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आम नृत्य नहीं है 'भूत कोला', कर्नाटक की लोक संस्कृति से है गहरा नाता; नर्तक के शरीर में देवता करते हैं प्रवेश

Published: Tue, 22 Sep 2026 05:08 PM (GMT+05:30)Updated: Wed, 23 Sep 2026 01:28 PM (GMT+05:30)

कर्नाटक का भूत कोला नृत्य वहां की लोक परंपरा से गहराई से जुड़ा है।

कर्नाटक की संस्कृति का हिस्सा है भूत कोला नृत्य (AI Generated Image)

कर्नाटक की संस्कृति का हिस्सा है भूत कोला नृत्य (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कर्नाटक की लोक संस्कृति की बात करें, तो भूत कोला का नाम लेना जरूरी है। ये एक लोक नृत्य परंपरा है, जो उडुपी और दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र में काफी प्रचलित है। ये कोई आम नृत्य नहीं है, बल्कि इसके पीछे दिलचस्प परंपरा छिपी है। 

आमतौर पर लोग भूत कोला का नाम सुनकर इसका गलत मतलब समझ लेते हैं। इसमें भूत का मतलब स्थानीय देव या पितृों से है और कोला का मतलब आराधान होता है। इसके नाम से आप समझ सकते हैं कि स्थानीय देवताओं और पितृों के आह्वान के लिए ये नृत्य किया जाता है। आइए जानें भूत कोला का इतिहास क्या है और ये कैसे किया जाता है।

भूत कोला की शुरुआत कैसे हुई?

भूल कोला का इतिहास हजारों साल पुराना माना जाता है। हालांकि, इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता। माना जाता है कि सदियों तक यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों के जरिए आगे बढ़ती आई है। पुराने समय में इंसान  जिंदा रहने के लिए सिर्फ प्रकृति पर निर्भर थे। तब जंगलों, जानवरों और पूर्वजों की आत्मा को अपना रक्षक मानकर उनकी पूजा शुरू की गई, जिसे भूत कोला कहा जाता है।  

क्यों किया जाता है भूत कोला?

मान्यता है कि पंजुरली, गुलिगा, जुमादी जैसी दिव्य आत्माएं गांव की धरती, पशुओं, फसलों और जंगलों की रक्षा करते हैं। इस खास अनुष्ठान के दौरान नर्तक को दैव नर्तक माना जाता है, जिसके शरीर में देवता प्रवेश करते हैं। गांव के आपसी विवाद, पारिवारिक झगड़े या जमीन-जायदाद से जुड़े मामले गांव वाले दैव के सामने रखते हैं और दैव जो भी फैसला करते हैं, उसे सभी को मानना पड़ता है। 

भूत कोला की खासियत क्या है?

इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत वो पल होता है, जब नर्तक एक दम स्थिर खड़ा होकर कांपने लगता है, जहां माना जाता है कि देव उसमें प्रवेश कर रहे हैं। ये रोंगटे खड़े करने वाला पल होता है। इस नृत्य की एक खासियत ये भी है कि इसे कोई पंडित नहीं, बल्कि गांव के पिछड़े वर्ग के लोग करते हैं और इस दौरान नृतक को भगवान जैसा सम्मान मिलता है, जिसके आगे गांव के सभी लोग शीश झुकाते हैं।

कैसे किया जाता है भूत कोला?

भूत कोला का आयोजन आमतौर पर शाम से शुरू होकर रातभर चलता है। गांव वाले मिलकर एक दिन चुनते हैं, जहां इसका आयोजन किया जाएगा। अनुष्ठान शुरू होने से पहले नर्तक अपना चेहरा रंगता है और उस पर खूबसूरत चित्रकारी करता है। नारियल या ताड़ के पत्तों से बनी स्कर्ट पहनी जाती है और भारी आभूषण पहनकर नर्तक तैयार होता है। 

इस नृत्य में बहुत बड़ा मुकुट भी पहना जाता है। संगीत की धुन पर नर्तक नृत्य शुरू करता है और जैसे-जैसे संगीत तेज होता है, नर्तक एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है, जहां माना जाता है कि उसमें देव प्रवेश कर रहे हैं। इसके बाद नर्तक बहुत उग्र नृत्य करता है और गांव की समस्याएं सुनकर फैसला करता है। वह गांव से जुड़ी भविष्यवाणी भी करता है।