विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

फाइलों के भंवर में धालभूमगढ़ एयरपोर्ट: 7 साल बाद भी वन मंजूरी का इंतजार, थमी कोल्हान के विकास की रफ्तार

Published: Thu, 20 Aug 2026 10:32 PM (IST)

धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना 7 साल से अधिक समय से वन और पर्यावरण मंजूरी के कारण अटकी हुई है, जिससे कोल्हान क्षेत्र का विकास बाधित हो रहा है।

जमशेदपुर में वर्तमान में मौजूद सोनारी एयरपोर्ट की रनवे पट्टी काफी छोटी है, जिसके कारण वहां वाणिज्यिक श्रेणी के बड़े यात्री विमान नहीं उतर सकते।

जमशेदपुर में वर्तमान में मौजूद सोनारी एयरपोर्ट की रनवे पट्टी काफी छोटी है, जिसके कारण वहां वाणिज्यिक श्रेणी के बड़े यात्री विमान नहीं उतर सकते।

HighLights

  1. परियोजना 7.5 साल से वन मंजूरी के कारण अटकी हुई है।

  2. वन भूमि हस्तांतरण, पेड़ कटाई, हाथी गलियारा मुख्य बाधाएं हैं।

  3. कोल्हान के विकास हेतु बड़े विमानों का इंतजार जारी है।

जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम जिले को सीधे आसमान से जोड़ने और कोल्हान प्रमंडल को प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय हवाई नेटवर्क से समृद्ध करने का सपना कागजी दांव-पेचों में सिमटकर रह गया है। 
 
केंद्र सरकार, राज्य सरकार और वन विभाग के बीच फाइलों की लंबी दौड़ जारी है, लेकिन धरातल पर काम अब भी शून्य है।
 
24 जनवरी 2019 को तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा शिलान्यास किए जाने के साढ़े सात साल बाद भी धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना पर्यावरण और वन स्वीकृति के भंवर में फंसी हुई है।
 
झारखंड की औद्योगिक राजधानी जमशेदपुर में वर्तमान में मौजूद सोनारी एयरपोर्ट की रनवे पट्टी काफी छोटी है, जिसके कारण वहां वाणिज्यिक श्रेणी के बड़े यात्री विमान नहीं उतर सकते। 
 
नतीजतन, टाटा स्टील जैसी वैश्विक कंपनियों, हजारों एमएसएमई (MSME) इकाइयों और लाखों आबादी वाले पूरे कोल्हान प्रमंडल की आर्थिक और हवाई विकास दर पूरी तरह से अटकी हुई है।
 

औद्योगिक राजधानी को बड़े विमानों का इंतजार 

टाटा स्टील जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों और सैकड़ों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों का केंद्र होने के बावजूद जमशेदपुर हवाई संपर्क के मामले में आज भी उपेक्षित है। 
 
सोनारी एयरपोर्ट का रनवे छोटा होने से यहां एटीआर-72 (ATR-72) या एयरबस जैसे 70 से 180 सीटर बड़े यात्री विमानों का संचालन पूरी तरह असंभव है। 
 
उद्योगपतियों, व्यवसायियों, शिक्षाविदों और आम यात्रियों को हवाई सफर तय करने के लिए 130 किलोमीटर दूर रांची या फिर कोलकाता जाना पड़ता है। 
 
इसी गंभीर समस्या के स्थाई समाधान के लिए द्वितीय विश्व युद्ध (1942) के पुराने धालभूमगढ़ एयरफील्ड को नए सिरे से विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई गई थी, ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना (उड़ान) के तहत बड़े जहाजों का सुगम आवागमन हो सके।
 

वन विभाग की 19 आपत्तियों का पेच 

परियोजना के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा वन और वन्यजीव सुरक्षा का पेच है। एयरपोर्ट निर्माण के लिए कुल 99.256 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण (डायवर्जन) की जरूरत है, जिसके तहत लगभग 79,332 पेड़ों की कटाई होनी है। 
 
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने इस प्रस्तावित स्थल को 'सिंहभूम एलीफेंट रिजर्व' और संवेदनशील गजह हाथी गलियारे (Elephant Corridor) के बेहद निकट बताते हुए निर्माण पर गंभीर आपत्तियां जताई थीं।
 

