आयुष्मान योजना में बड़ा बदलाव: NABH नहीं तो इलाज पर रोक; भोपाल-इंदौर समेत चार शहरों के 250 अस्पतालों की बढ़ी मुश्किल
मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के तहत भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के निजी अस्पतालों के लिए 1 अक्टूबर ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।
HighLights
1 अक्टूबर से 4 शहरों में NABH प्रमाणन अनिवार्य।
करीब 250 निजी अस्पताल योजना से हो सकते हैं बाहर।
अस्पताल प्रमाणन लागत, भुगतान देरी से चिंतित।
राज्य ब्यूरो, भोपाल। आयुष्मान भारत योजना से जुड़े निजी अस्पतालों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए मध्य प्रदेश में नई व्यवस्था लागू होने जा रही है। एक अक्टूबर से भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के अनुबंधित निजी अस्पतालों के लिए नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स (NABH) का प्रमाणन जरूरी होगा। मेडिसिन पैकेज में मरीजों का इलाज करने के लिए अस्पतालों के पास अंतिम NABH प्रमाण पत्र होना अनिवार्य किया जा रहा है, जबकि अन्य पैकेज के लिए कम से कम एंट्री लेवल NABH जरूरी होगा।
स्वास्थ्य विभाग ने पहले यह शर्त एक अप्रैल से लागू करने का निर्णय लिया था, लेकिन निजी अस्पताल संचालकों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर समय देने की मांग की थी। इसके बाद अस्पतालों को छह महीने की मोहलत दी गई। अब विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि निर्धारित समय सीमा आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
250 अस्पतालों पर मंडराया खतरा
नई व्यवस्था लागू होने के बाद चारों बड़े शहरों के करीब 250 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से बाहर हो सकते हैं। हालांकि, जिन अस्पतालों में आयुष्मान के अधिक पैकेज संचालित हैं और मरीजों की संख्या ज्यादा है, उन्होंने NABH प्रमाणन की प्रक्रिया तेज कर दी है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इन अस्पतालों को तय समय के भीतर एंट्री लेवल के साथ अंतिम NABH प्रमाणन हासिल करना होगा। प्रदेश के अन्य जिलों में फिलहाल NABH को अनिवार्य नहीं किया जा रहा है। हालांकि, NABH प्रमाणन वाले अस्पतालों को योजना में संबद्धता के दौरान कुछ शर्तों में राहत दी जाएगी।
816 निजी अस्पताल योजना से जुड़े
प्रदेश में वर्तमान में 816 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से अनुबंधित हैं। इनमें 465 यानी करीब 57 प्रतिशत अस्पताल भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में हैं।
दूसरी ओर प्रदेश के करीब 90 ब्लॉक ऐसे हैं, जहां आयुष्मान योजना से एक भी निजी अस्पताल संबद्ध नहीं है। इन क्षेत्रों में मरीजों को उपचार की सुविधा प्रभावित न हो, इसलिए अस्पतालों को कुछ शर्तों में छूट देने की तैयारी है।
NABH का खर्च निजी अस्पतालों के लिए बड़ी चुनौती
निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि NABH प्रमाणन की प्रक्रिया काफी महंगी है। एक नर्सिंग होम संचालक के मुताबिक प्रमाणन के लिए करीब पांच लाख रुपये शुल्क देना पड़ता है। इसके अलावा निरीक्षण टीम के आने-जाने और ठहरने का खर्च भी अस्पताल को ही उठाना पड़ता है।
NABH के मानकों के अनुरूप अस्पताल में पर्याप्त स्टाफ, रिकॉर्ड का व्यवस्थित रखरखाव, जरूरी उपकरण और निर्धारित संख्या में बेड जैसी व्यवस्थाएं भी करनी पड़ती हैं। संचालकों के अनुसार करीब 50 बेड के अस्पताल में इन मानकों को पूरा करने पर सालाना लगभग 40 लाख रुपये तक अतिरिक्त खर्च आ सकता है।
पैकेज दरों और भुगतान में देरी को लेकर भी नाराजगी
निजी अस्पताल संचालकों का तर्क है कि कोरोना के बाद अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न सामग्रियों की कीमतें करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जबकि आयुष्मान भारत योजना के पैकेज की दरों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। कुछ पैकेज में भुगतान दर कम होने की बात भी संचालकों ने कही है।
डायलिसिस का उदाहरण देते हुए अस्पताल संचालकों का कहना है कि पहले एक साइकिल के लिए 2250 रुपये मिलते थे। अब NABH अस्पताल के लिए यह राशि 1485 रुपये और गैर-NABH अस्पताल के लिए 1350 रुपये बताई जा रही है। इसके अलावा आयुष्मान योजना के भुगतान में तीन से चार महीने तक की देरी होने का भी दावा किया जा रहा है।
निजी अस्पताल संचालकों का सवाल है कि NABH की अनिवार्यता केवल भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे चार शहरों तक सीमित क्यों रखी जा रही है। उनका कहना है कि यदि गुणवत्ता सुधारना उद्देश्य है तो पूरे प्रदेश में समान व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
कहां कितने निजी अस्पताल
भोपाल -- 228,
इंदौर -- 90
ग्वालियर -- 79
जबलपुर -- 68
एनएबीएच के अतिरिक्त भी गुणवत्ता के लिए कई विकल्प हैं। क्यूसीआइ - सीजीएचएस को विकल्प के रूप में रखा जा सकता है। एनएबीएच प्रमाणीकरण कराने के लिए अस्पताल में संसाधन बढ़ाने पड़ते हैं, जिसमें कम से कम 40 लाख रुपये प्रतिवर्ष खर्च आता है। अन्य किसी राज्य में अनिवार्यता नहीं है।
डा. संजय गुप्ता, अध्यक्ष नर्सिंग होम एसोसिएशन, भोपाल ब्रांच
