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एलएंडटी पर कब्जे की जंग, धीरूभाई की एंट्री और अनिल-टीना की शादी; अंबानी खानदान के हाथ से कैसे निकल गई L&T? 

Published: Tue, 08 Sep 2026 08:09 PM (IST)Updated: Tue, 08 Sep 2026 08:17 PM (IST)

L&T Reliance Controversy: 1980 के दशक का एक किस्सा मशहूर है, जो एलएंडटी और धीरूभाई अंबानी से जुड़ा है। माना ...और पढ़ें

L&T पर कब्जे की जंग में रोड़ा बनी थी अनिल-टीना की शादी? धीरूभाई अंबानी के हाथ से कैसे निकल गई एलएंडटी

L&T पर कब्जे की जंग में रोड़ा बनी थी अनिल-टीना की शादी? धीरूभाई अंबानी के हाथ से कैसे निकल गई एलएंडटी

HighLights

  1. धीरूभाई अंबानी ने एलएंडटी पर नियंत्रण का प्रयास किया।

  2. अनिल अंबानी की शादी के समय एलएंडटी संघर्ष चरम पर था।

  3. सरकारी हस्तक्षेप से अंबानी परिवार को पीछे हटना पड़ा।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| एक तरफ देश की बड़ी इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनी लार्सन एंड टुब्रो यानी एलएंडटी (L&T) थी, दूसरी तरफ तेजी से अपना साम्राज्य खड़ा कर रहा अंबानी परिवार। लेकिन यह सिर्फ शेयर खरीदने और बोर्ड में डायरेक्टर बनाने की कहानी नहीं थी। इसके बीच कंपनी के पुराने मैनेजमेंट, वित्त मंत्रालय, सरकारी वित्तीय संस्थाएं, अदालतें, अखबार और आखिर में खुद धीरूभाई अंबानी तक आमने-सामने आ गए थे। और इस पूरी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब अनिल अंबानी की शादी फिल्म स्टार टीना मुनीम से होने वाली थी और उसी समय एलएंडटी की सत्ता की लड़ाई (L&T Reliance Controversy) भी अपने बेहद अहम दौर में पहुंच चुकी थी।

सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ, जिस कंपनी को धीरूभाई अंबानी रियालंस (Dhirubhai Ambani L&T) की सबसे बड़ी कंपनी बनाना चाहते थे, वो उनके हाथ से कैसे निकल गई? L&T में ऐसा क्या हुआ था कि 1980 के दशक के आखिर से लेकर 1990 के दशक तक यह कंपनी अंबानी परिवार के लिए इतनी बड़ी लड़ाई बन गई। चलिए समझते हैं अंबानियों की दिलचस्प कॉरपोरेट जंग की कहानी।

जब L&T में अंदर ही अंदर शुरू हुई उथल-पुथल

साल 1986 की सर्दियां थीं। L&T मुश्किल दौर से गुजर रही थी। कंपनी के टॉप अधिकारियों के बीच सत्ता की लड़ाई छिड़ चुकी थी। इस लड़ाई का असर सिर्फ बोर्डरूम तक नहीं रहा। कंपनी से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आने लगे, जो उसके लिए शर्मिंदगी का कारण बन रहे थे। शिपिंग डिवीजन में गड़बड़ियों के आरोप थे। कुछ इस्तीफे विवादों में थे।

वित्तीय मामलों में भी सवाल उठ रहे थे, जिनमें एक कंपनी को कथित तौर पर बेहद कम कीमत पर बेचने का मामला शामिल था। इसके अलावा L&T का वित्त मंत्रालय से कर्मचारी स्टॉक ऑप्शंस को लेकर विवाद था और उसके खातों को लेकर कंपनी लॉ बोर्ड से भी टकराव चल रहा था। L&T की एक और कमजोरी थी।

कंपनी के दो विदेशी प्रमोटर एस टुब्रो और हेनिंग होल्क-लार्सन कई साल पहले भारत छोड़ चुके थे। कंपनी की शेयरहोल्डिंग भी काफी बिखर चुकी थी। यानी 1988 की गर्मियों तक L&T ऐसी कंपनी बन चुकी थी, जिसे कोई मजबूत कारोबारी समूह अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर सकता था। और यहीं से कहानी में एंट्री होती है- अंबानी खानदान की।

अंबानियों को L&T में दिखा कौन सा बड़ा मौका?

