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    पेरेंट्स अलर्ट! बच्चों का पेट भर रहा है जंक फूड, लेकिन दिमाग को कर रहा है अंदर से खोखला

    Updated: Tue, 09 Jun 2026 05:00 PM (IST)

    जंक फूड खाने से बच्चों की शारीरिक और मानसिक सेहत पर बहुत खराब असर पड़ता है। इससे बच्चों के शरीर में केवल कैलोरी जाती है, जबकि वे अनेक पोषक तत्वों से व ...और पढ़ें

    बच्चों के स्वास्थ्य पर जंक फूड का गहरा असर (Picture Credit- AI Generated)

    बच्चों के स्वास्थ्य पर जंक फूड का गहरा असर (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. जंक फूड बच्चों में मोटापा और डायबिटीज बढ़ाता है

    2. यह मानसिक एकाग्रता और व्यवहार को प्रभावित करता है

    3. किशोरियों में हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकता है

    दिनेश दीक्षित, नई दिल्ली। पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, कैंडी, पैकेट वाले विभिन्न प्रकार के स्नैक्स और इंस्टैंट नूडल्स जैसे खाद्य पदार्थ बच्चों को स्वादिष्ट और आकर्षक लगते हैं, लेकिन इनके नियमित सेवन से उनकी शारीरिक एवं मानसिक सेहत पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

    वैज्ञानिक शोधों से यह स्पष्ट है कि जंक फूड केवल मोटापे का कारण नहीं बनता, बल्कि बच्चों के संपूर्ण विकास को भी प्रभावित करता है। जंक फूड में सामान्यतः अधिक मात्रा में कैलोरी, चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा (सैचुरेटेड एवं ट्रांस फैट) होते हैं, जबकि इसमें प्रोटीन, विटामिंस, खनिज तत्व, फाइबर और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होती है। यही कारण है कि ऐसे खाद्य पदार्थ पेट तो भर देते हैं, लेकिन शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते।

    मोटापा और डायबिटीज जैसी बीमारियों की शुरुआत

    डॉ. शुभदा भनोत (चीफ डायबिटीज एजुकेटर, मैक्स हेल्थकेयर, नई दिल्ली) बताती हैं कि बच्चों की शारीरिक सेहत पर इसका सबसे प्रमुख प्रभाव मोटापे के रूप में दिखाई देता है। जब बच्चे नियमित रूप से अधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ खाते हैं और शारीरिक गतिविधि कम करते हैं तो शरीर में अतिरिक्त वसा जमा होने लगती है। बचपन का मोटापा आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर, हृदय रोग और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा देता है।

    सके अतिरिक्त, अधिक चीनी और अम्लीय पेय पदार्थों के सेवन से दांतों और मसूड़ों की समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। जंक फूड का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों की मानसिक सेहत और मस्तिष्क के विकास को भी प्रभावित करता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि अत्यधिक प्रसंस्करित (प्रोसेस्ड) खाद्य पदार्थों का सेवन बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कम कर सकता है। इससे बच्चों में चिड़चिड़ापन, थकान, मूड में बदलाव और एकाग्रता की कमी देखी जाती है। कुछ शोध यह भी बताते हैं कि इससे बच्चों में चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

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    खानपान की आदतें प्रभावित करती हैं जीवन

    अत्यधिक नमक, चीनी और अधिक वसा वाले खाद्य पदार्थ खाने से उनकी स्वाद संबंधी पसंद बदल जाती है। परिणामस्वरूप वे फल, सब्जियां, दालें, दूध और घर का पौष्टिक भोजन कम पसंद करने लगते हैं। यह स्थिति दीर्घकाल में पोषण की कमी, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और विकास संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकती है।

    कई बच्चों में आयरन, कैल्शियम, विटामिन डी और बी-विटामिन की कमी भी देखने को मिलती है, जो उनके शारीरिक और बौद्धिक विकास को प्रभावित करती है। आगे चलकर जंक फूड की आदतें वयस्क जीवन तक बनी रह सकती हैं। बचपन में विकसित होने वाली खानपान की आदतें अक्सर जीवनभर साथ रहती हैं। यदि बच्चों को कम उम्र से ही अस्वास्थ्यकर भोजन की आदत पड़ जाए तो भविष्य में बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।

    समझनी होगी जिम्मेदारी

    इन समस्याओं से बचने के लिए माता-पिता, विद्यालयों और समाज सभी की महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। बच्चों को बचपन से ही संतुलित आहार के महत्व के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। घर में फल, सलाद, अंकुरित अनाज, दालें, दूध, दही, मेवे और पारंपरिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोल्ड ड्रिंक्स की जगह नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और ताजे फलों के पेय दिए जा सकते हैं। बच्चों के स्क्रीन टाइम को भी सीमित करना और उन्हें नियमित खेलकूद तथा शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है।

    हार्मोंस असंतुलन का कारण

    किशोरियों में जंक फूड का बढ़ता सेवन हार्मोनल स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अधिक चीनी, परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट और अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ावा देता है, जो आगे चलकर पीएमओएस के जोखिम को बढ़ा सकता है। यह केवल अंडाशय (ओवरी) की समस्या नहीं, बल्कि एक जटिल हार्मोनल, मेटाबालिक और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी विकार है।

    इससे अनियमित मासिक धर्म, वजन बढ़ना, मुंहासे, अत्यधिक बाल आना, इंसुलिन प्रतिरोध और भविष्य में प्रजनन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। बचपन और किशोरावस्था में स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली अपनाना अत्यंत आवश्यक है ताकि भविष्य में ऐसे हार्मोनल एवं मेटाबालिक विकारों के जोखिम को कम किया जा सके।