इकबाल की कविता, रवि शंकर की धुन और लता की आवाज…‘सारे जहां से अच्छा’ की ये कहानी शायद ही जानते होंगे आप
मशहूर देशभक्ति गीत 'सारे जहां से अच्छा' अल्लामा मुहम्मद इकबाल द्वारा लिखी गई एक कविता है, जिसे पंडित रवि शंकर ने धुन दी और लता मंगेशकर ने गाया। यह गीत भारत की महानता का प्रतीक है और भारतीय सेना के 'क्विक मार्च' का आधिकारिक संगीत भी है।
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देशभक्ति गीत 'सारे जहां से अच्छा' की अनसुनी कहानी (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
अल्लामा इकबाल ने 1904 में 'तराना-ए-हिंद' के रूप में लिखा
पंडित रवि शंकर ने 1945 में इसे अमर धुन दी
भारतीय सेना के 'क्विक मार्च' का आधिकारिक संगीत है
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देशभर में इस समय आजादी के जश्न की तैयारियां चल रही हैं। स्कूल-कॉलेज से लेकर ऑफिस और दफ्तरों तक, पूरे देश में इस दिन को बड़ी धूमधाम और पूरी देशभक्ति के साथ मनाया जाता है।
बात जब भी देशभक्ति की आती है, तो हमारे कानों में वंदे मातरम, ऐ मेरे वतन के लोगों जैसे गाने गूंजते हैं। लेकिन एक गाना ऐसा भी है, जिसे हम सभी ने स्कूल में जरूर गाया होगा। यह गाना भारत के महानता को बताता है और यह बताता है कि कैसे अपना देश भारत पूरी दुनिया से अलग है। आइए आज आपको बताते हैं ऐसे ही एक गाने के बारे में-
पूरे देश की आवाज बन गई एक कविता
'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, हमारा…' इस एक पंक्ति को सुनते ही हर एक भारतीय के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह यह सिर्फ एक गाना नहीं है; यह एक एहसास है, एक जज्बा है, और हमारे आजादी के संघर्ष की एक बहुत ही खूबसूरत निशानी है।
यह गाना असल में एक कविता है, जिसे मशहूर दार्शनिक और कवि अल्लामा मुहम्मद इकबाल ने लिखी थी। इसे पहली बार 16 अगस्त 1904 को 'इत्तेहाद' नाम की एक साप्ताहिक पत्रिका में छापा गया था। बेहद कम लोग जानते होंगे उस दौर में इस कविता को 'तराना-ए-हिंद' के नाम से जाना जाता था।
क्यों खास है यह गीत?
यह गीत कई मायनों में भारत के लिए बेहद खास है। सालों पहले एक कविता के रूप में लिखे गए इसके एक-एक शब्द की महानता को दर्शाते हैं। इसमें हिंदुस्तान की खूबसूरती, यहां की मिट्टी की महक और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का एक बहुत ही प्यारा पैगाम छिपा था। बाद में साल 1924 में, यह कविता इकबाल की मशहूर उर्दू किताब 'बांग-ए-दरा' (Bang-e-Dara) का हिस्सा भी बनी।
लाहौर के एक कॉलेज से लोकप्रिय हुआ गीत
बात करें इसके लोकप्रिय होने की, तो इसके लोकप्रिय होने की कहानी लाहौर के एक कॉलेज से जुड़ी हुई है। बात 1905 की है, जब इकबाल लाहौर के सरकारी कॉलेज में पढ़ाया करते थे। एक बार उनके एक छात्र, लाला हर दयाल, ने उन्हें एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए बुलाया।
इकबाल साहब ने वहां कोई लंबा-चौड़ा भाषण देने के बजाय, अपनी दमदार आवाज में यही कविता गाकर सुना दी। कॉलेज में उनके इस कविता को पढ़ने के बाद यह
रातों-रात पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का सबसे मजबूत प्रतीक बन गया। कहा जाता है कि यह गीत महात्मा गांधी को इतना पसंद था कि उन्होंने 1930 के दशक में पुणे की यरवदा जेल में बंद रहते हुए इस गीत को सौ से ज्यादा बार गाया था।
किसने सुरों में पिरोई यह कविता
आज हम इस गाने को जैसा सुनते हैं, वह हमेशा से ऐसा नहीं था। कविया के रूप में लिखे गए इस गाने की मौजूदा धुन महान संगीतकार पंडित रवि शंकर जी ने बनाई थी। साल 1945 में जब वह मुंबई में 'इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन' (IPTA) के साथ काम कर रहे थे, तब उन्होंने इस गीत को यह नई और अमर धुन दी थी।
बाद में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने भी इसे एक अलग अंदाज में गाया था। पंडित रवि शंकर द्वारा तैयार की गई जोश से भरी यह धुन इतनी मशहूर हुई कि आज भी यह हमारी भारतीय सेना के 'क्विक मार्च' (कदमताल) का आधिकारिक संगीत है।