अगस्त 2024 में केंद्रीय मंत्रालय ने इस संबंध में 19 बिंदुओं पर विस्तृत जवाब मांगा था। हालांकि, अगस्त 2026 तक जमशेदपुर वन प्रमंडल और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने संयुक्त रूप से इन 19 आपत्तियों पर अपनी अनुपालन रिपोर्ट तैयार कर राज्य वन विभाग को भेज दी है। 

150 किमी की दूरी और देवघर का गणित 

अंतिम 'स्टेज-1' वन मंजूरी (Forest Clearance) अभी भी राज्य व केंद्र के बीच अधर में लटकी हुई है। नागरिक उड्डयन नीति (2008) के अनुसार, किसी भी चालू एयरपोर्ट के 150 किलोमीटर के दायरे में नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने पर प्रतिबंध का प्रावधान है। 
 
रांची के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से धालभूमगढ़ की दूरी लगभग 130 किलोमीटर होने के कारण शुरुआती दौर में यह तकनीकी पेंच भी सामने आया था। 
 
वहीं दूसरी ओर, रांची से लगभग 250 किलोमीटर दूर होने के कारण देवघर एयरपोर्ट को दूरी के इस नियम से सहज छूट मिल गई और वहां नागरिक हवाई सेवा सफलतापूर्वक शुरू हो गई। 
 
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि धालभूमगढ़ के मामले में परियोजना के लटकने का मुख्य कारण दूरी का नियम नहीं, बल्कि हाथी कॉरिडोर, पेड़ों की कटाई और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्न रहे हैं।
 

क्यों अटका है धालभूमगढ़ एयरपोर्ट? 

धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना के लटकने का मुख्य कारण त्रिकोणीय गतिरोध है:

  •     पर्यावरणीय मुद्दा: 99.256 हेक्टेयर वन भूमि का हस्तांतरण और लगभग 79,332 हरे-भरे पेड़ों की कटाई।
  •     वन्यजीव सुरक्षा: सिंहभूम एलीफेंट रिजर्व और हाथी गलियारे से निकटता के कारण मानव-हाथी संघर्ष (Human-Elephant Conflict) बढ़ने की गंभीर आशंका।
  •     प्रशासनिक व नीतिगत सुस्ती: 2019 में शिलान्यास के बाद 2023 में पर्यावरणीय कारणों से परियोजना को लगभग बंद घोषित कर दिया गया था। 2026 में एएआई और डीएफओ द्वारा 19 बिंदुओं का अनुपालन जवाब भेजने तथा विवादित नौ एकड़ भूमि को नक्शे से हटाने के बाद परियोजना पुनर्जीवित तो हुई है, परंतु 'स्टेज-1' फॉरेस्ट क्लियरेंस न मिलने से निर्माण कार्य धरातल पर शुरू नहीं हो पा रहा है।

 

क्या हो सकता है व्यावहारिक समाधान? 

परियोजना को धरातल पर उतारने का रास्ता वैज्ञानिक वन प्रबंधन और दूरदर्शी नीति में निहित है:

  •     संशोधित प्लान: एएआई (AAI) को पूरे 99.256 हेक्टेयर क्षेत्र के बजाय केवल अत्यंत आवश्यक रनवे और टर्मिनल बिल्डिंग के इस्तेमाल का संशोधित प्लान प्रस्तुत करना होगा।
  •    क्षतिपूरक वनीकरण व आधुनिक बाड़: लगभग 198 हेक्टेयर भूमि पर प्रभावी क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation), हाथियों की आवाजाही सुरक्षित करने हेतु आधुनिक सुरक्षा बाड़ लगाने और नो-नॉइज जोन तकनीक अपनाकर वन विभाग से स्टेज-1 व स्टेज-2 की मंजूरी पाई जा सकती है।
  •     चाकुलिया का विकल्प: यदि धालभूमगढ़ में पर्यावरणीय मंजूरी मिलना पूरी तरह से असंभव साबित होता है, तो पास ही स्थित 514 एकड़ में फैले द्वितीय विश्व युद्ध काल के चाकुलियाएयरड्रोम को कम पर्यावरणीय बाधाओं वाले एक मजबूत विकल्प के रूप में विकसित किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें- धालभूमगढ़ एयरपोर्ट प्रोजेक्ट : स्टेज-1 फॉरेस्ट क्लियरेंस मिलते ही पर्यावरण स्वीकृति का रास्ता साफ, AAI तैयार

यह भी पढ़ें- धालभूमगढ़ एयरपोर्ट को जल्द मिलेगी फॉरेस्ट क्लीयरेंस, सालाना 52 हजार यात्री भरेंगे उड़ान