आदिवासियों के ज्ञान भंडार से मिले 37 औषधीय पौधे, जो कई रोगों के उपचार में लाभकारी
आदिवासियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले 37 औषधीय पौधों को शोध में विभिन्न रोगों के उपचार में लाभकारी पाया गया है।

आदिवासियों के पास से मिले 348 औषधीय पौधे।
शशिकांत तिवारी, भोपाल। आदिवासी सदियों से कई रोगों के शर्तिया उपचार का दावा करते रहे हैं। अब केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा कराए गए शोध से उनके ज्ञान पर वैज्ञानिक मुहर लग गई है।
भोपाल के खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद कॉलेज के चार वर्ष से अधिक समय तक चले शोध में पता चला है कि आदिवासी 348 ऐसे औषधीय पौधों का उपयोग उपचार में कर रहे हैं, जिनका उल्लेख आयुर्वेद की फार्माकोपिया में भी है। शोध की बड़ी उपलब्धि यह है कि आदिवासियों के ज्ञान भंडार में 37 ऐसे औषधीय पौधे मिले हैं, जो डायबिटीज, घाव भरने, बाल झड़ने, आर्थराइटिस, चर्म रोग सहित कई रोगों के उपचार में बहुत लाभकारी हैं।
भेजा जाएगा प्रस्ताव
शोध में प्रायोगिक और क्लीनिकल परीक्षण के बेहतर परिणाम मिलने के बाद इन 37 पौधों को फार्माकोपिया में स्थान मिलने की पूरी आशा है। इसके लिए मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से केंद्रीय आयुष मंत्रालय मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा जाएगा।
भारतीय आयुर्वेद फार्माकोपोयिया का 1989 में प्रथम भाग प्रकाशित हुआ था। इसमें अभी तक एकल द्रव्य के 733 मोनोग्राफ प्रकाशित किए जा चुके हैं। मध्य प्रदेश के चार आदिवासी बहुल जिलों डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर और शहडोल में यह शोध का कार्य किया गया है। इनमें अधिकतर गोंड और बैगा जनजाति के वैद्य हैं। आदिवासियों के पारंपरिक औषधीय ज्ञान पर यह सबसे बड़ा शोध है।
22 पौधों का तैयार हुआ मोनोग्राफ, भौतिक एवं रासायनिक मानक निर्धारित
इन 37 में से 22 औषधीय पौधों का मोनोग्राफ भी तैयार कर लिया गया है। इसमें पौधे की संरचना, विभिन्न भाषाओं में प्रचलित नाम, पहचान, सूक्ष्मदर्शीय लक्षण, रासायनिक घटक,भौतिक एवं रासायनिक मानकों को समाहित किया जाता है। किसी पौधे की जड़ तो किसी के तना, पत्ती या बीज का उपयोग उपचार में किया जाता है।
इनका उपयोग लकवा दिल की बीमारियां डायबिटीज, पीलिया, प्रसूता को ठंड से बचाने, पेट की बीमारियां, मलेरिया, टायफाइड, त्वचा संबंधी बीमारी, स्नेक बाइट, हीट स्ट्रोक, मानसिक बीमारियां, दांत के दर्द, रक्त और मुंह का कैंसर आदि बीमारियों के उपचार में आदिवासी वैद्य कर रहे हैं।
15 पौधों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलने के कारण मोनोग्राफ तैयार नहीं हो पाया। इन 37 पौधों के अतिरिक्त 24 और पौधों का उपयोग आदिवासी कैंसर, सर्पदंश जैसी कई बीमारियों के उपचार में कर रहे हैं, पर वे उनके बारे में कुछ भी बताना नहीं चाहते।
तीन औषधीय पौधों पर प्रायोगिक और पांच पर पायलट क्लीनिकल अध्ययन हुआ
कॉलेज की सह प्राध्यापक और प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर डॉ.अंजली जैन ने बताया कि जिन पौधों का मोनोग्राफ तैयार किया गया है, उनमें तीन का चूहों पर प्रायोगिक अध्ययन किया है। इनमें गोंदकतीरा या कुल्लू (स्टर्कुलिया यूरेन्स) में घाव भरने की क्षमता एलोपैथी मल्हम पोवीडोन आयोडीन से बेहतर है।
वन बरमसिया या दंडोतफला (ट्राइडेक्स प्रोकम्बेन्स ) में बालों की वृद्धि की क्षमता और चिपकी (ज़ैंथियम स्ट्रूमेरियम) में मूत्र विरेचनीय गुण, जो यूरिन इन्फेक्शन और किडनी की बीमारी में उपयोगी है।
वहीं, राजपिहरी/संजीवनी, लड़ियां या जारूल, दंडातपला, दहिमन और मीठी पत्ती मिलाकर पांच का अलग-अलग 10 से 15 रोगियों पर पायलट क्लिनिकल अध्ययन किया गया, जिसके बहुत अच्छे परिणाम मिले हैं। अब कुछ का बड़े समूह में अध्ययन किया जाएगा।
ऐसे किया शोध
सभी जिलों के लिए छह-छह फील्ड अन्वेषक नियुक्त किए गए थे। आयुर्वेदिक फार्माकोपिया को समृद्ध बनाने के लिए जनवरी 2024 में भोपाल में संगोष्ठी आयोजित की गई। तीन कार्यशालाएं कराई, जिसमें देशभर के द्रव्यगुण और औषधीय पौधों के जानकारों को बुलाया। जिन पौधों की पहचान नहीं हो पाई थी, उनके बारे में इन विशेषज्ञों ने बताया।
पंडित खुशीलाल शर्मा आयुर्वेद कालेज भोपाल के प्राचार्य डॉ. उमेश शुक्ला ने बताया कि जनजातीय वैद्य लगभग 400 से अधिक ऐसे औषधीय पौधों का उपयोग कर रहे हैं, जिनका आयुर्वेद ग्रन्थों में भी उल्लेख है। 37 ऐसे औषधीय पौधे मिले हैं, जो कई गंभीर बीमारियों के उपचार में कारगर हो सकते हैं। इनमें 22 का मोनोग्राफ तैयार कर लिया गया है। इन्हें फार्माकोपिया में स्थान मिलने की आशा है।
