पहचान की आड़ में रसूख का खेल: जमशेदपुर के ट्रस्टों में करोड़ों की संपत्ति को लेकर क्यों मचा है घमासान
जमशेदपुर के ऐतिहासिक सामाजिक संगठन, जो कभी बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने का प्रतीक थे, अब करोड़ों की संपत्ति और स्थायी निधि पर वर्चस्व की लड़ाई में उलझ गए ...और पढ़ें

सामाजिक संगठनों में करोड़ों-अरबों रुपये की परिसंपत्तियों पर वर्चस्व और स्थायी निधि के नियंत्रण की जंग छिड़ गई है।
HighLights
सामाजिक संगठनों में करोड़ों की संपत्ति और फंड पर वर्चस्व की जंग।
यूपी संघ, उत्कल, आंध्रा एसोसिएशन में वित्तीय गड़बड़ी और विवाद।
संस्थाओं में पारदर्शिता का अभाव, लोकतांत्रिक हनन और गुटबाजी।
जितेंद्र सिंह, जमशेदपुर। टाटा स्टील की स्थापना (1907) के बाद देश के कोने-कोने से आकर बसे लोगों ने जिस बहु-सांस्कृतिक (कास्मोपोलिटन) सामाजिक ताने-बाने को बुना था, आज वह गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है।
लौहनगरी के विभिन्न समुदायों की पहचान कहे जाने वाले ऐतिहासिक सामाजिक संगठनों में इन दिनों निष्काम सेवा और सांस्कृतिक मूल्य पीछे छूट गए हैं।
इनकी जगह करोड़ों-अरबों रुपये की परिसंपत्तियों पर वर्चस्व और कोर्पस फंड (स्थायी निधि) के नियंत्रण की जंग छिड़ गई है।
जिस जमीन को कभी समाज को एकजुट रखने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सींचने के लिए प्रदान किया गया था, वह आज राजनीतिक गुटबाजी, तालेबंदी, पुलिसिया कार्रवाई और मुकदमों का मैदान बन चुकी है।
नागरिकों के मन में उठते सुलगते सवाल
इस बदलते परिदृश्य के बीच जमशेदपुर के जागरूक नागरिकों और समाजसेवियों के बीच कई सवाल तैर रहे हैं:
- पारदर्शिता का अभाव: जो संस्थाएं निस्स्वार्थ समाज सेवा का दावा करती हैं, वहां करोड़ों रुपये की स्थायी निधि (कोर्पस फंड) के हिसाब-किताब में इतनी अपारदर्शिता क्यों है?
- व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा: क्या ये संगठन वाकई आम समाज के कल्याण के लिए काम कर रहे हैं या फिर कुछ प्रभावशालियों और रसूखदारों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को साधने के सुरक्षित अड्डे बन चुके हैं?
- लोकतंत्र का हनन: लोकतांत्रिक ढंग से चलने वाले इन ट्रस्टों और सोसायटियों में चुनाव के नाम पर दफ्तरों में ताला जड़ने, फर्जी सदस्यता बढ़ाने, बैठकों में हाथापाई और लाठीचार्ज तक की नौबत क्यों आ रही है?
क्या है कोर्पस फंड यानी 'स्थायी निधि' का गणित?
आसान भाषा में कहें तो कोर्पस फंड (Corpus Fund) का सीधा अर्थ स्थायी निधि या मूल पूंजी निधि होता है। यह वह सुरक्षित वित्तीय पूंजी है जो किसी संस्था के पास लंबे समय के लिए संचित रहती है।
नियमतः इसके मूलधन को खर्च नहीं किया जाता, बल्कि इससे मिलने वाले ब्याज या रिटर्न का उपयोग संस्था के रोजमर्रा के संचालन और जन-कल्याणकारी कार्यों में होता है।
शहर की इन प्रमुख संस्थाओं में दान, सदस्यता शुल्क और प्राइम लोकेशन्स पर स्थित बहुमूल्य संपत्तियों से होने वाली व्यावसायिक आय से बनी यह स्थायी निधि ही आज वर्चस्व की लड़ाई, चुनावी धांधली की सबसे बड़ी वजह बन गई है।
शहर की प्रमुख सामाजिक संस्थाएं और उनकी अंदरूनी कलह
| संस्था का नाम | स्थापना वर्ष / ऐतिहासिकता | मुख्य विवाद / विवाद का कारण |
|---|---|---|
| यूपी संघ | प्रमुख सामाजिक संस्था | डोबो में जमीन खरीद में वित्तीय गड़बड़ी |
| उत्कल एसोसिएशन | 1934 (92 वर्ष पुरानी) | फर्जी वोटर्स, तालेबंदी व हाईकोर्ट केस |
| आंध्रा एसोसिएशन | 1926 (शताब्दी वर्ष) | करोड़ों के फर्जीवाड़े के आरोप व हाथापाई |
| सेंट्रल गुरुद्वारा कमेटी | शीर्ष सिख संस्था | चुनाव प्रक्रिया, वर्चस्व व लाठीचार्ज |
| बंगाली समाज | कदमा मंडल | नेताजी की प्रतिमा हटाने पर आक्रोश |
| गुजराती व महाराष्ट्र मंडल | 98 वर्ष पुरानी संस्थाएं | प्राइम प्रॉपर्टीज के उपयोग पर रस्साकशी |
यूपी संघ: डोबो जमीन खरीद में करोड़ों के घपले के आरोप
