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क्यों बेहद खूबसूरत है गुलमर्ग? स्टडी ने राज से हटाया पर्दा; पौधे की 364 दुर्लभ प्रजातियों का है अनमोल खजाना

Published: Tue, 08 Sep 2026 06:20 PM (IST)

गुलमर्ग वाइल्डलाइफ सेंचुरी पर हुए एक नए शोध में 364 वैस्कुलर प्लांट प्रजातियों और 18 पादप समुदायों का खुलासा हुआ ...और पढ़ें

देखते ही बन रही गुलमर्ग की खूबसूरती। फोटो जागरण

देखते ही बन रही गुलमर्ग की खूबसूरती। फोटो जागरण

HighLights

  1. गुलमर्ग में 364 वैस्कुलर प्लांट प्रजातियाँ और 18 समुदाय मिले।

  2. 41.8% प्रजातियाँ खतरे में, संरक्षण के उपाय आवश्यक।

  3. पर्यटक नियंत्रण और स्थानीय भागीदारी संरक्षण में महत्वपूर्ण।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। गुलमर्ग को आप अब तक सिर्फ स्कीइंग, बर्फ और हरे-भरे मैदानों के लिए जानते हैं, लेकिन इन वादियों के भीतर एक पूरी वनस्पति दुनिया बसती है जो कश्मीर हिमालय की सांसें संभाले हुए हैं। गुलमर्ग वाइल्डलाइफ सेंचुरी पर हुई एक नई और विस्तृत स्टडी ने इस छिपे हुए खजाने से पर्दा उठा दिया है।

प्रतिष्ठित जर्नल नॉर्डिक जर्नल ऑफ बॉटनी में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने सेंचुरी में 364 वैस्कुलर प्लांट प्रजातियों और 18 अलग-अलग पादप समुदायों को दर्ज किया है। इनमें 10 समुदाय जंगलों के हैं और 8 अल्पाइन यानी ऊंचे पहाड़ी इलाकों के। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह आंकड़ा साबित करता है कि गुलमर्ग सिर्फ टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं, बल्कि कश्मीर हिमालय की जैव विविधता को बचाने का सबसे महत्वपूर्ण गढ़ है।

हिमालयी क्षेत्र में ही पाई जाती हैं दुर्लभ प्रजातियां

इस स्टडी को खास बनाती है इन पौधों की उत्पत्ति। शोध में पाया गया कि कुल प्रजातियों में से 44.23 प्रतिशत प्रजातियां नेटिव यानी मूल निवासी हैं, जो यहीं की मिट्टी में विकसित हुई हैं। वहीं 22.52 प्रतिशत प्रजातियां ऐसी दुर्लभ प्रजातियां जो पूरी दुनिया में मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्र में ही पाई जाती हैं।

शोधकर्ताओं ने साफ लिखा है कि सेंचुरी में 44.23 प्रतिशत नेटिव और 22.52 प्रतिशत एंडेमिक प्रजातियों की मौजूदगी इसकी प्रजाति समृद्धि और विविधता को बनाए रखने के महत्व को दर्शाती है। आसान शब्दों में कहें तो गुलमर्ग का जंगल हिमालय की असली पहचान को अपने भीतर जिंदा रखे हुए है।

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खूबसूरती के बीच खतरे की घंटी

इस अच्छी खबर के साथ एक गंभीर चेतावनी भी जुड़ी है। शोधकर्ताओं ने कंजर्वेशन प्रायोरिटी इंडेक्स (सीपीआई) के आधार पर मूल्यांकन किया तो पाया कि सेंचुरी की 41.8 प्रतिशत प्रजातियां खतरे में या खतरे के करीब हैं। यह आंकड़ा बताता है कि जो खजाना हमें मिला है, वह तेजी से हमारे हाथ से फिसल भी सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ एक-एक पौधे को बचाने की कोशिश के बजाय पूरे हैबिटेट और पादप समुदाय को बचाने पर ध्यान दें। अगर हम एक पूरे समुदाय को सुरक्षित कर लेते हैं, तो उसमें रहने वाली सभी प्रजातियां अपने आप सुरक्षित हो जाएंगी।

नहीं तो उजड़ जाएगी हरियाली

गुलमर्ग कश्मीर की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली जगहों में से एक है और यहीं सबसे बड़ा खतरा भी छिपा है। हर साल लाखों पर्यटकों के बेरोकटोक आवाजाही से नाजुक जड़ी-बूटियों वाले पौधे पैरों तले कुचले जा रहे हैं, जिससे धीरे-धीरे पूरे पादप समुदाय का स्वरूप बदल रहा है। इसलिए शोधकर्ताओं ने सरकार से दो बड़ी सिफारिशें की हैं।

पहली यह है कि पर्यटकों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं ताकि वे संवेदनशील इलाकों में न जाएं और पर्यटकों की संख्या सेंचुरी की वहन क्षमता के हिसाब से तय की जाए। दूसरी सिफारिश है कि बाहर से आई इनवेसिव प्रजातियों की निगरानी की जाए और देखा जाए कि कहीं वे स्थानीय और दुर्लभ पौधों को खत्म तो नहीं कर रही हैं।

अब हर साल होगी निगरानी

शोधकर्ता मानते हैं कि कभी-कभार सर्वे करने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने जियोरेफरेंस्ड प्लॉट बनाकर हर तरह के पौधों की नियमित, वैज्ञानिक निगरानी की सिफारिश की है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे मिशन में स्थानीय लोगों को केंद्र में रखा गया है।

रिपोर्ट में कहा गया कि जैविक संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में स्थानीय निवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके लिए गांव-गांव में जागरूकता कार्यक्रम, ट्रेनिंग वर्कशॉप और बायोडायवर्सिटी कैंप लगाने और स्थानीय लोगों, विश्वविद्यालयों, एनजीओ और नीति निर्माताओं का एक मजबूत नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव दिया गया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, कश्मीर हिमालय में वन और अल्पाइन समुदायों पर इतनी बारीक रिसर्च बहुत कम हुई है। ऐसे में गुलमर्ग की यह स्टडी एक मॉडल बन सकती है, जिसे घाटी के दूसरे संरक्षित और असंरक्षित इलाकों में भी दोहराया जा सकता है। कुल मिलाकर यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं बल्कि गुलमर्ग को बचाने का ब्लू-प्रिंट है।