कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी की अंदरूनी जंग, अलगाववाद से संवैधानिक राजनीति तक दो गुट आमने-सामने
कश्मीर में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के भीतर विचारधारा, विरासत और संपत्ति को लेकर दो धड़ों में गहरी अंदरूनी जंग छिड़ गई है। एक धड़ा (जेडीएफ) संवैधानिक राजनीति में उतरना चाहता है।
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बंद कमरों से निकलकर सड़कों पर आया राजनीतिक संघर्ष।
HighLights
जमात-ए-इस्लामी में विचारधारा और संपत्ति को लेकर आंतरिक संघर्ष।
जेडीएफ संवैधानिक राजनीति में, मूल जमात नेतृत्व विरोध में।
फलाह-ए-आम ट्रस्ट की संपत्तियां विवाद का मुख्य केंद्र।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी की अंदरूनी लड़ाई अब बंद कमरों की बहस से निकलकर खुले राजनीतिक संघर्ष में पहुंच गई है।
एक ओर जमात से अलग हुआ धड़ा जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट (जेडीएफ) के नाम से चुनावी और संवैधानिक राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जमात का मूल नेतृत्व उसकी वैचारिक पहचान से समझौता करने के सवाल पर इस नए राजनीतिक प्रयोग को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दायरा अब विचारधारा से बढ़कर संगठन की विरासत, संस्थानों और संपत्तियों तक पहुंच गया है।
श्रीनगर में प्रेस वार्ता के दौरान गुलाम कादिर वानी और अहमदुल्लाह पर्रे मलिक समेत अलग हुए धड़े के नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें समर्थकों के बीच बदनाम करने के लिए ‘गद्दार’ और ‘बिकाऊ’ जैसे तमगों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
पर्रे ने केंद्र के साथ संवाद का स्वागत करते हुए युवाओं से संविधान के दायरे में अपने मुद्दे उठाने की अपील की। यही बयान इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।
क्योंकि कश्मीर की राजनीति में जमात-ए-इस्लामी की पहचान केवल एक धार्मिक-सामाजिक संगठन की नहीं रही है। दशकों तक यह संगठन अलगाववादी राजनीति के प्रभावशाली नेटवर्क का हिस्सा रहा और आतंकवाद के दौर में इसके कैडर तथा उससे जुड़े सामाजिक नेटवर्क की भूमिका पर सुरक्षा एजेंसियां गंभीर सवाल उठाती रही हैं।
ऐसे में उसी पृष्ठभूमि से निकला एक धड़ा यदि अब चुनाव और संविधान को राजनीतिक रास्ता बता रहा है तो इसे महज संगठनात्मक टूट नहीं, बल्कि एक बड़े वैचारिक बदलाव के संकेत के रूप में देखा जाएगा।
सवाल सिर्फ चुनाव का नहीं, जमात की विचारधारा का है
जमात के पूर्व प्रमुख गुलाम मोहम्मद भट्ट ने जेडीएफ की चुनावी राजनीति पर ही सवाल उठा दिया है। उनका तर्क है कि यदि जेडीएफ अपने राजनीतिक घोषणापत्र में समाजवाद जैसी अवधारणाओं को स्थान देता है तो फिर उसे इस्लामी विचारधारा की राजनीतिक निरंतरता के रूप में पेश करना विरोधाभासी है।
भट्ट का कहना है कि जमात का किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं है। संगठन ने प्रतिबंध स्वीकार किया है और प्रतिबंध के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाएगा। इसके विपरीत जेडीएफ से जुड़े नेताओं का दावा है कि उनकी राजनीतिक पहल को जमात की मजलिस-ए-शूरा का समर्थन मिला था और सरकार से अनुमति के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने समेत दस बिंदुओं पर सहमति बनी थी।
यहीं इस विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या जमात की विचारधारा को संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर राजनीतिक रूप दिया जा सकता है, या चुनावी राजनीति में उतरना ही उसकी मूल वैचारिक पहचान से विचलन है?
