प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा संस्थान आईआईटी बॉम्बे में एक छात्र की आत्महत्या को लेकर जिस तरह दलगत राजनीति भी होनी शुरू हो गई है, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही है। राजनीतिक दलों को कम से कम ऐसे किसी मामले पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से बाज आना चाहिए, जिससे समाज में वैमनस्य पैदा होने का खतरा हो। यह इसलिए और भी आवश्यक है, क्योंकि अभी यह स्पष्ट नहीं कि छात्र साहिल रवींद्र वाकोडे ने आत्महत्या क्यों की।

आईआईटी बॉम्बे प्रबंधन के अनुसार उसे मोबाइल फोन के जरिये नकल करते पकड़ा गया था, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। बाद में उसने हास्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली। यह खबर आते ही साहिल के पिता ने यह आरोप लगाया कि उसे तीन माह से प्रताड़ित किया जा रहा था और जातिसूचक गालियां दी जा रही थीं, लेकिन यह अनुत्तरित ही है कि इसका उल्लेख पहले क्यों नहीं किया गया और संस्थान के एससी-एसटी सेल में इसकी शिकायत क्यों नहीं की गई?

यह ठीक नहीं कि इन प्रश्नों का उत्तर सामने आने और जांच पूरी होने के पहले ही साहिल को नकल करते हुए पकड़ने वाले शिक्षक सूर्यनारायण दुल्ला पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया। आखिर जब आईआईटी बॉम्बे प्रबंधन तंत्र के साथ मुंबई क्राइम ब्रांच घटना की जांच कर रही है और इस जांच के चलते प्रोफेसर दुल्ला को डीन पद से हटा दिया गया है, तब फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचने का क्या औचित्य कि साहिल को प्रताड़ित करने के साथ आत्महत्या के लिए विवश किया गया?

उचित यही है कि आत्महत्या करने वाले छात्र के स्वजन, आईआईटी बॉम्बे के छात्र और राजनीतिक दल साहिल की मौत की जांच की प्रतीक्षा करें। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि आईआईटी जैसे संस्थान उन कारणों की पहचान कर उनका निवारण करें, जिनके चलते छात्र रह-रहकर आत्महत्या करते रहते हैं। यह सामान्य बात नहीं कि बीते कुछ माह में आईआईटी बॉम्बे के ही चार छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। ऐसे ही मामले अन्य आईआईटी में भी देखने को मिले हैं।

चूंकि आत्महत्या करने वाले छात्र सभी वर्गों के रहे हैं, इसलिए इस नतीजे पर पहुंचना सही नहीं कि इन संस्थानों में वर्ग विशेष के छात्रों के प्रति भेदभाव होता है, लेकिन इतना तो है ही कि छात्रों को तनावमुक्त वातावरण प्रदान करने की आवश्यकता है। आईआईटी देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान हैं। इन संस्थानों में पठन-पाठन का स्तर और साथ ही माहौल ऐसा होना चाहिए, जिससे किसी भी छात्र को आत्महत्या न करना पड़े। इसके लिए शिक्षक-छात्र अनुपात बेहतर करने के साथ ही पढ़ाई में कमजोर और किसी कारण मानसिक रूप से परेशान छात्रों की काउंसिंलिग के तंत्र को सुधारा भी जाना चाहिए, क्योंकि इसमें कमी दिख रही है।