‘मम्मी-पापा ने वापस बुला लिया’, हादसे ने डराया तो खाली होने लगे सत्य निकेतन के PG, कई ने बदला ठिकाना
सत्य निकेतन में हुए हादसे के बाद पीजी में रहने वाले छात्र दहशत में हैं, जिससे पढ़ाई बाधित हो रही ...और पढ़ें

पीजी खाली कर जाते छात्र । जागरण
HighLights
हादसे के बाद सत्य निकेतन के छात्र दहशत में।
पढ़ाई बाधित होने से छात्र घर लौट रहे या शिफ्ट हो रहे।
परिजनों की चिंता बढ़ी, आर्थिक मजबूरियां भी सामने आईं।
जागरण संवाददाता, दक्षिणी दिल्ली। हादसे के बाद सत्य निकेतन के पीजी में रहने वाले छात्र दहशत में हैं। लगभग एक सप्ताह तक पढ़ाई बाधित रहने का आशंका है। ऐसे में छात्र छात्राएं या तो दिल्ली में अपने रिश्तेदारों के यहां शिफ्ट हो रहे है या वापस अपने घर लौट रहे हैं।
स्वजन भी चिंतित हैं और बच्चों को वापस बुला रहे हैं। पटना की रोशनी बीकाम प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। मकान नंबर 129 में संचालित पीजी में रहती हैं। दोपहर में उनकी ट्रेन थी। पीजी से निकलते हुए उन्होंने बताया कि क्लास अभी कुछ दिन नहीं चलेगी।
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घरवाले परेशान हैं। मम्मी-पापा दोनों ने वापस आने को कहा है। टिकट भी करा दी। माहौल ठीक होने पर दिल्ली लौटूंगी।
हादसे के बाद छात्रों के साथ-साथ उनके परिजन भी चिंतित हैं। छात्रा सिंपल बताती हैं कि उनकी मां लगातार पीजी बदलने के लिए कह रही हैं। मम्मी कह रही हैं कि सत्य निकेतन छोड़कर दूसरी जगह चली जाऊं, लेकिन संचालक के पास दो महीने की सिक्योरिटी मनी जमा है।
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खुद पीजी छोड़कर जाऊंगी तो आर्थिक नुकसान होगा। इतनी जल्दी दूसरी जगह पीजी मिलना भी आसान नहीं है। यहां सहेलियां और क्लास के बच्चे हैं, इसलिए दूसरी जगह जाने में भी डर लगता है।
सुबह-शाम हाल चाल ले रहे घरवाले
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू-मनाली से दिल्ली पढ़ने आईं दिव्यांशी ठाकुर पहले आनंद निकेतन में रहती थीं और इस वर्ष ही सत्य निकेतन शिफ्ट हुई। उनका कहना है कि हादसे के बाद घरवाले सुबह-शाम फोन कर हाल पूछ रहे हैं।
वहीं दिव्या कहती हैं कि हादसे के बाद इलाके के छात्रों में डर का माहौल है। उन्होंने सत्य निकेतन में रहने के बजाय राजौरी गार्डन में फ्लैट लिया था, क्योंकि उन्हें यहां की कई इमारतों की हालत ठीक नहीं लगी। मेरी कई सहेलियां सत्य निकेतन के पीजी में रहती हैं। उनके कमरों और इमारतों की हालत देखकर डर लगता है।

हमारी आर्थिक स्थिति ठीक है, इसलिए दूसरी जगह रहने का विकल्प मिल गया। लेकिन जिनके पास पैसे और विकल्प दोनों नहीं हैं, वे मजबूरी में ऐसी जगहों पर रहने को मजबूर हैं। हादसे के बाद मेरी सहेलियां बहुत डरी हुई हैं। दो को मैं अपने साथ ले जाने आई हूं।