इस सवाल का जवाब आने वाले समय में सिर्फ जेडीएफ की राजनीतिक दिशा तय नहीं करेगा, बल्कि कश्मीर में जमात के प्रभाव के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।
2024 का चुनाव बना निर्णायक मोड़
2019 में केंद्र सरकार द्वारा जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद संगठन की मुख्यधारा राजनीतिक गतिविधियां सीमित हो गईं। इसके बाद 2024 के विधानसभा चुनाव ने एक अप्रत्याशित राजनीतिक दरवाजा खोल दिया।
जमात से जुड़े रहे कुछ लोग निर्दलीय प्रत्याशियों के रूप में चुनाव मैदान में उतरे और बाद में इसी राजनीतिक पहल को जेडीएफ के गठन के रूप में आगे बढ़ाया गया।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि कश्मीर में लंबे समय से अलगाववाद और चुनावी राजनीति को परस्पर विरोधी ध्रुवों के रूप में देखा जाता रहा है। 2024 में जमात पृष्ठभूमि वाले नेताओं का चुनाव लड़ना इस धारणा को चुनौती देता नजर आया।
जेडीएफ का तर्क है कि संविधान के दायरे में रहकर राजनीति करना ही उसका रास्ता है। लेकिन जमात के दूसरे धड़े के लिए यही सवाल सबसे बड़ा है कि क्या प्रतिबंधित संगठन से जुड़े राजनीतिक नेटवर्क को नया नाम और नया मंच देकर उसकी पुरानी वैचारिक विरासत आगे बढ़ाई जा रही है? यानी नाम बदला है या रास्ता भी?
आतंकवाद और अलगाववाद की छाया अब भी मौजूद
जमात की मौजूदा राजनीतिक लड़ाई को उसके अतीत से अलग करके देखना संभव नहीं है। कश्मीर में आतंकवाद के उभार के बाद जमात-ए-इस्लामी से जुड़े कैडर और हिजबुल मुजाहिद्दीन के बीच संबंधों का उल्लेख सुरक्षा एजेंसियों और विभिन्न जांचों में होता रहा है।
हिजबुल के शीर्ष कमांडर रहे मोहम्मद यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन की जमात पृष्ठभूमि भी इस रिश्ते का प्रमुख उदाहरण रही है।
अलगाववादी राजनीति के कई प्रमुख चेहरों के भी किसी न किसी दौर में जमात से जुड़े होने की बात सामने आती रही है। सैयद अली शाह गिलानी और मोहम्मद अशरफ सहराई जैसे नेताओं से लेकर अलगाववादी खेमे के अन्य चेहरों तक जमात का प्रभाव कश्मीर के राजनीतिक इतिहास का हिस्सा रहा है।
1989 के बाद चुनाव बहिष्कार और अलगाववादी अभियानों में जमात के सामाजिक नेटवर्क की भूमिका को लेकर भी सुरक्षा एजेंसियां आरोप लगाती रही हैं। हालांकि संगठन ने जम्मू-कश्मीर में विभिन्न चुनावों में भाग भी लिया है। यही विरोधाभास जमात की राजनीतिक यात्रा को जटिल बनाता है।
इसलिए आज जब उसी पृष्ठभूमि का एक धड़ा संवैधानिक राजनीति का रास्ता चुनता है तो यह केवल चुनाव लड़ने का फैसला नहीं, बल्कि अतीत से राजनीतिक दूरी बनाने की परीक्षा भी है।
फलाह-ए-आम ट्रस्ट पर टकराव ने बढ़ाई तल्खी
विचारधारा की लड़ाई अब संपत्ति विवाद से भी जुड़ गई है। फलाह-ए-आम ट्रस्ट की संपत्तियां इस संघर्ष का केंद्र बनती जा रही हैं। गुलाम मोहम्मद भट्ट ने आरोप लगाया है कि जमात से जुड़ी संपत्तियों पर कब्जे की कोशिश हो रही है और जेडीएफ इन परिसरों का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों के लिए कर रहा है। उनके अनुसार इसमें सरकार का सहयोग भी प्राप्त है।
जवाब में अहमदुल्लाह पर्रे ने जबरन कब्जे के आरोप को खारिज करते हुए दावा किया कि 2024 में ट्रस्ट की संपत्ति के एक हिस्से के इस्तेमाल के लिए बाकायदा टेनेंसी एग्रीमेंट किया गया था। अब इस विवाद का फैसला बयान से नहीं, दस्तावेज से होगा।
यदि टेनेंसी एग्रीमेंट है तो उसकी वैधता, शर्तें और अधिकार स्पष्ट किए जाने चाहिए। यदि सरकारी अनुमति का दावा है तो संबंधित आदेश सामने आने चाहिए। इसी तरह यदि कब्जे का आरोप है तो राजस्व और स्वामित्व रिकॉर्ड से उसकी पुष्टि होनी चाहिए।