समाज सेवा के बड़े दावों के साथ काम करने वाला यूपी संघ इन दिनों सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल (डोबो) में करीब 4.51 एकड़ आदिवासी जमीन की खरीद में लगभग 7.75 से 8.25 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी के गंभीर आरोपों से घिरा है।
मार्च 2026 की आमसभा में जारी आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर पूर्व अध्यक्ष विजय सिंह राणा, पूर्व महासचिव डीपी शुक्ला और पूर्व कोषाध्यक्ष देवेश अवस्थी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे थे।
मार्च 2026 की आमसभा में जारी आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर पूर्व अध्यक्ष विजय सिंह राणा, पूर्व महासचिव डीपी शुक्ला और पूर्व कोषाध्यक्ष देवेश अवस्थी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे थे।
इसके बाद वर्तमान अध्यक्ष अखिलेश कुमार दुबे की अगुवाई में पुरानी रिपोर्ट को निरस्त कर अनुराग अग्निहोत्री की अध्यक्षता में नई उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई है। इस जांच के बाद पूर्व पदाधिकारियों की प्राथमिक सदस्यता पर भी तलवार लटक रही है।
उत्कल एसो: चुनावी संकट, तालेबंदी और हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
साकची स्थित लगभग 92 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक संस्था (स्थापना 1934) में 9 अगस्त को प्रस्तावित चुनाव से ठीक पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
विरोधी गुट ने मतदाता सूची में शामिल किए गए 109 नए सदस्यों के मताधिकार पर गंभीर धांधली के आरोप लगाते हुए कार्यालय पर ताला जड़ दिया और काली पट्टी बांधकर धरना दिया।
इस अंदरूनी गुटबाजी और लगातार बढ़ते विवाद से व्यथित होकर संस्था के प्रतिष्ठित संरक्षक एसके बेहरा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। महासचिव तरुण कुमार मोहंती ने इन आरोपों को निराधार बताया है।
इस अंदरूनी गुटबाजी और लगातार बढ़ते विवाद से व्यथित होकर संस्था के प्रतिष्ठित संरक्षक एसके बेहरा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। महासचिव तरुण कुमार मोहंती ने इन आरोपों को निराधार बताया है।
लेकिन विवाद अब धालभूम एसडीएम से लेकर निबंधन महानिरीक्षक और झारखंड उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के दरवाजे तक पहुंच चुका है।
आंध्रा एसोसिएशन: शताब्दी वर्ष में वित्तीय अनियमितता का साया
वर्ष 1926 में स्थापित आंध्रा एसोसिएशन इस समय अपना ऐतिहासिक शताब्दी वर्ष (1926-2026) मना रहा है। कदमा स्थित इस प्रतिष्ठित संस्था में वित्तीय पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र की स्थिति पूरी तरह से चरमरा गई है।
हालिया आमसभा के दौरान संस्था के खातों में करोड़ों की कथित वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे। ऑडिट रिपोर्ट पारित कराने को लेकर विरोधी गुटों के बीच तीखी बहस हुई, जो देखते ही देखते गाली-गलौच और हिंसक हाथापाई में बदल गई।
हालिया आमसभा के दौरान संस्था के खातों में करोड़ों की कथित वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे। ऑडिट रिपोर्ट पारित कराने को लेकर विरोधी गुटों के बीच तीखी बहस हुई, जो देखते ही देखते गाली-गलौच और हिंसक हाथापाई में बदल गई।
सिख समाज: गुरुद्वारा समितियों में वर्चस्व और पुलिस लाठीचार्ज
शहर के सिख समाज की शीर्ष संस्था सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (सीजीपीसी) तथा साकची, टिनप्लेट व मानगो गुरुद्वारों में वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई है।
सीजीपीसी अध्यक्ष भगवान सिंह पर एक पक्ष ने मनमाने और असंवैधानिक तरीके से चुनाव कराने के आरोप लगाए।
साकची गुरुद्वारा के प्रधान पद को लेकर निशान सिंह और विरोधी गुट का विवाद झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा, जहां से निशान सिंह को कानूनी राहत मिली।
