गई है।
गुलाब से शाहजहां और चौकोर निशान से अकबर की पहचान
इन पर्चियों पर बने विशेष प्रतीक यह संकेत देते थे कि पत्र किस शासक या शाही व्यक्ति से जुड़ा है। डॉ. वसीम खान के अनुसार, शाहजहां से जुड़ी पर्चियों में गुलाब का फूल बना मिलता है, जिसे उनकी पहचान और न्यायप्रियता से जोड़ा जाता है।
इसी तरह अकबर की पर्चियों पर चौकोर निशान मिलता था, जिसे फारसी में ‘उजुक’ कहा जाता था। ऐसे प्रतीक मुगल बादशाहों और शाही बेगमों की पहचान का माध्यम होते थे।
क्यों नहीं भेजे जा सके ये पत्र?
विशेषज्ञों के अनुसार, ये पर्चियां लिखे जाने के बावजूद किसी कारण से अपने गंतव्य तक नहीं भेजी जा सकीं। यही वजह है कि इनमें से कई पत्र आज भी बिना मुड़े हुए अवस्था में मिले हैं। कुछ पर्चियों को हिलाने पर उनमें लगी सोने की डस्ट साफ दिखाई देती है।
इन पत्रों को फारसी की ‘रम्ज शैली’ में लिखा गया है, जिसमें संकेतों, प्रतीकों और इशारों के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते हैं। पुराने फारसी शब्दों और इस विशेष लेखन शैली के कारण इन्हें पढ़ना आसान नहीं था।
नर्मदापुरम के पूर्व वनस्पति विज्ञान प्राध्यापक डॉ. वजाहत शाह, पुरातत्व संचालनालय के कर्मचारी इश्तियाक नूर, झांसी निवासी लतीफ और डॉ. वसीम खान ने मिलकर इन दुर्लभ पर्चियों में लिखे शब्दों और उनके भावार्थ को समझने का प्रयास किया।
छोटे आकार की इन पर्चियों में दर्ज प्रेम, दुआ, प्रतीक और रहस्यमयी भाषा अब मुगलकालीन संचार व्यवस्था और शाही जीवन के एक अनदेखे पहलू को सामने ला रही है। खासतौर पर शाहजहां से जुड़ी यह पाती इस सवाल को भी चर्चा में ले आई है कि क्या ताजमहल बनाने वाले बादशाह ने मुमताज के नाम अपने प्रेम का यह इजहार भी कागज पर उतारा था?
ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत एक से एक दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं, इनमें ये पत्र भी हैं। ये दतिया में एक व्यक्ति के पास संग्रहित हैं। कबूतरों के माध्यम से भेजे जाने वाले पत्र बहुत दुर्लभ हैं।
- मदन कुमार नागरगोजे, आयुक्त, पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार
