ऊंचाई से बच्चे को फेंकना, तो कहीं मातम मनाना; नवजात शिशु के जन्म से जुड़ी ये रस्में सुनकर पकड़ लेंगे सिर
भारत में एक जगह तो ऐसी है जहां शिशु के जन्म के समय शोक मनाते हैं।

भारत के अलग-अलग राज्यों में बच्चे के जन्म से जुड़ी कुछ अजीबो-गरीब परंपराएं (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय परिवारों में जब भी नन्हें मेहमान का वेलकम होता है तो वह महज खुशी भर नहीं होती, पूरा उत्सव होता है। उसके स्वागत में कई तरह की रस्मों और रीति-रिवाजों को अपनाया जाता है। कभी उसे बुरी नजर से बचाने के लिए काला टीका लगाते हैं तो कभी हाथों और पैरों में काला धागा बांधा जाता है।
इन सभी के बीच भारत के अलग-अलग राज्यों में कुछ अजीबो-गरीब रस्में और परंपराएं भी निभाई जाती हैं जो वाकई में हैरान-परेशान कर सकती हैं।
बेबी टॉसिंग
बच्चे के जन्म से जुड़ी एकदम भयानक लगने वाली यह प्रथा महाराष्ट्र के सोलापुर में निभाई जाती है। इसमें बच्चे को पिता 50 फीट ऊंचे टॉवर से नीचे चादर या कंबल पर फेंक देता है। जिसे नीचे खड़े ग्रामीण लोगों द्वारा सुरक्षित पकड़ लिया जाता है। इस प्रथा के पीछे की मान्यता है कि ऐसा करने से बच्चे का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है। ग्रामीण लोगों की नजर में यह एक अनुष्ठान है जो शहरी लोगों को अंधविश्वास लग सकता है।
शिशु को रेत या मिट्टी में दबाना
कर्नाटक में गुलबर्गा नाम की एक जगह है जहां नवजात शिशुओं को रेत या मिट्टी में गाड़ दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो शिशु नवजात विकलांग या किसी शारीरिक समस्या से जूझ रहे होते हैं, उन्हें सूर्य ग्रहण के दिन गर्दन के हिस्से तक गाड़ने से दिव्यांगता दूर होती है। हालांकि, इस डरावनी मान्यता को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कई बार नोटिस भी जारी किया है।
दु:ख मनाना
राजस्थान में एक जिप्सी नामक समुदाय निवास करता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि यहां बच्चे के जन्म पर खुशियां नहीं मनाई जाती, बल्कि सब मिलकर शोक मनाते हैं। इतना ही नहीं, उस शिशु को श्राप भी दिया जाता है। उस दिन घर में मातम की वजह से चूल्हा भी नहीं जलता। जबकि इसके उलट जब कोई मरता है तो खुशी मनाई जाती है। इस जनजाति के लोगों का मानना है कि जीवन एक वरदान नहीं, बल्कि एक अभिशाप है।
कर्णभेद
हिन्दू धर्म में कर्णभेद संस्कार सोलह संस्कारों में एक माना गया है। यही वजह है कि कई इलाकों में बच्चे के जन्म से 12वें या 13वें दिन कान छिदवाने की रस्म होती है। कई जगहों पर इस परंपरा को शिशु के 3 से 6 महीने के समय में भी निभाया जाता है।
