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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 29, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

बुढ़ापे में सोचने-समझने की शक्ति कमजोर होने का नया राज आया सामने, शोधकर्ताओं चूहों और इंसानों पर किया शोध

By AgencyEdited By: Mohammad Sameer
Published: Sat, 29 Jul 2023 06:57 AM (IST)

यूनिवर्सिटी आफ कोलोराडो अंसचुट्ज मेडिकल कैंपस के शोधकर्ताओं की टीम ने बुढ़े होते चूहे तथा इंसानों में इन क्रियाओं से ...और पढ़ें

बुढ़ापे में सोचने और समझने की शक्ति कमजोर होने का नया राज आया सामने।
बुढ़ापे में सोचने और समझने की शक्ति कमजोर होने का नया राज आया सामने।

HighLights

  1. शोधकर्ताओं की टीम ने बुढ़े होते चूहे तथा इंसानों में इन क्रियाओं से जुड़े मस्तिष्क के एक विशिष्ट प्रोटीन सीएएमके II की खोज की है।
  2. ‘साइंस सिग्नलिंग’ में प्रकाशित हुआ अध्ययन।

न्यूयार्क, एजेंसी: बुढ़ापे में सोचन-समझने की शक्ति कमजोर होने को लेकर हुए अध्ययनों अलग-अलग कारक बताए गए हैं। अब एक नए अध्ययन में विज्ञानियों ने एक ऐसे कारक का पता लगाया है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि उम्र बढ़ने के साथ संज्ञानात्मक ह्रास में इसकी केंद्रीय भूमिका होती है।

आमतौर पर बताया जाता है कि नार्मल एजिंग की प्रक्रिया में स्मरण और भाषा की प्रोसेसिंग तथा आंखों की रोशनी का कमजोर होने लगती है। इसके साथ ही कुछ लोगों में सोचने तथा सूचना संप्रेषण में शब्द तलाशने में कठिनाई और ध्यान केंद्रित करने में भी परेशानी होती है।

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शोधकर्ताओं की टीम ने की खोज

यूनिवर्सिटी आफ कोलोराडो अंसचुट्ज मेडिकल कैंपस के शोधकर्ताओं की टीम ने बुढ़े होते चूहे तथा इंसानों में इन क्रियाओं से जुड़े मस्तिष्क के एक विशिष्ट प्रोटीन सीएएमके II की खोज की है। यूनिवर्सिटी के स्कूल आफ मेडिसिन में फार्माकोलाजी के प्रोफेसर उल्ली बायर ने बताया कि इस प्रोटीन का मिस-रेगुलेशन स्मरण तथा सीखने की क्रिया के लिए काफी अहम होता है।

‘साइंस सिग्नलिंग’ में प्रकाशित हुआ अध्ययन

‘साइंस सिग्नलिंग’ नामक जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन आलेख में बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने चूहों के माडल पर किए प्रयोग में सीएएमके II में बदलाव करने पर वैसा ही असर पाया, जैसा कि सामान्य बुढ़ापे (नार्मल एजिंग) में होता है।

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बायर ने बताया कि बुढ़ाते चूहों तथा इंसानों में एक प्रक्रिया, जिसे एस-नाइट्रोसाइलेशन कहते हैं- धीमी हो जाती है, जिससे मस्तिष्क प्रोटीन सीएएमके-2 में भी बदलाव होता है। इस अध्ययन से यह भी सामने आया है कि सीएएमके-2 में यह बदलाव और कमी सिनैप्टिक प्लास्टिसिटी और स्मृति को कमजोर करने के लिए पर्याप्त है, जैसा कि बुढ़ापे में होता है। बायर का कहना कि इस शोध से ऐसी दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा, जिससे कि इस विशिष्ट प्रोटीन के नाइट्रोसाइलेशन को सामान्य कर सकती हैं।

हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि यह सिर्फ उम्र संबंधी संज्ञानात्मक ह्रास को रोकने में कारगर हो सकता है, न कि अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसे रोगों के लिए प्रभावी उपचार साबित हो सकता है।