काशी-अयोध्या की तर्ज पर मथुरा-वृंदावन का होगा कायाकल्प, ASI खोलेगा 5000 साल पुरानी संस्कृति के राज
काशी और अयोध्या की तर्ज पर मथुरा-वृंदावन को मेगा टूरिस्ट सर्किट के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसमें ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।
HighLights
मथुरा-वृंदावन को मेगा टूरिस्ट सर्किट के रूप में विकसित किया जा रहा है।
एएसआइ ने क्षेत्र में 5000 साल पुराने अवशेष खोजे हैं।
खोदाई में कौरव-पांडव कालीन चित्रित धूसर मृद्भांड मिले।
वी के शु़क्ला, नई दिल्ली। काशी और अयोध्या की तर्ज पर अब मथुरा-वृंदावन के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों को भी आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ने की दिशा में काम आगे बढ़ रहा है।
केंद्र सरकार ने काशी, अयोध्या के साथ साथ मथुरा के आध्यात्मिक गलियारों के विकास की बात कही है, इनका उद्देश्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक और विरासत पहचान को बनाए रखना है।
इस कार्य में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) भी अपने तरीके से योगदान देने की रणनीति बना रहा है।
मेगा टूरिस्ट सर्किट के रूप में विकसित करने की तैयारी
यहां बता दें कि मथुरा-वृंदावन को मेगा टूरिस्ट सर्किट के रूप में विकसित करने की केंद्र के पर्यटन मंत्रालय के साथ साथ राज्य सरकार की परियोजना पर पिछले कई साल से काम चल रहा है। इसमें गोवर्धन में अवसंरचनात्मक सुविधाओं के विकास की परियोजनाएं भी शामिल हैं।
इस पूरे विकास में एएसआइ भी अपनी भूमिका तलाश रहा है। एएसआइ के पास पुरातात्विक सर्वेक्षण, वैज्ञानिक खोदाई, दस्तावेजीकरण, संरक्षण, पुरावशेषों की पहचान और वैज्ञानिक अध्ययन की विशेषज्ञता है।
जिसने इस क्षेत्र में पिछले 50 सालों में कई खोदाइयों की हैं और मथुरा से लेकर गोवर्धन तक भारतीय प्राचीन संस्कृति के प्रमाण एकत्रित किए गए हैं।
मथुरा में एएसआइ की पुरानी खोदाइयों से अलग-अलग कालखंडों की सांस्कृतिक परतों की जानकारी मिली है। 1973-74 से 1976-77 के बीच मथुरा में करीब 14 स्थानों पर हुई खोदाई से छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक की सांस्कृतिक निरंतरता के प्रमाण सामने आए हैं।
पिछले सालों में गोवर्धन क्षेत्र के आसपास भी पुरातात्विक सर्वेक्षण और खोदाई ने नए प्रमाण सामने लाए हैं। इसकी 6 हिस्सों में तैयार हुई 2550 पन्नों की फाइनल विस्तृत रिपाेर्ट कुछ माह पहले ही एएसआइ मुख्यालय को सौंपी गई है।
यह खोदाई गोवर्धन के पास डींंग ज़िले के बहाज में हुई है। यहां की खोदाई में रेडियोमेट्रिक डेटिंग से पता चला है कि परतें बनाने वाला जमाव लगभग 5000 साल पुराना है और यहां एक ट्रेंच में कौरव-पांडव कालीन मानी जाने वाली पीजीडब्ल्यू (चित्रित धूसर मृदभांड) खोदाई में लगातार 6.5 मीटर तक मिला है।
दुनिया के सामने अध्ययन रिपोर्ट लाने का समय
एएसआइ मान रही है कि अब समय आ गया है कि बहाज गोवर्धन संस्कृति के मिट्टी के लाल बर्तनों की एक विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट दुनिया के सामने लाई जाए। इससे पहले मथुरा के ही बरनौली की ढाई की रिपोर्ट भी एएसआइ मुख्यालय को सौेपी गई हैं।
खोदाई में मिले सिक्के, मृद्भांड, प्रतिमाएं, वास्तु अवशेष और दैनिक जीवन से संबंधित अन्य सामग्री को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित कर उनकी काल-निर्धारण प्रक्रिया की जा चुकी है।
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