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MP में अब गिद्धों की दुनिया से रूबरू होंगे पर्यटक, पन्ना-रीवा समेत 5 जगह शुरू होगी ‘वल्चर वाकिंग सफारी’

By Sushil PandeyEdited By: Ravindra Soni
Updated: Wed, 12 Aug 2026 05:26 PM (IST)

मध्य प्रदेश में गिद्ध संरक्षण की सफलता के बाद अब राज्य सरकार 'वल्चर वॉकिंग सफारी' शुरू करने जा रही है। पन्ना, रीवा सहित पांच स्थानों पर पर्यटक पैदल ट्रैकिंग कर गिद्धों के प्राकृतिक आवास और पारिस्थितिकी तंत्र को करीब से देख सकेंगे।

पन्ना में चट्टान पर बैठा भारतीय गिद्धों (लॉन्ग-बिल्ड वल्चर) का एक समूह। (सौजन्य - मप्र पर्यटन मंडल)

पन्ना में चट्टान पर बैठा भारतीय गिद्धों (लॉन्ग-बिल्ड वल्चर) का एक समूह। (सौजन्य - मप्र पर्यटन मंडल)

HighLights

  1. मध्य प्रदेश में गिद्धों की संख्या बढ़कर 12,098 तक पहुंची।

  2. राज्य सरकार 'वल्चर वॉकिंग सफारी' शुरू करने की तैयारी में।

  3. पन्ना, रीवा सहित पांच स्थानों पर होगी पैदल ट्रैकिंग।

सुशील पांडेय, भोपाल। मध्य प्रदेश में गिद्ध संरक्षण की सफलता अब पर्यटन का नया आकर्षण बनने जा रही है। कभी तेजी से घट रही गिद्धों की आबादी को बचाने के लिए किए गए प्रयासों का असर अब दिखाई दे रहा है। 2016 में प्रदेश में गिद्धों की संख्या 7,028 थी, जो बढ़कर इस वर्ष 12,098 हो गई है। संरक्षण की इस उपलब्धि के बाद अब राज्य सरकार गिद्ध संरक्षण क्षेत्रों में ईको-टूरिज्म की संभावनाएं तलाश रही है।

मध्य प्रदेश पर्यटन मंडल और वन विभाग मिलकर जल्द ही ‘वल्चर वाकिंग सफारी’ शुरू करने की तैयारी में हैं। इसके तहत पर्यटक वाहनों के बजाय पैदल ट्रैकिंग करते हुए गिद्धों के प्राकृतिक आवास, उनके घोंसलों और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को करीब से देख सकेंगे।

पन्ना से गांधी सागर तक दिखेगी गिद्धों की दुनिया

प्रारंभिक तौर पर पन्ना, रीवा, शिवपुरी, ओरछा और गांधी सागर की नदी घाटियों में वल्चर वॉकिंग ट्रैक विकसित करने की योजना है। इन ट्रैक पर पर्यटकों के साथ प्रशिक्षित प्रकृतिविद और स्थानीय गाइड मौजूद रहेंगे, जो गिद्धों के व्यवहार, आवास और पर्यावरण में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी देंगे।

परियोजना में स्थानीय समुदायों को भी ईको-गाइड के रूप में जोड़े जाने की योजना है। इससे ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने के साथ संरक्षण गतिविधियों में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी।

पर्यटन मंडल के अधिकारियों के मुताबिक, स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्धों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। प्रकृति के ‘सफाईकर्मी’ माने जाने वाले ये पक्षी मृत जीवों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने में अहम योगदान देते हैं। इनके साथ ही गिद्ध बर्ड वाचिंग और वाइल्डलाइफ पर्यटन के लिहाज से भी आकर्षक हैं।

गिद्धों के साथ दिखेंगे कई वन्यजीव

जिन ट्रैक को सफारी के लिए चिह्नित किया जा रहा है, वहां गिद्धों के अलावा वन्यजीवों और शिकारी पक्षियों की कई प्रजातियां भी देखने को मिल सकती हैं। ट्रैकिंग के दौरान इंडियन ईगल आउल, सियार, लोमड़ी, जंगली बिल्ली और विभिन्न रैप्टर प्रजातियों को देखने का अवसर पर्यटकों को मिल सकता है।

चट्टानी इलाकों और नदी घाटियों से गुजरने वाले इन ट्रैक पर पर्यटक गिद्धों के प्राकृतिक आवास को करीब से समझ सकेंगे। सफारी की तारीख, मार्ग और ऑनलाइन बुकिंग से जुड़ी जानकारी जल्द सार्वजनिक किए जाने की संभावना है।

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प्रदेश में गिद्धों की सात प्रजातियां

  • भारतीय गिद्ध (लान्ग-बिल्ड वल्चर): यह स्थानीय प्रजाति है। चट्टानी पहाड़ियों और ऊंची जगहों पर घोंसले बनाता है। यह लंबी दूरी और काफी ऊंचाई तक उड़ने के लिए जाना जाता है।
  • सफेद-पीठ वाला गिद्ध (ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड वल्चर): कभी हर जगह दिखाई देने वाली आम प्रजाति थी। गिद्धों की अपेक्षाकृत सबसे छोटी प्रजातियों में से एक।
  • राज गिद्ध (लाल सिर वाला गिद्ध): सिर और गर्दन का रंग लाल होने के कारण इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। स्थानीय प्रजाति।
  • मिस्र का गिद्ध (इजिप्शियन वल्चर): प्रवासी है। आकार में अन्य बड़े गिद्धों से छोटा है और मांस के अलावा छोटे जीवों और पक्षियों के अंडे भी खाता है। यह पत्थर को औजार की तरह इस्तेमाल कर अंडे तोड़ लेता है।
  • यूरेशियन ग्रिफान: प्रवासी प्रजाति है। अक्सर सर्दियों में यहां आता है। इसकी लंबाई लगभग 95–105 सेंटीमीटर तक होती है और इसे खाते समय विशेष तरह की आवाज निकालने के लिए जाना जाता है।
  • हिमालयी गिद्ध: हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों से मध्य प्रदेश की ओर आने वाला बड़ा प्रवासी गिद्ध है। इसकी लंबाई लगभग 115–125 सेंटीमीटर तक हो सकती है और यह दुनिया के बड़े शिकारी पक्षियों में शामिल है।
  • सिनेरियस गिद्ध (ब्लैक वल्चर): बड़ी प्रवासी प्रजाति है। इसकी लंबाई 100–110 सेंटीमीटर होती है। यह सभी शिकारी पक्षियों में सबसे भारी व बड़े पक्षियों में से एक है।

वन विभाग और गिद्धों के संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था 'द लॉस्ट वल्चर ग्रुप' के साथ मिलकर हम इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य सतत पर्यटन के साथ गिद्धों के प्रति जन-जागरूकता लाना भी है। इसकी नियम-शर्तें अभी तय होना शेष हैं। प्रक्रिया पूरी होते ही सफारी शुरू कर दी जाएगी।
- डॉ. अभय अरविंद बेडेकर, अपर प्रबंध संचालक, मध्य प्रदेश पर्यटन मंडल