उस समय अंबानी परिवार के लिए L&T सिर्फ एक कंपनी नहीं थी। यह भारत की बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक थी और उसका ट्रैक रिकॉर्ड भी शानदार था। 1988 में L&T की बिक्री 500 करोड़ रुपए थी, जो 1995 तक बढ़कर 3,300 करोड़ रुपए हो गई। अंबानियों को इसमें रिलायंस के साथ बड़े तालमेल की संभावना नजर आई। मुकेश और अनिल अंबानी ने एलएंडटी पर काम शुरू किया। उन्हें वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से मंजूरी का नोड भी मिला। उन्होंने कारोबारी मनु छाबड़िया को पीछे छोड़ा और L&T के चेयरमैन एनएम निक्की देसाई को अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद अंबानियों ने L&T के शेयरों का एक ब्लॉक खरीद लिया। लेकिन असली कहानी अभी शुरू हुई थी।

डायरेक्टर बने मुकेश-अनिल, धीरूभाई बने चेयरमैन

सितंबर 23 की एलएंडटी बोर्ड बैठक के समय कंपनी 800 करोड़ रुपए के कन्वर्टिबल डिबेंचर इश्यू के बीच में थी। इसी बैठक में देसाई ने मुकेश अंबानी और एम.एल. भक्ता को बोर्ड में शामिल करने का प्रस्ताव रखा। दोनों ने डायरेक्टर बनने के लिए जरूरी 100 शेयर खरीदे और निमंत्रण स्वीकार कर लिया। कुछ हफ्तों बाद मुकेश और भक्ता औपचारिक रूप से डायरेक्टर बन गए। 30 दिसंबर को अनिल अंबानी भी बोर्ड में डायरेक्टर बन गए। फिर एक बड़ा बदलाव हुआ। देसाई के इस्तीफे के बाद 28 अप्रैल 1989 को धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन बन गए। शुरुआत में देसाई को लगा था कि अंबानी L&T को चलाने में उन्हें रणनीतिक सहयोग देंगे और कंपनी का रोजमर्रा का नियंत्रण उनके हाथ में ही रहेगा। लेकिन यह सोच ज्यादा दिनों तक नहीं चली।

जब देसाई को समझ आया कि खेल बदल चुका है!

देसाई का रवैया तब बदलने लगा, जब उन्हें एहसास हुआ कि L&T के दूसरे मैनेजर उनके खिलाफ हैं। इसी बीच वित्त मंत्रालय और कंपनी लॉ बोर्ड ने देसाई और उनकी पत्नी के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किए। आरोपों में पत्नी के लिए बाजार कीमत से कम दाम पर फ्लैट खरीदने की अनुमति देना, संस्थाओं को चंदा देना, पत्नी और बेटी से जुड़े निवेश और ऐसे डायवर्सिफिकेशन शामिल थे, जिनसे भारी नुकसान हुआ। छाबड़िया और अंबानी दोनों L&T खरीदना चाहते थे। लेकिन देसाई धीरूभाई को अपना व्हाइट नाइट मानते थे, यानी ऐसा व्यक्ति जो मुश्किल समय में उन्हें बचा सकता था। लेकिन कुछ ही महीनों में उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने गलत अनुमान लगाया था। अंबानियों को लगा कि अगर L&T को रिलायंस जैसे नतीजे देने हैं, तो मौजूदा मैनेजमेंट में बदलाव जरूरी है। आंकड़ों ने भी उनके पक्ष में एक कहानी रखी।

  • 1982 से 1989 के बीच देसाई के कार्यकाल में L&T की प्रति रुपये आय 8 पैसे से घटकर 4 पैसे रह गई थी।
  • नेट वर्थ पर रिटर्न 22 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत और एसेट्स पर रिटर्न 7 प्रतिशत से गिरकर 3 प्रतिशत रह गया था।
  • देसाई को साफ संदेश दे दिया गया अब L&T वे नहीं चलाएंगे, बल्कि अंबानी टीम इसकी कमान संभालेगी।

लेकिन L&T की जरूरत सिर्फ L&T के लिए नहीं थी

अगस्त 1989 में कहानी और गंभीर हो गई। इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार एस गुरुमूर्ति ने एलएंडटी अधिग्रहण की जांच शुरू की। उन्होंने आरोप लगाया कि,

वित्तीय संस्थाओं के L&T शेयरों को एक नई कंपनी बॉब फिस्कल (BoB Fiscal) के जरिए खरीदा गया था। आरोप था- वित्तीय संस्थाओं को निजी पार्टियों को शेयर बेचने की अनुमति नहीं थी।"

रिलायंस के हजीरा प्रोजेक्ट से भी जुड़ी थी कहानी

गुरुमूर्ति ने अखबार में लिखा कि रिलायंस को L&T की जरूरत थी ताकि वह आर्थिक रूप से टिक सके। उनके मुताबिक एलएंडटी का अधिग्रहण रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स के हजीरा प्रोजेक्ट को फंड करने का जरिया था। रिलायंस ने पेट्रोकेमिकल्स के लिए जनता से 6 अरब रुपए के डिबेंचर जुटाए थे। लेकिन आरोप था कि यह रकम पहले ही सप्लायर क्रेडिट जैसी उत्पादक गतिविधियों के लिए अलग रखी जा चुकी थी। फिर 21 अगस्त 1989 को L&T ने 2.8 अरब रुपए के डिबेंचर इश्यू की घोषणा की। इसके तहत रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स को 6 अरब रुपए का सप्लायर क्रेडिट दिया जाना था। यानी L&T की कहानी अब सिर्फ एक कंपनी के नियंत्रण की कहानी नहीं रह गई थी। यह रिलायंस के बड़े विस्तार से भी जुड़ चुकी थी।

