कभी कलाई की शान थी HMT घड़ी, फिर क्यों थम गई सुईयां? पढ़ें कहां गुम हुई 'देश की धड़कन'
HMT घड़ी कभी भारतीय कलाई की शान थी, जो शादियों और तोहफों में पहली पसंद मानी जाती थी। 1961 में शुरू हुई यह कंपनी तीन दशकों तक बाजार पर छाई रही। हालांकि ...और पढ़ें

HMT घड़ी: भारत की 'देश की धड़कन' का स्वर्णिम अतीत और पतन की कहानी (Picture Credit- Instagram)
HighLights
HMT घड़ी 90 के दशक में भारतीय शान का प्रतीक थी।
1961 में शुरू होकर तीन दशक तक बाजार पर राज किया।
तकनीकी बदलाव न अपनाने से HMT का पतन हुआ।
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के डिजिटल दौर में वक्त देखने के लिए कलाई पर घड़ी बांधने की जरूरत कम ही पड़ती है, क्योंकि यह काम अब मोबाइल फोन ही कर देता है। हालांकि, बाजार में स्मार्टवॉच और एनालॉग घड़ियों का चलन जरूर बढ़ा है, लेकिन घड़ियों का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है।
एक वक्त ऐसा भी था जब भारत में 'घड़ी' का मतलब सिर्फ और सिर्फ 'HMT' हुआ करता था। 90 के दशक में पली-बढ़ी पीढ़ी यानी मिलेनियल्स आज भी उस दौर को याद करती है, जब HMT कलाई पर होना शान की बात मानी जाती थी।
शादियों और तोहफों की पहली पसंद
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जी हां, यह वो दौर था जब एचएमटी सिर्फ समय बताने वाली मशीन नहीं, बल्कि एक भावना हुआ करती थी। बच्चों के परीक्षा पास करने पर मिलने वाला इनाम हो या शादी में दूल्हे को दिया जाने वाला शगुन- एचएमटी घड़ी ही हर जगह पहली पसंद होती थी। यहां तक कि नौकरी से रिटायर होने पर सम्मान के रूप में भी यही घड़ी गिफ्ट की जाती थी।
अगर आप 90 के दशक की शादियों के पुराने एल्बम उठाकर देखेंगे, तो ज्यादातर लोगों की कलाई पर आपको एचएमटी ही नजर आएगी। आज यह ब्रांड भले ही इतिहास बन गया हो, लेकिन इसकी यादें अब भी ताजा हैं।
कैसे हुई थी शुरुआत?
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एचएमटी (हिंदुस्तान मशीन टूल्स) का सफर साल 1961 में शुरू हुआ था। इसकी स्थापना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर की गई थी। दरअसल, उस समय जापानी कंपनी 'सिटिजन वॉच' (Citizen Watch) के सहयोग से भारत में इसका उत्पादन शुरू हुआ।
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बस फिर क्या था 70 और 80 के दशक में एचएमटी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। 1970 में आए 'सोना' और 'विजय' जैसे मॉडलों ने बाजार में धूम मचा दी थी और लोगों का इस ब्रांड पर अटूट भरोसा कायम हो गया था।
तीन दशक तक किया राज
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एचएमटी ने भारतीय घड़ी बाजार पर करीब 30 सालों तक राज किया। इसकी टैगलाइन 'देश की धड़कन' ने इसे घर-घर में लोकप्रिय बना दिया था। साल 1991 तक इस ब्रांड को टक्कर देने वाला कोई नहीं था, लेकिन 1993 में उदारीकरण के बाद जब भारतीय बाजार दुनिया के लिए खुले, तो एचएमटी की सत्ता डगमगाने लगी।
क्यों थम गई 'देश की धड़कन'?
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बदलते समय के साथ आगे बढ़ने के लिए खुद को बदलना भी जरूरी है। हालांकि, ऐसा न करना ही एचएमटी के पिछड़ने की मुख्य वजह बना। 80 के दशक के अंत में जब टाटा की 'टाइटन' जैसी कंपनियों ने क्वार्ट्ज घड़ियों और नए डिजाइन्स के साथ बाजार में कदम रखा, तो एचएमटी पुरानी लगने लगी।
एचएमटी घड़ी को सिर्फ 'वक्त देखने की मशीन' मानती रही, जबकि नई कंपनियों ने घड़ी को 'फैशन स्टेटमेंट' बना दिया। डिजाइन और तकनीक में बदलाव न कर पाने के कारण कंपनी लगातार घाटे में जाने लगी और अंततः सरकार को इस प्रतिष्ठित ब्रांड को बंद करने का कड़ा फैसला लेना पड़ा।