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दूध उबलकर जला और इतिहास बन गया! कैसे एक 'भूल' से मथुरा का पेड़ा बना पहली बार, पढ़ें यह दिलचस्प कहानी

Published: Wed, 02 Sep 2026 07:00 AM (IST)

मथुरा के पेड़े की कहानी ऐतिहासिक कम और पौराणिक ज्यादा महत्व रखती है।

मैया यशोदा ने बनाए थे सबसे पहले पेड़े (Image Source: AI Generated)

मैया यशोदा ने बनाए थे सबसे पहले पेड़े (Image Source: AI Generated)

HighLights

  1. यशोदा मैया ने गलती से बनाए थे पहले पेड़े

  2. 18वीं सदी की पांडुलिपियों में मिलता है पेड़े का जिक्र

  3. महारानी विक्टोरिया को भी पसंद थे मथुरा के पेड़े

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भगवान कृष्ण के दर्शन करने आप मथुरा जाएं और वहां से पेड़े न लेकर आएं तो आपकी यात्रा अधूरी ही है। ये कृष्ण जन्मस्थली की खास पहचान हैं, क्योंकि यहां की हर गली में खास पेड़े मिल रहे हैं। वो भी अपने-अपने  स्वाद और वैरायटी के साथ, कोई कम मीठा, कोई ज्यादा खोए वाला तो कोई शुद्ध देसी घी से बना। 

ऐसे में आइए आपको मथुरा के पेड़े का प्राचीन इतिहास बतलाते हैं कि आखिर कैसे यह कान्हा की नगरी के खास पहचान बन गए।  

मैया यशोदा ने बनाए थे सबसे पहले पेड़े 

मथुरा के मशहूर पेड़े से जुड़ा कोई प्रामाणिक इतिहास तो नहीं बताया जाता लेकिन इसके पीछे पौराणिक कहानी जरूर है। कहते हैं यशोदा मैया ने कन्हैया के लिए गलती से पेड़ा बनाया था। एक बार यशोदा मां ने दूध उबालने के लिए रखा, लेकिन वो इसे आंच पर रखकर भूल गईं। कुछ देर बाद जब वो वापिस आईं तो उन्होंने देखा कि दूध उबलकर बहुत गाढ़ा हो गया है। 

यशोदा मां ने इस गाढ़े दूध में चीनी मिलाई और इसको पेड़े का आकार देकर अपने कान्हा को खिला दिया। मां के हाथ की बनी इस मिठाई का स्वाद भगवान कृष्ण को इतना पसंद आया कि वो इसे बड़े चाव से खाने लगे। कहा जाता है कि इसी वजह से भगवान कृष्ण को भोग में पेड़े चढ़ाए जाते हैं। 

पेड़े कैसे बने मथुरा की पहचान? 

इतिहासकारों की माने तो मथुरा के पेड़े का जिक्र 18वीं शतबादी की एक पांडुलिपि अकलनामा चक्कता में है। इस तथ्य से यह साबित होता है कि मथुरा का पेड़ा 18 वीं सदी से पहले ही बनता आ रहा है। 

महारानी विक्टोरिया का भी पसंदीदा था पेड़ा 

कहा जाता है जब 1857 की क्रांति के बाद जब भारत का शासन पूरी तरह से ब्रिटेन के हाथों में आ गया, तब 1860 के दौर में वडोदरा में एक मशहूर पेड़े की दुकान खुली। यह दुकान मथुरा से आए दो भाइयों ने खोली थी। यहां के पेड़े सबसे पहले वडोदरा के गायकवाड़ राजघराने तक पहुंचे। दरअसल, किस्सा कुछ ऐसा है कि महाराजा खंडेराव गायकवाड़ द्वितीय का हाथी इस दुकान पर रुक गया। वह तब तक इस दुकान के सामने से नहीं हिला जब तक उसने पेड़े का स्वाद नहीं चख लिया। 

इसके बाद महाराजा ने पेड़े का स्वाद ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को चखाया। इसके बाद ये पेड़े महारानी के फेवरेट बन आगे और उनके शाही भोज में भी शामिल किए जाने लगे।