दशरथपुरी का ड्रेनेज सिस्टम 'बंधक', रसूखदारों ने निगला सरकारी नाला; अधिकारी बने तमाशबीन
पश्चिमी दिल्ली के दशरथपुरी नाले पर रसूखदारों ने अवैध रूप से कब्जा कर उसे ढक दिया है, जिससे एनजीटी और दिल्ली सरकार के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। सिंच ...और पढ़ें
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पश्चिमी दिल्ली के दशरथपुरी नाले पर रसूखदारों ने अवैध रूप से कब्जा कर उसे ढक दिया है।
HighLights
दशरथपुरी नाले पर रसूखदारों ने किया अवैध कब्जा।
एनजीटी और दिल्ली सरकार के नियमों का उल्लंघन।
अधिकारियों की निष्क्रियता से सफाई और जल निकासी बाधित।
गौतम कुमार मिश्रा, पश्चिमी दिल्ली। क्या कोई सरकारी नियम सिर्फ कागजों पर धूल फांकने के लिए बनते हैं? अगर आपको इसका जीता-जागता उदाहरण देखना हो, तो डाबड़ी से दशरथपुरी की ओर चले आइए। यहां एनजीटी और दिल्ली सरकार के उन सख्त कानूनों की सरेआम अनदेखी हो रही है, जो कहते हैं कि जल निकासी को सुचारू रखने के लिए किसी भी बड़े नाले को ढका नहीं जा सकता।
डाबड़ी पालम रोड के किनारे से गुजरने वाले दशरथपुरी नाले के सवा किलोमीटर के टुकड़े पर सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग ने अपनी आंखें ऐसी मूंदी हैं कि रसूखदारों ने पूरे नाले को ही निगल लिया है। यह नाला अब ड्रेनेज सिस्टम कम, और रसूखदारों की निजी जागीर ज्यादा नजर आता है।
कानून क्या है
दिल्ली के ड्रेनेज मास्टर प्लान और पर्यावरण नियमों के मुताबिक, बड़े नालों को कंक्रीट से ढकना पूरी तरह प्रतिबंधित है। ऐसा इसलिए क्योंकि ढके हुए नालों में जहरीली गैसें (जैसे मीथेन) जमा होती हैं, उनकी प्राकृतिक सफाई नामुमकिन हो जाती है और मानसून में ये शहर को डुबाने का मुख्य कारण बनते हैं।
हो ये रहा है
डाबड़ी-पालम रोड के किनारे बहने वाले इस नाले के ऊपर अतिक्रमण की ''अति'' हो चुकी है। नाले के दोनों तरफ सड़क और इमारतों के बीच जो भी दूरी थी, उसे नाले को पाटकर पाट दिया गया है। सड़क किनारे स्थित बड़े-बड़े शोरूम, निजी अस्पतालों और स्कूलों ने ग्राहकों की आवाजाही के लिए नाले के ऊपर भारी कंक्रीट के लेंटर डाल दिए हैं या स्टील की चादरें बिछा दी हैं। जिस नाले पर पैर रखना भी मना होना चाहिए था, उसे ढककर अब गाड़ियां पार्क की जा रही हैं।
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कई जगह नाला अदृश्य
स्थिति यह है कि यह नाला किसी जादुई खेल की तरह काम कर रहा है। सड़क पर चलते हुए यह अचानक आंखों से ओझल हो जाता है और कुछ मीटर आगे जाकर एकाएक दिखने लगता है। यह नाला अब धीरे-धीरे एक संकरी नाली में तब्दील हो चुका है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, रसूखदारों के पक्के निर्माण के कारण सफाई मशीनें नाले के भीतर तक नहीं पहुंच पातीं। जो हिस्सा खुला है, वहां कर्मचारी अनमने ढंग से थोड़ी-बहुत गाद निकाल देते हैं।
निकाला गया गाद भी हफ्तों तक सड़क किनारे पड़ा रहता है। हल्की सी बारिश होते ही वह पूरी गंदगी बहकर वापस नाले में समा जाती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब लोग नाले पर कंक्रीट डाल रहे थे, तब विभाग के अफसर क्या एसी कमरों में सो रहे थे? अगर पहली ही ईंट रखने पर कार्रवाई की जाती, तो आज पूरा ड्रेनेज सिस्टम बंधक नहीं बनता।