कारगिल की बर्फ से महाराष्ट्र के खेतों तक, क्या आपको पता है Nana Patekar की जिंदगी से जुड़ी ये बातें?
नाना पाटेकर सिर्फ रील नहीं, बल्कि रियल लाइफ हीरो भी रहे हैं। अभिनय के साथ-साथ वह साल 1988 में जहां ...और पढ़ें

नाना पाटेकर के बारे में अनसुनी बातें/फोटो-इंस्टाग्राम
HighLights
'प्रहार' के लिए तीन साल का कठोर सैन्य प्रशिक्षण लिया
कारगिल युद्ध में जवानों के साथ संवेदनशील इलाकों में सेवा दी
किसानो की मदद के लिए छोड़ी खुद की जरुरत
जागरण न्यूज नेटवर्क, मुंबई। नाना पाटेकर (Nana Patekar) ने फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ (1991) में अभिनय करने के साथ लेखन और निर्देशन भी किया था। ‘प्रहार’ सिर्फ उनकी अभिनय यात्रा की महत्वपूर्ण फिल्म नहीं थी, बल्कि इसी फिल्म की तैयारी ने सेना के साथ उनके रिश्ते को और मजबूत किया।
तीन साल तक ली कड़ी सैन्य शिक्षा
फिल्म में मेजर प्रताप चौहान का किरदार निभाने के लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के बेलगावी केंद्र में करीब तीन साल का कठोर सैन्य प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उन्होंने तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल वी.के. सिंह के साथ प्रशिक्षण किया। नाना साल 1988 में टेरिटोरियल आर्मी में कैप्टन के रूप में शामिल हुए थे। टेरिटोरियल आर्मी उन नागरिकों के लिए भारतीय सेना से जुड़ने का अवसर है, जो अपने पेशे के साथ सैन्य जिम्मेदारी भी निभाना चाहते हैं।
यह पूर्णकालिक सेवा नहीं है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसके अधिकारी और जवान नियमित सेना के साथ सैन्य ड्यूटी निभाते हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सेना के साथ रहने की अनुमति मांगी। विशेष अनुमति मिलने के बाद वह द्रास, कुपवाड़ा, बारामुला और सोपोर जैसे संवेदनशील इलाकों में जवानों के साथ रहे। उस दौरान उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ काम किया और क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा भी रहे।

खबरों के अनुसार उन्होंने करीब 60 दिन जवानों के साथ बिताए और उनका वजन लगभग 76 किलो से घटकर 56 किलो रह गया। साल 2013 में उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर अपनी सैन्य सेवा पूरी की।
ऐसे की थी 'नाम' फाउंडेशन की शुरुआत
अभिनय की दुनिया में चमकने के बावजूद नाना पाटेकर खुद भी खेती और गांव के जीवन से काफी जुड़े हुए थे। पुणे के खडकवासला में उनका फार्महाउस है। वहां गेहूं, चावल, दाल और दूसरी फसलें उगाई जाती हैं। नाना खुद खेती के काम में दिलचस्पी लेते थे और खेत पर काम करने वाले लोगों की भी चिंता करते थे।
साल 2015 में महाराष्ट्र भयंकर सूखे से गुजर रहा था। किसानों की फसलें बर्बाद हो रही थीं, कर्ज बढ़ रहा था और किसान आत्महत्याओं की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। इसी दौरान नाना टीवी देख रहे जिसमें आत्महत्या करने वाले किसान के स्वजन का साक्षात्कार चल रहा था। उसे देखकर नाना को उनकी शाम की भूख नजर आई। नाना ने किसानों की मदद करने की सोची।

कार के लिए जमा पैसे किसानों में बांटे
नाना ने अपनी कार के लिए जमा किए गए डेढ़ करोड़ रुपये को किसानों की मदद हेतु देना तय किया। उन्हें लगा कि किसानों के पास पानी जैसी सुविधा नहीं है और मैं गाड़ी से चलूं। यह बात उन्हें कचोटने लगी। उन्होंने अपने दोस्त और फिल्मकार मकरंद अनासपुरे को फोन किया। उन्हें कलेक्टर के ऑफिस से किसानों की लिस्ट निकाल कर 15-15 हजार रुपये चेक देने को कहा। पहले चेक बीड में बांटे गए। वहां पहुंचने पर नाना ने ऐसे परिवारों का दर्द महसूस किया।
सितंबर, 2015 में उन्होंने नाम फांउडेशन की शुरुआत की। लेकिन जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि केवल कुछ हजार रुपये की मदद से किसान परिवार की जिंदगी नहीं बदलेगी। किसान की समस्या की जड़ पानी का संकट है। अनियमित बारिश के अलावा जंगलों की कमी, पानी के संरक्षण की खराब व्यवस्था, भूजल का असंतुलित इस्तेमाल, पानी ज्यादा लेने वाली फसलें, बांधों में जमा गाद और खराब नहर व्यवस्था भी संकट को बढ़ाते हैं। इसलिए जल-संरक्षण की ओर कदम बढ़ाया।

नदियों और नालों को गहरा करना, तालाबों और जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना, बांधों से गाद निकालना, नहरों को फिर से उपयोगी बनाना और भूजल को बचाना ये संस्था के प्रमुख काम बन गए। 2024 में नासिक के एक किसान सम्मेलन में उन्होंने किसानों से सरकार से केवल मदद मांगने के बजाय अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर सक्रिय होने की बात कही थी।
