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बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही, बार-बार लगती है प्यास? AIIMS भोपाल की स्टडी में बड़ा खुलासा

Published: Sun, 23 Aug 2026 10:41 PM (IST)Updated: Sun, 23 Aug 2026 10:47 PM (IST)

एम्स भोपाल के एक देशव्यापी अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दुर्लभ किडनी रोग डिस्टल रीनल ट्यूब्यूलर एसिडोसिस (dRTA) की ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।

-प्रतीकात्मक चित्र।

HighLights

  1. दुर्लभ किडनी रोग dRTA की पहचान में देरी हानिकारक।

  2. भारतीय बच्चों में SLC4A1 जीन प्रमुख कारण पाया गया।

  3. क्षार उपचार से बच्चों की लंबाई में सुधार संभव है।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। अगर किसी बच्चे की लंबाई उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही, पैर धनुष की तरह टेढ़े हो रहे हैं या उसे बहुत ज्यादा प्यास लगती है, वह बार-बार पेशाब जाता है तो इसे सिर्फ खान-पान या पोषण की कमी न समझें। यह एक दुर्लभ आनुवंशिक किडनी रोग डिस्टल रीनल ट्यूब्यूलर एसिडोसिस हो सकता है। एम्स भोपाल के नेतृत्व में हुए देशव्यापी अध्ययन में इस बीमारी की पहचान में देरी के प्रभाव को लेकर तस्वीर अब साफ हुई है। इससे इलाज की राह भी आसान हुई है।

91 बच्चों पर किया शोध

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के सहयोग से हुए अध्ययन में एम्स भोपाल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गिरीश चंद्र भट्ट प्रधान अन्वेषक थे। उनके साथ डॉ. अरविंद बग्गा, डॉ. श्रीराम कृष्णमूर्ति, डॉ. अदिति सिन्हा, डॉ. अलीजा मित्तल, डॉ. मनीष कुमार और डॉ. नागार्जुन विजय सहित देश के कई डॉक्टर शामिल रहे। अध्ययन में वर्ष 2020 से 2024 के बीच इस बीमारी की पुष्टि वाले 91 बच्चों को शामिल किया गया। सभी बच्चों की पूरी आनुवंशिक जांच की गई। यह देखा गया कि बीमारी का कारण कौन सा जीन है और यह विदेशी बच्चों से कितना अलग है।

भारतीय बच्चों में एसएलसी4ए1 जीन सबसे प्रमुख कारण

जांच में पाया गया कि 61.5 प्रतिशत बच्चों में बीमारी जीन की खराबी के कारण थी। सबसे बड़ी बात यह रही कि भारतीय बच्चों में सबसे मुख्य कारण (51.7 प्रतिशत मामलों में) एसएलसी4ए1 नामक जीन मिला, जो विदेश में बहुत कम देखा जाता है। इसके अलावा भी कई जिम्मेदार जीन मिले। शोध में 12 नए आनुवंशिक बदलावों की भी पहचान हुई, जिससे अब जेनेटिक टेस्ट आसान होगा।

पहचान में सात साल की देरी हो रही

अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू बीमारी की पहचान में देरी का है। प्रभावित बच्चों में लक्षण औसतन 1.5 साल की उम्र में दिखे, लेकिन बीमारी की पहचान 8.8 वर्ष की उम्र में हुई। एसएलसी4ए1 जीन वाले बच्चों में तो निदान 11.3 साल और डब्ल्यूडीआर72 वालों में 15.2 साल की उम्र में हुआ। इस देरी की वजह से 75.8 प्रतिशत बच्चों की लंबाई कम रह गई। 57.1 प्रतिशत को सूखा रोग (रिकेट्स), 38.5 प्रतिशत को हड्डी टेढ़ी होने की समस्या हुई।

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इस तरह प्रभावित करती है बीमारी

डिस्टल रीनल ट्यूब्यूलर एसिडोसिस (डीआरटीए) किडनी की नलिकाओं की बीमारी है। इसमें किडनी शरीर में बन रहे अतिरिक्त हाइड्रोजन आयन को मूत्र के रास्ते पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकाल पाती। इस कारण शरीर में अम्ल जमा होने लगता है।

उपचार के बाद लंबाई में सुधार

एम्स के अध्ययन में देखा गया कि क्षार उपचार से दो साल में बच्चों की लंबाई में सुधार हुआ। लंबाई का अंतर माइनस 3.61 से घटकर माइनस 2.87 हो गया। यानी रुकी हुई लंबाई दोबारा बढ़ने लगी।

यह बीमारी दुर्लभ है लेकिन इसका इलाज सामान्य और सस्ता है। क्षार उपचार से खून का एसिड कम होता है और शारीरिक विकास फिर से शुरू होता है।
- डॉ. गिरीश चंद्र भट्ट, प्रोफेसर, बाल रोग विभाग, एम्स भोपाल