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संगीत की खोई हुई विरासत... 1800 साल पुरानी सरस्वती की मूर्ति बनी चर्चा का केंद्र

Published: Wed, 26 Aug 2026 08:59 AM (IST)

नीमच में मिली 1800 साल पुरानी सरस्वती की मूर्ति, जिसमें वीणा जैसा वाद्य यंत्र है उज्जैन संग्रहालय में रखी हुई है। आज यह मूर्ति चर्चा का केंद्र है।

उज्जैन के संग्राहलय में रखी देवी सरस्वती की मूर्ति।

उज्जैन के संग्राहलय में रखी देवी सरस्वती की मूर्ति।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। बड़ा आकार, घुमावदार और हार्प जैसा वीणा... लगभग 1,800 साल पहले मालवा (प्राचीन भारतीय समुदाय) के एक मूर्तिकार ने देवी सरस्वती को एक वाद्ययंत्र दिया था। आज काले बलुआ पत्थर की वह छोटी सी मूर्ति प्राचीन भारतीय संगीत के एक दस्तावेज के रूप में सामने आई है।

1980 के दशक में नीमच के मनसा में मिली 30 x 27 x 8 सेमी. की यह मूर्ति दशकों से उज्जैन संग्रहालय में रखी है। इसे बस 78 नंबर के साथ कैटलॉग किया गया था लेकिन हाल ही में जब पुरातत्व आयुक्त मदन कुमार ने संग्रहालय का दौरा किया और क्यूरेटर योगेश पाल ने इस पर ध्यान दिलाया तो यह चर्चा में आ गई।

किया गया मूर्ति-कला संबंधी सर्वे

इसके बाद पुरातत्व विभाग ने मध्य प्रदेश के संग्रहालयों में मौजूद सरस्वती की मूर्तियों का आइकोनोग्राफिक (मूर्ति-कला संबंधी) सर्वे किया। निष्कर्ष यह निकला कि यह मूर्ति मालव काल की है और दूसरी सदी ईस्वी की है। सर्वे से यह भी पता चला कि यह मध्य प्रदेश में मिली सरस्वती की सबसे पुरानी मूर्ति है जिसमें वाद्य यंत्र (म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट) भी है।

भारतीय कला और मूर्तिकला में वीणा हमेशा से रही एक अहम हिस्सा

जाने-माने पुरातत्वविद् डॉ. रमेश यादव कहते हैं, "रोमन इतिहासकार क्विंटस कर्टियस रूफस ने लिखा है कि सिकंदर को प्राचीन मालवों से कड़ा मुकाबला करना पड़ा था। बाद में मालव दक्षिण की ओर मंदसौर इलाके में चले गए और यह मूर्ति उनके दौर की सांस्कृतिक पहचान है।"

देवी सरस्वती से ज्यादा मूर्ति ने वीणा (हार्प) पर ध्यान खींचा है। इसकी मौजूदगी ईसा पूर्व दूसरी सदी की गुफाओं से लेकर समुद्रगुप्त के सिक्कों और आज के म्यांमार तक मिलती है, जहां इसे अब भी बजाया जाता है। इसे साउंग-गौक कहा जाता है।

पुरातत्व, अभिलेखागार और संग्रहालय निदेशालय के रिसर्च ऑफिसर डॉ. धुवेंद्र सिंह जोधा समुद्रगुप्त के सोने के सिक्कों की ओर इशारा करते हैं, जिनमें उन्हें मुड़े हुए वीणा जैसे वाद्ययंत्र को बजाते हुए दिखाया गया है। ब्रिटिश म्यूजियम के अनुसार, इसका समय 330-376 ईसा माना जाता है।

ग्वालियर की राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की वाइस-चांसलर और संगीत विशेषज्ञ प्रोफेसर स्मिता सहस्रबुद्धे का कहना है कि वक्र-वीणा भारत की तार-वाद्य परंपरा की एक प्राचीन शाखा को दर्शाती है, जिसका जिक्र ऋग्वेद और बाद में भरत के नाट्यशास्त्र में मिलता है।

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