Gandhari Review: सुरंग, बच्चियों की तस्करी और खौफनाक सच; रोंगटे खड़े करने वाले थ्रिल में ढीली पड़ी कहानी
तापसी पन्नू की फिल्म गांधारी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो चुकी है। फिल्म में बच्चियों की तस्करी जैसे अहम मुद्दे को कैसे कमजोर क्लाइमैक्स ने बिगाड़ा, पढ़ें रिव्यू।

गांधारी मूवी रिव्यू/ फोटो- जागरण ग्राफिक्स
HighLights
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई तापसी पन्नू की गांधारी
अहम मुद्दे को उठाते हुए निर्देशन ने मिस कर दी कुछ चीजें
थ्रिलर से भरपूर फिल्म का कैसे क्लाइमैक्स में बिगड़ा खेल?
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। महाभारत में गांधारी ने अपने पति के लिए आंखों पर पट्टी बांधी थी, तू अपनी बच्ची के लिए बांधेगी?’ फिल्म ‘गांधारी’ का यह संवाद फिल्म के शीर्षक और कहानी के बीच का संबंध स्पष्ट करता है। हालांकि, महाभारत की गांधारी ने पति के प्रति समर्पण और त्याग के भाव में अपनी आंखों पर पट्टी बांधी थी, जबकि फिल्म में यह एक मां के अपनी बेटी के लिए किए जाने वाले संघर्ष से जुड़ता है। ऐसे में दोनों में कोई समानता नहीं है।
फिल्म बाल यौन तस्करी (Child Sex Trafficking) जैसे गंभीर मुद्दे को केंद्र में रखती है। लेकिन लड़कियों की तस्करी पर आधारित इस कहानी में कोई नयापन नहीं है और न ही ये दमदार बन पाई है। अमूमन तस्करी को ट्रक, कार से लेकर समुद्री मार्ग से दिखाया जाता है, लेकिन इस बार सुरंगों के जरिए दिखाया गया है।
क्या है फिल्म गांधारी की कहानी?
कहानी यूं है कि गोकुल (इश्वाक सिंह) अपनी पत्नी बानी (तापसी पन्नू ) और करीब पांच साल की बेटी मिष्ठी के साथ ट्रेन से यात्रा कर रहा होता है। वह बेटी के लिए कच्चा आम लेने स्टेशन पर उतरता है। उसी दौरान बानी टॉयलेट जाती है और मिष्ठी बाहर खड़ी होती है, तभी कोई उसे उठा ले जाता है। बाहर आने पर बानी देखती है कि मिष्टी को उठाकर ले जा रहा है, वह उसके पीछे भागती है और तभी उसके सिर में चोट लगती है, वह बेहोश हो जाती है।
डॉक्टर कहते हैं कि उसकी आंखों की रोशनी अस्थायी रुप से चली गई है। वह पुलिस से अपनी खोई बेटी को ढूंढने की गुहार लगाती है,लेकिन वह इसे गंभीरता से नहीं लेती। इस दौरान बानी की मुलाकात झुनू(मीता वशिष्ठ) से होती है। झुनू भी अपनी गायब पोती की तलाश में हैं। क्या दोनों की तलाश पूरी होगी? उनकी बच्चियों के गायब होने के पीछे रहस्य क्या हैं? क्या उन्हें अपनी बेटी मिल पाएगी कहानी इस संबंध में है।
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फिल्म देखते हुए खटकेंगे कई पहलू
कनिका ढिल्लन लिखित कहानी, स्क्रीनप्ले को निर्देशक देवाशीष मखीजा ने ग्रिपिंग बनाने का पूरा प्रयास किया है,। कहानी में चौमुखी मां और मगरासुर असुर का संदर्भ बार-बार आता है। मान्यता के अनुसार, राक्षस मगरासुर बच्चों को उठाकर पाताल लोक ले जाता है। उन्हें बचाने के लिए चौमुखी देवी खुद पाताल लोक में उतरती हैं। फिल्म में इस प्रसंग को नारी शक्ति के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है।
कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी तर्क तलाशने पर निराशा हाथ लगेगी। कई पहलू खटकते हैं। मसलन बच्चों को कितनी देर तक बेहोश रखा जाता है। क्या बोरे में बंद करने पर उनकी जान जाने का खतरा नहीं रहता? गायब बच्चों के बदले उतनी लाशें कहां से आती हैं? इन बच्चों का क्या होता है? ऐसे कई पहलुओं को कहानी खंगालती नहीं है। कबायली बहरुपियों का एंगल अच्छा है, लेकिन वह कहानी में प्रभावी नहीं बन पाया है।
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कहीं-कहीं अटपटी लगती है कहानी
बानी को दिखाई नहीं देता, लेकिन सामान्य बच्चों को एक्सरसाइज कराती है। बच्चे भी उससे सवाल नहीं पूछते। झुनू ने बानी को करतब करना सिखाया था। अब झुनू को एक्शन करना सीखा रही है। यह अटपटा लगता है। बच्चों की तस्करी करने वाले ब्लैकहोल गैंग को ताकतवर बताया है, लेकिन स्क्रीन पर परिलक्षित नहीं हुआ है।
खलनायक दादा भाई (प्रशांत नारायण) को काफी समय तक आंखों और संवादों से दिखाया है। आखिर में सामने आने पर उसे लेकर बनाया खौफ और रहस्य कमजोर साबित होता है। उसका प्लान शून्य क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है। स्वास्तिका मुखर्जी का पात्र बाद में कहां गायब हो जाता है वो भी स्पष्ट नहीं है। गोकुल का पात्र भी कमजोर हैं और बानी का संघर्ष भी विश्वनीय नहीं बन पाया है। फिल्म का क्लाइमैक्स और पुलिस का पक्ष बहुत कमजोर है।
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तापसी पन्नू ने किया किरदार के साथ इंसाफ
हालांकि, क्लिंटन सीजेरो और बिनाका गोमस का बैकग्राउंड संगीत कहानी के साथ सुसंगत है । छोटे से कस्बे को सिनेमेटोग्राफर अमित राय ने बारीकी से कैद किया है। ब्राहिम अच्छाबके (brahim Acchabake), रियाज शेख, हबीब सई और अनीस शेख की एक्शन कोरियोग्राफी दिलचस्प है।
तापसी के हिस्से में कई शानदार एक्शन सीन आए हैं। उसमें वह जंची भी हैं। जबकि इश्वाक के साथ उनकी केमिस्ट्री दमदार नहीं बन पाई है। उनके संबंधों को भी बारीकी से एक्सप्लोर नहीं किया गया है। मीता वशिष्ठ, छाया कदम दी गई भूमिका साथ न्याय करती हैं। सहयोगी भूमिका में आए बाकी किरदार प्रभावी नहीं बन पाए हैं।
