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    अल्जाइमर के इलाज में भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता: खोजा नया 'I43 अणु'; अब याददाश्त बचाना होगा आसान

    Updated: Sun, 22 Feb 2026 09:33 PM (IST)

    भारतीय वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर के उपचार में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। IIT BHU, AIIMS दिल्ली और NII की संयुक्त टीम ने 'I-43' नामक एक नया अणु खोजा ह ...और पढ़ें

    अल्जाइमर जैसी गंभीर और बढ़ती दिमागी बीमारी के उपचार की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

    अल्जाइमर जैसी गंभीर और बढ़ती दिमागी बीमारी के उपचार की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

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    अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। अल्जाइमर जैसी गंभीर और बढ़ती दिमागी बीमारी के उपचार की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। देश के प्रमुख संस्थानों आईआईटी बीएचयू, एम्स नई दिल्ली और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलाॅजी के चिकित्सकों और शोधकर्ताओं की संयुक्त टीम ने ‘आई-43’ नामक एक नए सक्रिय अणु (माॅलिक्यूल) की खोज की है। ये दिमाग के भीतर जाकर इस बीमारी के कारकों की पहचान और उन्हें रोकने-खत्म का काम करेगा।

    क्लीनिकल ट्रायल आरंभ हो जाएंगे

    विशेषज्ञों का दावा है कि आई-43’ एक साथ जांच और उपचार दोनों काम कर सकता है। यही वजह है कि अल्जाइमर के उपचार में इसे भविष्य के लिए उम्मीद भरी खोज माना जा रहा है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है। इस सक्रिय अणु की खोज के लिए शोधकर्ता की ओर से पेटेंट भी दाखिल किया जा चुका है। आवश्यक औपचारिकता और अनुमति के बाद क्लीनिकल ट्रायल आरंभ हो जाएंगे।

    रक्त-मस्तिष्क बाधा

    इस शोध में एम्स नई दिल्ली की टीम का नेतृत्व करने वाले बायो फिजिक्स विभाग के एडीशनल प्रो. डाॅ. सरोज कुमार के अनुसार आसान शब्दों में समझें तो ‘आई-43’ ऐसा खास तत्व है जो दिमाग तक पहुंच सकता है। आमतौर पर दिमाग के चारों ओर एक सुरक्षा परत होती है, जिसे रक्त-मस्तिष्क बाधा (ब्लड-ब्रेन बैरियर) कहा जाता है। कई दवाएं इसे पार नहीं कर पातीं, लेकिन ‘आई 43’ इस बाधा को पार कर सीधे दिमाग में असर करता है।

    बीमारी का जल्दी पता लगाने में मदद

    अल्जाइमर में दिमाग में जमा होने वाला ‘अमाइलाइड-बीटा प्लाक’ नामक हानिकारक पदार्थ (एंजाइम) वहां मौजूद ‘एसिटाइलकोलिन’ नामक महत्वपूर्ण रसायन को नष्ट कर देता है, इससे याददाश्त कमजोर होने लगती है। आइ-43 इस एंजाइम की पहचान कर बीमारी का जल्दी पता लगाने में मदद करता है। इतना ही आइ-43 इसके साथ-साथ उस हानिकारक एंजाइम को रोकने और खत्म करने में भी सक्षम है, जो एसिटाइलकोलिन नामक जरूरी रसायन को नष्ट करता है।

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    अल्जाइमर के इलाज में बड़ा कदम

    एसिटाइलकोलिन याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता के लिए जरूरी होता है। इसके नष्ट होना रूकने से अल्जाइमर पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है। पूरी तरह स्वदेशी अनुसंधान पर आधारित यह उपलब्धि भारत की वैज्ञानिक क्षमता को वैश्विक स्वीकार्यता दिलाने के साथ-साथ आगे और परीक्षणों के बाद यह अल्जाइमर के प्रभावी इलाज की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

    शोधकर्ताओं की टीम का इन्होंने किया नेतृत्व

    • एम्स नई दिल्ली की टीम का नेतृत्व प्रो. डाॅ. सरोज कुमार ने किया
    • आईआईटी बीएचयू की टीम का नेतृत्व प्रो. डाॅ. ज्ञान पी. मोदी ने किया
    • नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलाजी से प्रो. डाॅ. सारिका गुप्ता ने किया

    क्या होता है अल्जाइमर?

    सामान्य भाषा में अल्जाइमर को स्मृति लोप (याददाश्त खोने) की बीमारी भी कहा जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अल्जाइमर दरअसल डिमेंशिया (मस्तिष्क क्षीणता) का सामान्य प्रकार है। इसमें याददाश्त के साथ-साथ सोचने-समझने, निर्णय लेने और पहचानने व बोलने और समझने की क्षमता प्रभावित होती है। इस कारण काम करने की योग्यता धीरे-धीरे खत्म होती जाती है।

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