हिंदी परिचर्चा के बीच गरमाया सत्य निकेतन हादसा, DU कुलपति के खिलाफ NSUI ने किया प्रदर्शन
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में 'विकसित भारत' पर परिचर्चा के दौरान सत्य निकेतन हादसे को लेकर कुलपति प्रो. योगेश ...और पढ़ें
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डीयू में गूंजा सत्य निकेतन हादसा। फाइल फोटो
HighLights
डीयू में 'विकसित भारत' परिचर्चा के दौरान एनएसयूआई का प्रदर्शन।
सत्य निकेतन हादसे को लेकर कुलपति प्रो. योगेश सिंह का विरोध।
छात्र सुरक्षा में संवेदनहीनता का आरोप, कुलपति के इस्तीफे की मांग।
जागरण संवादददाता, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के हिंदी विभाग में मंगलवार को विकसित भारत : हिंदी भाषा और साहित्य विषय पर परिचर्चा चल रही थी, लेकिन कार्यक्रम के दौरान सत्य निकेतन भवन हादसा भी चर्चा के केंद्र में आ गया।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे डीयू के कुलपति प्रो. योगेश सिंह के खिलाफ एनएसयूआइ कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। छात्र संगठन ने कुलपति पर छात्रों की सुरक्षा और हादसे से प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदनहीन रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए उनके तत्काल इस्तीफे की मांग की।
सुरक्षा प्राथमिकता नहीं
कला संकाय स्थित वंदे मातरम् सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान एनएसयूआइ कार्यकर्ताओं ने सत्य निकेतन हादसे को लेकर सवाल उठाए। संगठन का आरोप था कि विश्वविद्यालय प्रशासन की प्राथमिकता छात्रों की सुरक्षा होनी चाहिए, लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई।
प्रदर्शनकारियों ने कुलपति के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की।
प्रदर्शन के बीच आयोजित कार्यक्रम में कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने अपने संबोधन में भाषा की ताकत और साहित्य की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा कि भाषा की शक्ति उसके बोलने वालों की शक्ति होती है, केवल व्याकरण किसी भाषा को शक्तिशाली नहीं बनाता।
उन्होंने हिंदी को सहज, सरल और दूसरी भाषाओं के शब्दों को स्वीकार करने वाली भाषा बनाने पर जोर दिया। प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि भारत की उन्नति हिंदी की उन्नति से जुड़ी है। उन्होंने साहित्य को राष्ट्रचेतना के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि लेखकों को 22वीं सदी को ध्यान में रखकर लिखना चाहिए।
भाषा बचेगी तो समाज और सभ्यता भी बचेगी
परिचर्चा की शुरुआत वरिष्ठ प्रो. सुधा सिंह के विषय-परिचय से हुई। उन्होंने हिंदी के भविष्य, तकनीक और भाषा के बदलते संबंध तथा शास्त्रीय भाषा के महत्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भाषा बचेगी तो समाज और सभ्यता भी बचेगी और भाषा का जनता से जुड़ना जनचेतना के विकास के लिए जरूरी है।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार ममता कालिया ने साहित्य और कहानी की भूमिका पर विचार रखते हुए कहा कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हम उपन्यास बनते चले जाते हैं। उन्होंने कलम की शक्ति को रेखांकित करते हुए कहानी को दिमाग को जगाने वाला माध्यम बताया।
डा. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने भाषा को बहता नीर बताते हुए कहा कि भाषा को रोका नहीं जा सकता। उन्होंने भाषा और संस्कृति के गहरे संबंध व अनुवाद की भूमिका पर प्रकाश डाला और कविताओं के माध्यम से भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में प्रो. बलराम पाणि, प्रो. रजनी अब्बी समेत अन्य शिक्षाविद् और साहित्यकार मौजूद रहे।
