'विवादित कश्मीर' से संविधान तक... जमात-ए-इस्लामी का यूटर्न, अलगाववाद की जमीन खिसकी तो बदली भाषा; लेकिन सवाल अभी बाकी
प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर ने अलगाववादी राजनीति छोड़ भारतीय संविधान के दायरे में काम करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेने का फैसला किया है।

जमात-ए-इस्लामी का यूटर्न। फाइल फोटो
नवीन नवाज, श्रीनगर। जिस कश्मीर में कभी भारत के खिलाफ नारे लगाना राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनाया जाता था, वहां अब उसी राजनीतिक धारा के कुछ हिस्से भारतीय संविधान की शपथ और चुनावी लोकतंत्र की चौखट पर दस्तक दे रहे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है।
यह उस अलगाववादी राजनीति के कमजोर पड़ते प्रभाव का संकेत है, जिसने दशकों तक कश्मीर के युवाओं को भारत से दूरी, बंद और विरोध की राजनीति में उलझाए रखा। अब परिस्थितियां बदली हैं तो भाषा भी बदल रही है—‘विवादित क्षेत्र’ की जगह संविधान, बंदूक की जगह चुनाव और अलगाव की जगह लोकतांत्रिक राजनीति की बात हो रही है।
अलगाववादी नारे राजनीतिक दबदबे का सबसे बड़ा हथियार
प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर का बदला रुख इसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है। जिस संगठन पर लंबे समय तक कश्मीर को भारत से अलग बताने वाले वैचारिक विमर्श को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे, वह अब भारतीय संविधान के दायरे में काम करने और देश की संप्रभुता एवं अखंडता के विरुद्ध किसी गतिविधि से दूर रहने की बात कर रहा है।
कश्मीर की राजनीति में इसे केवल ‘बयान बदलने’ की घटना मानना भूल होगी। यह उस दौर के अंत का संकेत भी हो सकता है, जब अलगाववादी नारे राजनीतिक दबदबे का सबसे बड़ा हथियार थे।
कभी सड़कों पर ‘आजादी’ के नारे गूंजते थे, अलगाववादी बंद का आह्वान राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन माना जाता था और चुनावों का बहिष्कार भारत के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बनाया जाता था।
आज उसी राजनीतिक परिवेश से निकले चेहरे चुनाव लड़ रहे हैं, संवैधानिक संस्थाओं का दरवाजा खटखटा रहे हैं और राजनीतिक भागीदारी के लिए लोकतांत्रिक रास्ते तलाश रहे हैं। अलगाववादी राजनीति के लिए इससे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास शायद ही कोई हो।
संगठन की नीति को लेकर दस फैसले किए गए थे
श्रीनगर में पत्रकारवार्ता में प्रतिबंधित जमात के पैनल प्रमुख गुलाम कादिर वानी, पैनल सचिव अहमदुल्ला पर्रे, गुलाम कादिर लोन समेत अन्य सदस्यों ने बताया कि 30 जून 2024 को जमात-ए-इस्लामी की केंद्रीय सलाहकार परिषद (मजलिस-ए-शूरा) की बैठक में संगठन की भावी नीति को लेकर दस फैसले किए गए थे।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण फैसला था कि जमात आगे अपनी गतिविधियां लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से तथा भारतीय संविधान के दायरे में रहकर चलाएगी। साथ ही ऐसी किसी गतिविधि से दूर रहने की बात कही गई, जिससे भारत की संप्रभुता और अखंडता प्रभावित हो।
यानी जिस संविधान को कभी कश्मीर की अलग राजनीतिक पहचान के रास्ते में बाधा के तौर पर देखा जाता था, आज उसी संविधान के भीतर राजनीतिक भविष्य तलाशने की बात हो रही है। यह बदलाव कश्मीर की बदलती राजनीतिक हकीकत का आईना है।
अलगाववाद से विधानसभा तक
जमात की नई राजनीतिक दिशा का अगला कदम जम्मू-कश्मीर जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट (जेकेजेडीएफ) के गठन में दिखाई देता है। अहमदुल्ला पर्रे के अनुसार यह फ्रंट चुनाव लड़ेगा और राजनीतिक गतिविधियां करेगा, जबकि जमात अपनी गतिविधियों को निर्धारित संवैधानिक दायरे में रखेगी।
2024 के विधानसभा चुनाव में भी इस बदली जमीन की झलक मिली। जमात के पूर्व सदस्यों और समर्थकों ने कुलगाम, जैनापोरा, पुलवामा, बीरवाह, लंगेट, बांडीपोरा, रफियाबाद और बारामुला समेत आठ सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में चुनाव लड़ा।
कोई सीट नहीं जीत सका, लेकिन कुलगाम में माकपा नेता एमवाई तारिगामी को मिली कड़ी चुनौती ने संकेत दिया कि अलगाववादी पृष्ठभूमि से जुड़े राजनीतिक नेटवर्क अब चुनावी मैदान को भी अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम मान रहे हैं।
यानी कल तक चुनाव का बहिष्कार जिस राजनीति का हथियार था, आज चुनाव लड़ना उसी राजनीति के एक हिस्से की रणनीति बन रहा है।
हिजबुल के वैचारिक आधार से संविधान की चौखट तक
