'आलसी' नहीं, बस बाउंड्री सेट कर रहे हैं Gen-Z; पैसों से ज्यादा 'मेंटल पीस' को दे रहे तवज्जो
हमेशा से यही माना जाता रहा है कि एक अच्छी सैलरी वाली नौकरी ही सफलता की निशानी है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी, यानी Gen Z, इस सोच को बदल रही है। ...और पढ़ें

Gen-Z क्यों नकार रहे हैं टॉक्सिक कॉर्पोरेट कल्चर? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। एक समय था जब करियर में कामयाबी का सीधा मतलब सिर्फ एक शानदार सैलरी से लगाया जाता था, लेकिन नई पीढ़ी यानी Gen Z के लिए अब यह पैमाना पूरी तरह से बदल चुका है। लिंक्डइन पर एक यंग प्रोफेशनल की हालिया पोस्ट इस बात का पुख्ता सबूत है कि आज के युवा ऑफिस में पैसों से कहीं ज्यादा अपनी मानसिक शांति, सम्मान और काम के असली मायने को तरजीह दे रहे हैं।
यह पोस्ट इंटरनेट पर एक बड़ी चर्चा का विषय बन गया है, जिसमें वर्कप्लेस के माहौल और कर्मचारियों की असली जरूरतों पर खुलकर बात की गई है।

(Image Source: AI-Generated)
क्या हाई-सैलरी वाली जॉब ही सब कुछ है?
निथ्या मेनन नाम की एक प्रोफेशनल ने लिंक्डइन पर अपनी कहानी शेयर करते हुए बताया कि उन्होंने अपने चार साल के करियर में सोशल इम्पैक्ट सेक्टर, कॉर्पोरेट दुनिया और अब शिक्षा के क्षेत्र में काम किया है। अलग-अलग जगहों पर काम करने के इस तजुर्बे ने उन्हें कुछ ऐसा सिखाया, जो किसी भी कंपनी के नियम-कानूनों में नहीं लिखा होता।
निथ्या का मानना है कि युवाओं में एक बड़ा भ्रम है कि अगर सैलरी अच्छी है, तो आप सफल हैं, लेकिन वो साफ कहती हैं, "सफलता का असली मतलब यह है कि जब आप दिन खत्म होने पर पीछे मुड़कर देखें, तो आपको यह एहसास हो कि आपके काम का सच में कोई मोल था।"
कॉर्पोरेट जगत का कड़वा सच
अपने कॉर्पोरेट सफर को याद करते हुए निथ्या ने वहां के माहौल की कुछ हकीकतें सामने रखीं। उन्होंने पाया कि:
- वहां मिल-जुलकर काम करने की भावना से ज्यादा अहमियत गलाकाट प्रतिस्पर्धा को दी जाती थी।
- बेबाकी से सच बोलने वालों के बजाय, चुपचाप हर बात मान लेने वालों को इनाम मिलता था।
- अगर कोई गलत फैसलों के खिलाफ आवाज उठाता या दूसरों के लिए स्टैंड लेता, तो उसे 'जरूरत से ज्यादा जज्बाती' कहकर किनारे कर दिया जाता था।
- निथ्या के लिए यह समझना मुश्किल था कि अपने काम से गहरा लगाव होना किसी की कमजोरी कैसे हो सकता है।
क्या सच में काम से जी चुराते हैं Gen-Z?
अक्सर यह ताना मारा जाता है कि नई पीढ़ी के लोग बहुत नखरे वाले होते हैं और कड़ी मेहनत नहीं करना चाहते। निथ्या ने इस स्टीरियोटाइप का भी करारा जवाब दिया है।
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उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वाकई यह पीढ़ी कामचोर है, या फिर वे बस उस टॉक्सिक वर्क कल्चर को नकार रहे हैं जहां 'बर्नआउट' और बिना सोचे-समझे वफादारी दिखाने को महान माना जाता है। उन्होंने कहा:
- ऑफिस में अपनी ब्राउंड्रीज सेट करना कोई आलस नहीं है।
- दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाना कोई कमजोरी नहीं है।
सम्मान कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे पाने के लिए आपको सालों तक खुद को सिर्फ काम की चक्की में पीसना पड़े। यह हर कर्मचारी का बुनियादी हक है।
इंसान न समझे जाने पर छोड़ते हैं नौकरी
निथ्या का कहना है कि हर कंपनी को अपने हर एक एंप्लॉय की कद्र करनी चाहिए। स्कूलों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भले ही वहां बच्चे सबसे ऊपर होते हैं, लेकिन उन बच्चों का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों को भी यह महसूस होना चाहिए कि उनकी बात सुनी जा रही है।
अपने पोस्ट में उन्होंने एक बेहद दिल छू लेने वाली बात लिखी, "कर्मचारी सिर्फ इसलिए नौकरी नहीं छोड़ते क्योंकि काम बहुत मुश्किल है। वे तब इस्तीफा देते हैं जब उन्हें ऑफिस में एक इंसान की तरह महसूस होना बंद हो जाता है।" कंपनियों के लिए उनका मैसेज साफ है कि अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके विजन की परवाह करें, तो सबसे पहले अपने लोगों की परवाह करना शुरू करें।
सोशल मीडिया पर मिला फुल सपोर्ट
निथ्या के इस पोस्ट ने कई लोगों के दिलों को छुआ है। लिंक्डइन पर ढेरों यूजर्स ने उनकी बातों से सहमति जताई। एक व्यक्ति ने लिखा कि हम में से बहुत से मिलेनियल्स ने हालात के साथ समझौता करना और भीड़ के साथ चलना सीख लिया था, लेकिन मुझे बेहद खुशी है कि अब वर्क कल्चर को लेकर इस तरह की बातचीत खुलकर सामने आ रही है, ताकि हम धीरे-धीरे उन पुराने और घिसे-पिटे पेशेवर तौर-तरीकों को बदल सकें जिन्हें बदलने की सख्त जरूरत है।"
एक यूजर ने लिखा, "कोई भी मोटा पैकेज उस माहौल की भरपाई नहीं कर सकता, जहां लोगों को अनसुना कर दिया जाता है और उनकी परवाह नहीं की जाती। मुझे यह बात अंदर तक परेशान करती है कि हमने इस तरह की चीजों को कितना सामान्य मान लिया है।"