साकची गुरुद्वारा के प्रधान पद को लेकर निशान सिंह और विरोधी गुट का विवाद झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा, जहां से निशान सिंह को कानूनी राहत मिली।
वहीं, टिनप्लेट गुरुद्वारा चुनाव में अनियमितता के आरोप साबित न होने पर विपक्षी प्रत्याशी को लिखित माफी मांगनी पड़ी।
उल्लेखनीय है कि 22 जून 2025 को साकची गुरुद्वारा कमेटी के चुनाव और नामांकन के दौरान पूर्व प्रधान निशान सिंह गुट और हरविंदर सिंह मंटू गुट आमने-सामने आ गए थे।
उल्लेखनीय है कि 22 जून 2025 को साकची गुरुद्वारा कमेटी के चुनाव और नामांकन के दौरान पूर्व प्रधान निशान सिंह गुट और हरविंदर सिंह मंटू गुट आमने-सामने आ गए थे।
विवाद पंजाब में रहने वाले एक बाहरी प्रत्याशी के नामांकन को लेकर बढ़ा, जिसके बाद पुलिस प्रशासन को स्थिति पर काबू पाने के लिए बल प्रयोग और लाठीचार्ज करना पड़ा था।
बंगाली समाज: प्रतिमा हटाने को लेकर आक्रोश
कदमा मंडल क्षेत्र में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा को हटाए जाने और आवंटित भूमि के अधिकारों को लेकर बंगाली समाज में गहरा असंतोष देखा गया।
समाज के प्रबुद्ध लोगों ने इसे अपनी बंगाली पहचान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हुए जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।
गुजराती सनातन समाज व महाराष्ट्र हितकारी मंडल
बिष्टुपुर स्थित लगभग 98 वर्ष पुरानी गुजराती सनातन समाज और महाराष्ट्र हितकारी मंडल जैसी संस्थाएं यद्यपि सीधे तौर पर वित्तीय घोटालों में नहीं घिरी हैं।
लेकिन प्राइम लोकेशन पर स्थित करोड़ों-अरबों रुपये मूल्य की जमीनों के व्यावसायिक उपयोग और प्रबंधन पर कब्जे को लेकर इन संस्थाओं में भी समय-समय पर गुटबाजी की सुगबुगाहट तेज होती रहती है।
पिछले एक दशक में कैसे बदला विवादों का स्वरूप?
| समयावधि | विवादों का बदलता स्वरूप और मुख्य कारण |
|---|---|
| 2016 - 19 | आवंटित भूमि के व्यावसायिक उपयोग, और मालिकाना हक पर सवाल उठने शुरू हुए। |
| 2020 - 23 | कोरोना काल में संस्थाओं द्वारा बड़े पैमाने पर फंड व दान का लेन-देन; अपारदर्शिता बढ़ी। |
| 2024 - 26 | निबंधन व आयकर नियमों में कड़ाई के बाद वित्तीय-प्रशासनिक जांच तेज; विवाद सतह पर आए। |
- 2016-2019 (जमीन और मालिकाना हक): इस दौर में टाटा स्टील व सरकार द्वारा सामाजिक कार्यों के लिए आवंटित भूमि के व्यावसायिक उपयोग और मालिकाना हक के अधिकारों को लेकर पहली बार सवाल उठने शुरू हुए।
- 2020-23 (कोरोना काल और फंड का खेल): महामारी के दौरान संस्थाओं द्वारा राहत कार्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर कोर्पस फंड और दान राशि का लेन-देन किया गया। स्पष्ट ऑडिट और हिसाब न होने के कारण विवादों की मजबूत जमीन तैयार हुई।
- 2024-26 (सख्त नियम और जांच का दौर): सोसायटियों/ट्रस्टों के निबंधन और आयकर (Income Tax) नियमों में आई कड़ाई के बाद वित्तीय और प्रशासनिक जांच तेज हुई। इसी का नतीजा है कि उत्कल एसोसिएशन का चुनावी संकट, आंध्रा एसोसिएशन का हंगामा और यूपी संघ का भूमि खरीद विवाद पूरी तरह से सतह पर आ गया।
समाधान का रास्ता क्या है?
जमशेदपुर के इन सामाजिक संगठनों की अंदरूनी कलह केवल व्यक्तिगत रंजिश या वर्चस्व की लड़ाई नहीं है। यह जमीनों के बेतहाशा बढ़ते बाजारी मूल्य, कोर्पस फंड (स्थायी निधि) के प्रबंधन में घोर अपारदर्शिता और बाय-लॉज (ट्रस्ट नियमावली) की मनमानी व्याख्याओं का सीधा दुष्परिणाम है।
जब तक निबंधन विभाग, जिला प्रशासन और कोर्ट के नियमों की कड़ाई से पालना सुनिश्चित नहीं होगी तथा प्रत्येक पाई का डिजिटल ऑडिट कराकर सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, तब तक सामाजिक उत्थान के ये पवित्र केंद्र विवादों और गुटबाजी के अखाड़े बने रहेंगे।
जब तक निबंधन विभाग, जिला प्रशासन और कोर्ट के नियमों की कड़ाई से पालना सुनिश्चित नहीं होगी तथा प्रत्येक पाई का डिजिटल ऑडिट कराकर सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, तब तक सामाजिक उत्थान के ये पवित्र केंद्र विवादों और गुटबाजी के अखाड़े बने रहेंगे।