जमात का यह परिवर्तन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उस पर लंबे समय तक आतंकवाद और अलगाववादी गतिविधियों को वैचारिक समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। इसे आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के वैचारिक आधार से भी जोड़ा जाता रहा है।
पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को सीआरपीएफ काफिले पर आत्मघाती हमले में 40 जवानों की मौत के बाद केंद्र सरकार ने 28 फरवरी 2019 को जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर पर पांच वर्ष का प्रतिबंध लगाया था।
गृह मंत्रालय ने संगठन पर आतंकवाद को बढ़ावा देने, भारत विरोधी प्रचार और अलगाववाद को हवा देने जैसे आरोप लगाए थे। 27 फरवरी 2024 को केंद्र ने यूएपीए की धारा 3(1) के तहत इसे ‘गैरकानूनी संगठन’ घोषित करते हुए प्रतिबंध अगले पांच वर्ष के लिए बढ़ा दिया।
ऐसे में संविधान में आस्था की घोषणा केवल राजनीतिक बयान नहीं है। यह उस पुराने विमर्श से दूरी का दावा है, जिसने कश्मीर को भारत से अलग राजनीतिक इकाई के रूप में पेश करने की कोशिश की थी।
‘आजादी’ के नारों से राजनीतिक मुख्यधारा तक
कश्मीर में बदलाव का सबसे बड़ा संकेत शायद यही है कि अलगाववादी नारे लगाने वाली राजनीति का प्रभाव सिकुड़ रहा है और उसके कुछ पुराने समर्थक अब मुख्यधारा की राजनीति में जगह तलाश रहे हैं।
जो लोग कभी भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से दूरी को अपनी पहचान बताते थे, उनमें से कुछ अब चुनाव, राजनीतिक दल, अदालत और संविधान के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि अलगाववाद पूरी तरह समाप्त हो गया है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता और प्रभाव की जमीन पहले जैसी नहीं रह गई है।
यह बदलाव केवल सुरक्षा नीति का परिणाम नहीं है। घाटी में राजनीतिक समीकरण, युवाओं की आकांक्षाएं, चुनावी भागीदारी और दिल्ली के साथ बदलते संबंध—इन सभी ने मिलकर वह परिस्थितियां पैदा की हैं, जिसमें बंद और बहिष्कार की राजनीति की जगह चुनावी प्रतिस्पर्धा ने लेना शुरू किया है।
लेकिन सवाल अभी बाकी है
जमात के भीतर इस बदलाव को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं। पूर्व अमीर गुलाम मोहम्मद भट ने हाल में वीडियो संदेश में जेकेजेडीएफ से दूरी बनाते हुए कहा कि जमात को प्रतिबंध हटाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है। इसके जवाब में पर्रे ने सवाल उठाया कि अगर अदालत जाने की बात एक वर्ष से कही जा रही है तो अब तक याचिका क्यों नहीं दायर की गई।
परे ने बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात भी कही। उनके अनुसार भट से संवाद के लिए दो महीने पहले तीन-तीन सदस्यों की टीम बनाने पर सहमति बनी थी, लेकिन अचानक सामने आए वीडियो से भ्रम की स्थिति पैदा हुई।
उन्होंने भट के सहयोगियों की भारत सरकार से बातचीत की कोशिश का स्वागत किया और युवाओं से अपने मुद्दे कानून तथा संविधान के दायरे में उठाने की अपील की।
इस बीच पुलिस ने यूएपीए की धारा आठ के तहत जमात से जुड़ी दो इमारतें, छह दुकानें और दो कनाल जमीन कुर्क की है। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सरकार से ऐसी ‘बलपूर्वक या अपरिवर्तनीय कार्रवाई’ नहीं करने की अपील की है, जब तक मामला न्यायिक प्रक्रिया में है।
असली सवाल—क्या यह स्थायी परिवर्तन है?
जमात का संविधान में आस्था जताना कश्मीर की राजनीति में एक बड़ा संकेत जरूर है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले उसके राजनीतिक व्यवहार को देखना होगा।
क्या यह वैचारिक परिवर्तन है या परिस्थितियों से पैदा हुआ राजनीतिक समझौता? क्या अलगाववाद की पुरानी राजनीति सचमुच पीछे छूट रही है या केवल उसकी भाषा बदल रही है? और क्या संविधान को स्वीकार करने का दावा संगठन की जमीनी राजनीति में भी दिखाई देगा?
इन सवालों के जवाब समय देगा
लेकिन एक बात अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती—कश्मीर की राजनीति का पहिया पीछे की ओर नहीं, आगे की ओर घूम रहा है। जिस अलगाववादी राजनीति ने कभी भारत से दूरी को अपनी ताकत समझा था, उसके कुछ हिस्से अब भारतीय लोकतंत्र के भीतर अपना राजनीतिक भविष्य खोज रहे हैं।
‘आजादी’ के नारों से लेकर विधानसभा की चौखट तक का यह सफर कश्मीर की बदलती राजनीति की कहानी कहता है। सवाल अब यह नहीं कि अलगाववादी राजनीति मुख्यधारा में आएगी या नहीं; सवाल यह है कि संविधान की इस मुख्यधारा में आने के बाद वह अपने पुराने वैचारिक बोझ से कितनी दूरी बना पाती है
