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दिल्ली में प्रदूषण पर अरबों खर्च, फिर भी 285 दिन जहरीली हवा; सवालों के घेरे में सरकारी उपाय

Published: Fri, 21 Aug 2026 10:04 PM (IST)

दिल्ली में वायु प्रदूषण अब एक स्थायी स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है, जहां अरबों खर्च के बावजूद 285 दिन जहरीली ...और पढ़ें

मथुरा रोड पर पानी का छिड़काव करता स्माग गन। जागरण आर्काइव

मथुरा रोड पर पानी का छिड़काव करता स्माग गन। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. दिल्ली में 365 में से 285 दिन जहरीली हवा।

  2. प्रदूषण पर अरबों खर्च, पर उपाय अप्रभावी साबित हुए।

  3. निवासी प्रदूषण से 8-11.9 वर्ष जीवन प्रत्याशा खो रहे।

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। देश की राजधानी में वायु प्रदूषण अब एक मौसमी आपदा नहीं, बल्कि स्थायी स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। हर साल स्माग टावर, एंटी-स्माग गन, ग्रेप, धूल नियंत्रण के उपायों, वाहनों पर रोक और ई-वाहनों के बड़े-बड़े दावों के बावजूद दिल्लीवासी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

प्रयासों का लंबा इतिहास, लेकिन जमीन पर ढाक के तीन पात

ग्रेप और आड-इवन : गंभीर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) होने पर ग्रेप के अलग-अलग चरण लागू किए जाते हैं। इनमें आड इवन भी शामिल है।

-तकनीकी उपाय : शहर के प्रमुख चौराहों पर करोड़ों रुपये की लागत से स्माग टावर लगाए गए और सड़कों पर धूल बैठाने के लिए पानी का छिडकाव किया जाता है, साथ ही एंटी-स्माग गन तैनात की जाती है।

-इलेक्ट्रिक वाहन और बायो-डिकंपोजर : पराली को घोलने के लिए बायो-डिकंपोजर और ई-वाहनों को बढ़ावा देने की योजनाएं बनाई गईं।

-वाहनों पर रोक : हर साल प्रदूषण बढ़ने पर विभिन्न श्रेणियों में पेट्रोल और डीजल के वाहन बंद कर दिए जाते हैं।

ये सभी नीतियां अल्पकालिक और प्रतिक्रियात्मक साबित हुई हैं, जिनका दीर्घकालिक असर शून्य के बराबर रहा है।

आंकड़ों की जुबानी : क्यों विफल साबित हो रहे हैं उपाय?

विभिन्न शोध- सरकारी रिपोर्टों (सीपीसीबी, सीएसई और सीआरईए) के आंकड़े दिल्ली की असल तस्वीर बयां करते हैं:-

-365 में से 285 दिन जहरीली हवा : सेंटर फार रिसर्च आन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में औसतन 285 दिन वायु गुणवत्ता तय राष्ट्रीय मानकों से खराब दर्ज की जाती है।

-एक भी दिन ''साफ'' नहीं : दिल्ली में सालाना औसत एक्यूआइ अक्सर 200 के पार रहता है। सर्दियों के समय एक भी दिन हवा की गुणवत्ता ''अच्छी'' श्रेणी में दर्ज नहीं हो पाती।

-पीएम 2.5 और पीएम 10 का प्रकोप : दिल्ली में पीएम 10 का सालाना स्तर औसतन 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच जाता है, जो कि सुरक्षित राष्ट्रीय मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से तीन गुना से भी अधिक है।

-उम्र पर वार : शिकागो विश्वविद्यालय के एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुसार, दिल्ली के निवासी प्रदूषण के कारण अपनी संभावित जीवन प्रत्याशा के करीब 8 से 11.9 वर्ष खो रहे हैं।

प्रदूषण का स्रोत योगदान % में विफलता का कारण

-वाहनों से उत्सर्जन 45% - 50% सड़कों पर निजी गाड़ियों का बढ़ता दबाव और सार्वजनिक परिवहन की कमी

-सीमा पार प्रदूषण (एनसीआर) 60% - 65% दिल्ली एवं एनसीआर के बीच क्षेत्रीय नीति का अभाव

-धूल एवं निर्माण कार्य 15% - 20% मैकेनिकल स्वीपिंग और निर्माण स्थलों पर नियमों का सख्ती से पालन न होना

-मौसम व पराली 10% - 20% (सर्दियों में) अंतर-राज्यीय समन्वय और पराली प्रबंधन के स्थायी साधनों की कमी

विफलता के असली कारण

सीपीसीबी के पूर्व अपर निदेशक डा दीपांकर साहा के अनुसार दिल्ली के प्रदूषण से निपटने में सबसे बड़ी अड़चन राजनीतिक खींचतान और योजनागत खामियां हैं। वायु प्रदूषण का कोई प्रशासनिक दायरा नहीं होता।

यह एक पूरे क्षेत्र को प्रभावित करता है। जब तक दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के पड़ोसी जिलों में सख्त औद्योगिक और कृषि नीतियां लागू नहीं होंगी, तब तक दिल्ली में सिर्फ पटाखे बैन करने या पानी छिड़कने से हवा साफ नहीं होगी।

तकनीकी उपाय जैसे स्माग टावर वैज्ञानिकों द्वारा पहले ही अप्रभावी घोषित किए जा चुके हैं। जब तक जमीनी स्तर पर सार्वजनिक परिवहन सुधार, निर्माण धूल पर स्थायी रोक और स्वच्छ ईंधन को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, दिल्ली हर सर्दी में ''गैस चैंबर'' बनती रहेगी।

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