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अमीर खुसरो से जुड़ा है ‘दमादम मस्त कलंदर’ का किस्सा, आखिर कौन थे वो ‘झूलेलाल’ जिनका इसमें है जिक्र?

Published: Mon, 07 Sep 2026 04:47 PM (IST)

'दमादम मस्त कलंदर' 13 वीं सदी का वो सूफी गीत जिसकी कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।

आमिर खुसरो ने लिखा था ‘दमादम मस्त कलंदर’ (Image Source: AI Generated)

आमिर खुसरो ने लिखा था ‘दमादम मस्त कलंदर’ (Image Source: AI Generated)

HighLights

  1. अमीर खुसरो ने मूल रूप से 'दमादम मस्त कलंदर' गीत की रचना की

  2. यह सूफी कलाम बाबा लाल शाहबाज कलंदर को समर्पित है

  3. गीत में 'लाल' शब्द उनके लाल वस्त्रों से जुड़ा है

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 'लाल मेरी पत राखियो भला झूले लालण...' ये लाइंस दमादम मस्त कलंदर के गाने में आपने अक्सर सुनी होंगी, पर क्या आप इस सूफी कलाम के पीछे की कहानी जानते हैं? चलिए आज आपको पाकिस्तान से शुरू हुए इस सूफी गीत की कहानी बताते हैं कि आखिर कौन थे वो कलंदर जिनके नाम पर यह कलाम रचा गया। 

अमीर खुसरो ने लिखा था ‘दमादम मस्त कलंदर’

‘दमादम मस्त कलंदर’ गीत के रचनाकार 13 वीं शताब्दी के महान सूफी कवि अमीर खुसरो हैं। उन्होंने बाबा लाल शाहबाज कलंदर को सम्मान देते हुए इन शब्दों को गीत का रूप दिया। कहते हैं कि बाद में बाबा बुल्ले शाह ने इस गीत में पंजाबी और सिन्धी भाषा के कुछ शब्द जोड़ते हुए झूलेलाल कलंदर जैसी लाइनें भी शामिल की थी। 

क्या है इस गीत का मतलब? 

इस गीत में दमादम मस्त कलंदर का मतलब एक शख्स से है जिसकी हर सांस, हर दम में मस्ती शामिल है। इसे सरल शब्दों में समझें तो ऐसा फकीर जिसे दुनियादारी की कोई परवाह नहीं, वह अपनी ही दुनिया में मस्तमौला है। वहीं, इस गाने में बार-बार जिस ‘लाल’ शब्द का इस्तेमाल हो रहा है, वो बाबा लाल शाहबाज के लिए है क्योंकि वो हमेशा लाल कपड़ों में ही रहते थे। 

लाल के अलावा इन्हें चार यार नाम भी दिया गया, यह जुमला अक्सर आपने गानों में सुना होगा। यह नाम लाल शाहबाज कलंदर, हजरत बहाउद्दीन जकारिया, हजरत बाबा फरीदुद्दीन गंजशकर और हजरत सैय्यद जलालुद्दीन बुखारी की गहरी दोस्ती की वजह से मिला था। 

महानायक बाबा लाल शाहबाज कलंदर 

बाबा लाल शाहबाज कलंदर अमीर खसुरों द्वारा लिखित ‘मस्त कलंदर’ गीत के महानायक हैं। बताया जाता है कि उनका संबंध उस समय के पंजाब के सिंध प्रांत से था, यह हिस्सा आज पाकिस्तान में शामिल है। उनके पुरखे बगदाद से पहले ईरान के मशद आए और फिर अफगानिस्तान के मरवांद में आकर बसे, यहीं पर बाबा कलंदर का जन्म हुआ। बताते चलें कि यह दौर रूमी का भी था। 

वो देश-दुनिया में मदीना, कर्बला, सिंध, अजमेर जैसी तमाम जगहों पर यात्रा करने के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सेहवान शरीफ में बस गए थे, जहां आज भी उनकी दरगाह है। कहते हैं कि बाबा कलंदर सिंध प्रांत में रहने वाले हिंदुओं के सबसे लोकप्रिय संत झूलेलाल का ही पुनर्जन्म है। 

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