न खिलौना, न खेल! फिर क्यों 'टॉय ट्रेन' कहलाई ये रेल? अंग्रेजों के जमाने से जुड़ी है कहानी
कभी सोचा है कि पहाड़ों की ट्रेनों का नाम टॉय ट्रेन क्यों पड़ा? आइए इसकी कहानी जानते हैं।

भारत में टॉय ट्रेन शुरू होने की कहानी (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 सालों तक शासन किया और जाते-जाते वो अपना वजूद यहां छोड़ गए। फिर चाहे वो रेलवे हो, चाय-कॉफी हो, हिल स्टेशन हो, अफीम हो या अंग्रेजी भाषा। आज हम इन्हीं में से एक टॉय ट्रेन की बात करेंगे और जानेंगे कि एक ट्रेन ‘टॉय’ क्यों कहलाई और इसकी कहानी कहां से शुरू हुई।
भारत में टॉय ट्रेन शुरू होने की कहानी
भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी साल 1853 में एक क्रांति कर चुके थे, क्योंकि उनकी भारतीय रेलवे की पूरे देश में विस्तार की योजना का आगाज हो गया था। पर अभी भी समस्या का पूरी तरह से हल नहीं निकला था, भारत में कुछ इलाके पर्वतीय भी थे, जहां की आवाजाही बेहद मुश्किल थी।
यह वो दौर था जब पहाड़ों पर पहुंचना सात समंदर पार करने जितना मुश्किल था। कई बार घोड़े, कभी पालकी तो कभी पैदल निकलना ही विकल्प रह जाता था।
पहाड़ों के बीच छोटी सी रेल लाइन
ब्रिटिश इंजीनियर्स ने पहाड़ों की बीच से ही रेल लाइन निकाली, यह महज 88 किलोमीटर लंबी थी। नैरो गेज पटरियां, घुमावदार मोड़, अंधेरी सुरंगों के बीच से रास्ता, लूप और जिग-जैग, धीमी सी गति और छोटे-छोटे स्टेशन, कुछ ऐसी खूबियों के साथ टॉय ट्रेन बनाई गई थी। बताते चलें कि भारत की इस पहली टॉय ट्रेन का नाम था दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे।
सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच हुई थी शुरू
यह पहली टॉय ट्रेन 4 जुलाई 1881 को सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच शुरू हुई थी। इसे भारत की पहली पर्वतीय रेल परियोजनाओं में गिना जाता है, जिसने उस दौर में पहाड़ों में रहने वाले लोगों की यात्रा की गति को तेज, आरामदायक और सुरक्षित बनाया था। आज भी सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच यह उतनी ही शान से चल रही है।
चाय के बागान और हिल स्टेशन्स थे वजह
यहां जानने वाली बात यह है कि अंग्रेजों ने पहाड़ी लोगों की सुविधा के लिए इस ट्रेन को नहीं बनाया था। दरअसल, यह वो समय था जब ठंडे इलाकों से आने वाले अंग्रेजों को भारत की गर्मी रास नहीं आ रही थी और वो हिल स्टेशन्स का रुख कर रहे थे।
वहीं, चीन से व्यापार रुक जाने के बाद असम और दार्जिलिंग क्षेत्रों में ब्रिटिश व्यापार को बढ़ावा देने के लिए चाय के बागान लगाए थे। ऐसे में अब जरूरत थी इन मार्गों का रास्ता आसान बनाने की, इसी वजह से इन छोटी ट्रेनों का निर्माण किया गया।
टॉय ट्रेन क्यों दिया गया नाम?
अब क्योंकि इन ट्रेनों और पटरियों का आकार बहुत छोटा था, इसी वजह से स्थानीय लोगों ने इन्हें खिलौना या टॉय ट्रेन कहना शुरू कर दिया। फिर जैसे-जैसे समय बीतता गया ये रेलवे लाइंस टॉय ट्रेन के नाम से ही दुनियाभर में मशहूर हो गईं।
दार्जिलिंग टॉय ट्रेन का रूट
इसके रूट की बात करें तो इस टॉय ट्रेन का सफर न्यू जलपाईगुड़ी में समुद्र तल से करीब 100 मीटर की ऊंचाई से शुरू होता है। जो आगे जाकर दार्जिलिंग में करीब 2,200 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ाई करते हुए जाता है।
जैसे ही आप सुकना पहुंचते हैं, मौसम का मिजाज बदलने लगता है, ठंडी-ठंडी हवाएं, घने-जंगल से गुजरते हुए यह रंगटोंग पहुंचती है। यहां के ऊंचे पेड़ और शांत सा माहौल किसी भी प्रकृति प्रेमी को मंत्र मुग्ध कर सकता है।
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