'स्वच्छ शौचालय कर्मचारी की गरिमा का हिस्सा', दिल्ली HC ने जामिया की महिला प्रोफेसर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई रद की
दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की एक वरिष्ठ महिला प्रोफेसर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द कर दी है। ...और पढ़ें
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दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जामिया) की एक वरिष्ठ महिला प्रोफेसर के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद कर दिया है।

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जामिया) की एक वरिष्ठ महिला प्रोफेसर के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद कर दिया है। प्रोफेसर ने कार्यस्थल पर स्वच्छ, उपयोगी और गरिमापूर्ण शौचालय की सुविधा की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने उनका बुनियादी अधिकार माना। न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर साफ-सुथरे और सम्मानजनक शौचालय तक पहुंच, कर्मचारियों की गरिमा से जुड़ा अहम हिस्सा है। ऐसे में प्रोफेसर के खिलाफ की गई कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं है।
क्या था जामिया में शौचालय का मामला?
मामला उस समय शुरू हुआ जब प्रो. सुजाता आचार्य ने विश्वविद्यालय में वेस्टर्न स्टाइल कमोड की मांग उठाई। उन्होंने अपनी मेडिकल स्थिति का हवाला देते हुए कहा था कि भारतीय शैली वाले शौचालय का उपयोग करना उनके लिए कठिन है। इस पर विश्वविद्यालय ने अगस्त 2025 में उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में एक समिति बनाकर उनके व्यवहार पर आपत्ति जताई।
जामिया प्रशासन ने मांग पर क्या कहा?
विश्वविद्यालय का आरोप था कि प्रोफेसर ने शिकायत दर्ज कराने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। जनवरी 2026 में समिति ने उनसे लिखित माफी मांगने को भी कहा था। हालांकि, हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालय के इस रुख को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इस तरह की शिकायत को अनुशासनात्मक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में टकराव नहीं, बल्कि संवाद की जरूरत होती है।
आज की सुनवाई में क्या हुआ?
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि महिलाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल में स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं। साथ ही, जामिया प्रशासन को निर्देश दिया कि वह प्रोफेसर की शिकायत पर चार सप्ताह के भीतर संवेदनशीलता के साथ पुनर्विचार करे और तब तक उन्हें उपयुक्त शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराए।
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