लोहरदगा का ऐतिहासिक रथ मेला 16 जुलाई से: जानें 162 साल पुरानी परंपरा और 'मधुबन' से 'भंडरा' बनने की कहानी
लोहरदगा के भंडरा प्रखंड में 16 जुलाई से नौ दिवसीय ऐतिहासिक रथ मेला शुरू होने जा रहा है। यह 162 साल पुरानी परंपरा है, जहां भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घ ...और पढ़ें

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HighLights
162 साल पुरानी है भगवान जगन्नाथ की परंपरा।
'मधुबन' गांव से 'भंडरा' बनने का ऐतिहासिक सफर।
संवाद सूत्र, भंडरा (लोहरदगा)। झारखंड के लोहरदगा जिला अंतर्गत भंडरा प्रखंड में ऐतिहासिक नौ दिवसीय रथ मेला 16 जुलाई से शुरू होने जा रहा है।
इस पारंपरिक रथ यात्रा का इतिहास करीब 162 वर्ष पुराना है, जो क्षेत्र की गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को जीवंत रूप में प्रदर्शित करता है।
इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (मौसीबाड़ी) प्रस्थान करेंगे।
महाप्रभु के दर्शन और रथ खींचने के लिए हर साल दूर-दूर से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। नौ दिनों तक चलने वाला यह मेला धार्मिक आस्था का केंद्र है। साथ ही, सौहार्द और सांस्कृतिक मिलन का भी एक बड़ा प्रतीक माना जाता है।
रथ यात्रा का गौरवशाली इतिहास
इस ऐतिहासिक रथ यात्रा की शुरुआत वर्ष 1864 में भंडरा के तत्कालीन पुरोहित गोविंद राम ज्योतिषी द्वारा की गई थी। उन्होंने ही पहली बार भव्य रथ का निर्माण करवाकर इस पावन परंपरा का शुभारंभ किया था।
शुरुआत के दिनों में भगवान जगन्नाथ की यह रथ यात्रा भंडरा मिडिल स्कूल परिसर में स्थित ठाकुरबाड़ी से निकलती थी और भंडरा थाना के समीप स्थित एक झोपड़ीनुमा मौसीबाड़ी तक जाती थी, जहां भगवान नौ दिनों तक विश्राम करते थे।
समय के साथ आए भौगोलिक और सांस्कृतिक बदलाव
पीढ़ियों के गुजरने के साथ इस परंपरा में कई महत्वपूर्ण और सकारात्मक बदलाव आए। विक्रम संवत 2009 में थाना परिसर स्थित पुरानी मौसीबाड़ी को ठाकुरबाड़ी का रूप दे दिया गया।
इसके बाद, भगवान के विश्राम के लिए अखिलेश्वर धाम में एक नई मौसीबाड़ी का भव्य निर्माण कराया गया। इस बदलाव के साथ ही भगवान जगन्नाथ महाप्रभु, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के दो-दो अन्य विग्रहों (मूर्तियों) को भी यात्रा में शामिल किया गया।
तब से मिडिल स्कूल ठाकुरबाड़ी से अखिलेश्वर धाम स्थित नई मौसीबाड़ी तक रथ ले जाने की नई परंपरा शुरू हुई, जो आज भी अनवरत जारी है।
'मधुबन' से 'भंडरा' बनने का ऐतिहासिक सफर
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि वर्ष 1864 में इस पूरे क्षेत्र को 'मधुबन गांव' के नाम से जाना जाता था। बाद में इस ऐतिहासिक गांव का नाम बदलकर 'भंडरा' रख दिया गया, जो आज पूरे लोहरदगा जिले में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान रखता है।
पीढ़ियों से संभाली जा रही है विरासत
भंडरा में इस रथ यात्रा को सुचारू रूप से चलाने और सहेजने की जिम्मेदारी भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। वर्ष 1864 में पुरोहित गोविंद राम ज्योतिषी के बाद इस रथ यात्रा को चलाने का उत्तरदायित्व ब्रज किशोर राम पुरोहित ने संभाला।
उनके बाद उनके वंशज जगनिवास शर्मा ने इस समृद्ध विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया। जगनिवास शर्मा के निधन के बाद वर्तमान में उनके पुत्र पुरोहित राधा मोहन शर्मा, किशोरी मोहन शर्मा और ईश्वरी मोहन शर्मा अपने पूर्वजों की इस पावन परंपरा को बखूबी निभा रहे हैं।