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श्रीराम की अयोध्या वापसी पर किया गया था दिवारी लोकनृत्य, आज भी बुंदेलखंड के पुरुष निभाते हैं परंपरा

Published: Wed, 12 Aug 2026 06:13 PM (IST)

बुंदेलखंड का प्रसिद्ध लठमार दिवारी नृत्य दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा पर शौर्य, आस्था और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम ...और पढ़ें

बुंदेलखंड का लठमार दिवारी नृत्य (Picture Credit- AI Generated)

बुंदेलखंड का लठमार दिवारी नृत्य (Picture Credit- AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लठमार होली के बारे में हर कोई जानता है, लेकिन क्या आप लठमार नृत्य के बारे में जानते हैं? अगर आप जानकर हैरान हो गए हैं, तो आपको बता दें कि ऐसा ही एक नृत्य बुंदेलखंड की मिट्टी में देखने को मिलता है। 

घुंघरुओं की मीठी छम-छम के साथ लाठियों की जोरदार तड़तड़ाहट वाला यह नृत्य बुंदेलखंड की प्रसिद्ध 'लठमार दिवारी' नृत्य है, जिसका अनुभव हर किसी को एक बार जरूर करना चाहिए। 

दीवाली के दीयों की रोशनी जब धीरे-धीरे कम होने लगती है, तब बुंदेलखंड की धरती पर ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ एक खास तरह के जश्न की शुरुआत होती है। यह कोई आम त्योहार नहीं है, बल्कि शौर्य, गहरी आस्था और लोक संस्कृति का एक अद्भुत संगम होता है, जिसे लोग 'लठमार दिवारी नृत्य' के नाम से जानते हैं।

क्या है यह अनोखा नृत्य?

यह नृत्य दीवाली के एक दिन बाद आयोजित किया जाता है, जिसमें गोवर्धन पूजा के मौके पर पूरा बुंदेलखंड अनोखे रंग में रंगा नजर आता है। गांव से लेकर शहरों तक, लोग अपनी पारंपरिक और रंग-बिरंगी पोशाकें पहनकर सड़कों पर उतरते हैं। 

इस दौरान खास आर्कषण उनके हाथों में मौजूद मोरपंख का गुच्छा और पैरों व कमर पर बंधे घुंघरू होते हैं, जो 18 से 20 लोगों की टोलियों में निकलते हैं। इन खास नर्तकों को 'मौनियां' कहा जाता है।

कैसा होता है यह नृत्य? 

यह नृत्य मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा किया जाता है। इसे करने का तरीका भी बेहद खास होता है। जैसे-जैसे ढोल की थाप तेज होती है, नर्तक पूरे जोश में आकर एक-दूसरे पर लाठियों से वार करते हुए नृत्य करते हैं। इस दौरान उनके शरीर की फुर्ती, लोच और लाठी चलाने की चतुराई काफी हद तक मार्शल आर्ट के प्रदर्शन की तरह नजर आता है। 

श्रीराम से घर वापसी का जश्न

जितना दिलचस्प यह नृत्य है, उतना ही खास इसका इतिहास है। इस नृत्य को दीवाली के बाद आयोजित करने की बड़ी वजह यह है कि इसके तार भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण से जुड़े हुए हैं। क्षेत्र के बड़े-बुजुर्गों की मानें, तो जब भगवान श्रीराम ने रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटने लगे, तो इस खुशी में चित्रकूट और बुंदेलखंड के लोगों ने पहली बार यह दिवारी नृत्य कर अपनी खुशी जाहिर की थी।

कृष्ण लीला से जुड़ा इतिहास

वहीं, इसकी एक दूसरी कहानी भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है। माना जाता है कि जब श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र का अहंकार तोड़ने और गोकुलवासियों को भयंकर बारिश से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था, तब खुशी से झूमते हुए ग्वालों ने यही नृत्य किया था। इसी पुरानी याद को ताजा रखने के लिए आज भी बुंदेलखंड के हजारों गौपालक गोवर्धन पूजा के दिन 'मौन व्रत' (चुप रखते हैं। वे हाथों में मोरपंख लेकर गायों की सेवा करते हैं और पूरे इलाके में घूम-घूम कर यह मनमोहक नृत्य करते हैं।

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