क्योंकि संपत्ति का सवाल यहां केवल जमीन का सवाल नहीं है। जिसके पास संस्थान और संपत्ति होगी, उसके पास जमात की सामाजिक विरासत पर दावा मजबूत करने का साधन भी होगा।
हजारों करोड़ की संपत्तियों के दावे पर भी उठेंगे सवाल
जमात से जुड़ी संपत्तियों और वित्तीय नेटवर्क की जांच कर रही सुरक्षा एजेंसियां जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में ऐसी परिसंपत्तियां चिन्हित करने का दावा करती रही हैं, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध संगठन से है। इनमें कई संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई भी हुई है।
एजेंसियों की ओर से जमात की कुल परिसंपत्तियों का मूल्य हजारों करोड़ रुपये आंका गया है। साथ ही यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि संगठन ने अलग-अलग स्थानों पर जमीन दान के रूप में हासिल की और कुछ परिसंपत्तियों को पदाधिकारियों या उनके रिश्तेदारों के नाम पर दर्ज कराया।
हालांकि इन दावों की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए राजस्व रिकॉर्ड, पंजीकरण दस्तावेज, कुर्की आदेश और अदालतों के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
कश्मीरी विस्थापितों की छोड़ी गई संपत्तियों को लेकर भी जमात से जुड़े लोगों पर आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र और व्यापक जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मामला केवल संपत्ति का नहीं, बल्कि 1990 के दशक के विस्थापन के बाद कश्मीर में संपत्ति के बदलते स्वामित्व और उससे बने सामाजिक-आर्थिक समीकरणों का भी है।
सरकार के लिए भी आसान नहीं होगी राह
जमात-जेडीएफ विवाद अब प्रशासन के लिए भी परीक्षा बन गया है। प्रतिबंधित संगठन से जुड़ी संपत्ति का इस्तेमाल यदि किसी नए राजनीतिक संगठन की गतिविधियों के लिए हो रहा है तो उसके कानूनी आधार की जांच जरूरी होगी।
वहीं, यदि संबंधित पक्ष वैध समझौते और प्रशासनिक अनुमति प्रस्तुत करता है तो राजनीतिक आरोपों के आधार पर उसे अवैध कब्जा कहना भी उचित नहीं होगा।
सरकार के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि प्रतिबंधित संगठन की संपत्तियों और नेटवर्क के संबंध में कानून का पालन हो, लेकिन किसी वैध लोकतांत्रिक राजनीतिक गतिविधि को केवल उसके अतीत के आधार पर कठघरे में न खड़ा किया जाए।
असली लड़ाई जमात के भविष्य की
जमात और जेडीएफ के बीच मौजूदा टकराव को इसलिए केवल दो धड़ों की व्यक्तिगत या संगठनात्मक लड़ाई मानना भूल होगी। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल हैं विचारधारा, राजनीतिक वैधता और संगठनात्मक विरासत।
जेडीएफ चुनाव और संविधान के जरिए राजनीतिक स्वीकार्यता हासिल करना चाहता है। जमात का मूल नेतृत्व अपनी संगठनात्मक पहचान और प्रतिबंध के खिलाफ कानूनी लड़ाई को प्राथमिकता दे रहा है। इनके बीच संपत्ति और संस्थागत नियंत्रण का विवाद इस संघर्ष को और गहरा कर रहा है।
कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद के लंबे दौर के बाद यदि जमात से निकला कोई प्रभावशाली धड़ा वास्तव में संवैधानिक लोकतंत्र की राह पकड़ता है तो यह कश्मीर की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। लेकिन यह बदलाव तभी विश्वसनीय माना जाएगा जब राजनीतिक मंच केवल नाम से नहीं, बल्कि व्यवहार, विचार और सार्वजनिक प्रतिबद्धताओं से भी अपने अतीत से दूरी साबित करे।
फिलहाल तस्वीर साफ है—कश्मीर में जमात की लड़ाई अब सिर्फ इस बात की नहीं है कि कौन सही है। लड़ाई यह तय करने की है कि जमात की विरासत किसके पास रहेगी, उसका राजनीतिक भविष्य किस रास्ते जाएगा और उसकी संपत्तियों तथा संस्थानों पर अधिकार किसका होगा।