फिर अदालत पहुंचा मामला और बढ़ गया विवाद

सितंबर 1989 में मामला अदालत पहुंचा। दो याचिकाकर्ताओं ने L&T के इश्यू और वित्तीय संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठाया। बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस कोतवाल ने याचिका खारिज कर दी। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं ने बॉब फिस्कल और त्रिष्णा लेन-देन में कई अनियमितताओं का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी दिखाया कि BoB Fiscal के चेयरमैन के परिवार को अंबानियों से सालाना 50 लाख रुपए का फायदा हुआ था।

अंबानियों ने बॉब फिस्कल को शेयर वापस बेचने की पेशकश की। शुरुआत में वे नो-प्रॉफिट-नो-लॉस सौदा चाहते थे। लेकिन वित्त सचिव एस वेंकटरमणन की जगह गोपी अरोड़ा आने और आपत्ति जताने के बाद अंबानियों ने 120 मिलियन रुपये का नुकसान स्वीकार किया। नवंबर तक सौदा वापस हो गया। लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ।"

एक और आरोप सामने आया कि L&T ने रिलायंस के शेयर खरीदने पर 750 मिलियन रुपए खर्च किए थे। याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि इन शेयरों में मूल्य बढ़ने की संभावना नहीं थी, तो शेयरधारकों का पैसा इस तरह खर्च क्यों किया गया।

फिर धीरूभाई को भी कुर्सी छोड़नी पड़ी

राम जेठमलानी ने शेयरधारकों को यह तय करने के लिए EGM बुलाने की मांग की कि अंबानियों को L&T बोर्ड में रहना चाहिए या नहीं। तब तक राजनीतिक माहौल भी बदल चुका था। राजीव गांधी दिसंबर 1989 का आम चुनाव हार चुके थे और वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। दिसंबर 1989 में प्रेमजीत सिंह को छुट्टी पर जाने को कहा गया और मार्च 1990 में UTI के प्रमुख मनोहर फेरवानी भी उनसे जुड़ गए। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं किया। अप्रैल में LIC से EGM बुलाने और धीरूभाई, मुकेश, अनिल और भक्ता, इन चारों डायरेक्टरों को हटाने की मांग करने को कहा गया। अंबानियों ने सरकार पर लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाई और गलत जानकारी के आधार पर कार्रवाई करने का आरोप लगाया। लेकिन आखिरकार धीरूभाई ने इस्तीफा दे दिया। डीएन घोष भी अप्रैल 1990 में चले गए।

फिर आए घोष, कपूर और बदलता राजनीतिक माहौल

घोष को वित्त सचिव बिमल जालान ने चुना था। वह पहले रिलायंस की आलोचना कर चुके थे। L&T में अपने दस महीने के कार्यकाल में घोष ने कंपनी का बड़ा इश्यू 4.6 अरब रुपए तक सीमित किया, पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट्स के लिए रिलायंस का क्रेडिट रोका और L&T के पास मौजूद रिलायंस शेयरों का बड़ा हिस्सा बेच दिया। लेकिन फरवरी 1991 में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने उन्हें दिल्ली बुलाया। कुछ समय बाद घोष ने इस्तीफा दे दिया। इसी बीच अनिल अंबानी की शादी फिल्म स्टार टीना मुनीम से होने वाली थी। मूल विवरण में इसे इस दौर का बेहद खास व्यक्तिगत प्रसंग बताया गया है- "वह इससे बेहतर शादी का तोहफा नहीं मांग सकते थे।" यानी एक तरफ अनिल की जिंदगी में शादी का बड़ा मौका था, तो दूसरी तरफ परिवार एलएंडटी की बेहद जटिल कॉरपोरेट लड़ाई से गुजर रहा था।

1991 के बाद अंबानियों की वापसी का रास्ता खुला

चंद्रशेखर सरकार के गिरने के बाद जून 1991 में कांग्रेस सत्ता में आई। नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री। सिंह ने कहा कि अगर शेयरधारक अंबानियों की वापसी को मंजूरी देते हैं, तो वित्तीय संस्थाएं तटस्थ रहेंगी। 26 अगस्त के लिए EGM तय हुई। मुकेश और अनिल ने बड़े शेयरधारकों से प्रॉक्सी मांगने के लिए फोन अभियान शुरू किया। उन्होंने 800 लोगों को प्रॉक्सी फॉर्म जुटाने के लिए काम पर लगाया। एंटी-अंबानी कैंप को जब तक पता चला कि क्या हो रहा है, तब तक 83,000 प्रॉक्सी फॉर्म जमा हो चुके थे। LIC ने EGM स्थगित करने की मांग की और बैठक 17 सितंबर तक टाल दी गई। बाद में त्रिशना ने अपनी EGM मांग वापस ले ली।

अंबानियों के लिए इतनी अहम क्यों थी एलएंडटी?

इस पूरी कहानी को समझने के लिए रिलायंस के बदलते कारोबार को भी देखना जरूरी है। धीरूभाई की शुरुआती पहचान टेक्सटाइल्स से बनी। लेकिन समय के साथ रिलायंस टेक्सटाइल्स से पॉलिएस्टर, फिर पेट्रोकेमिकल्स और आगे चलकर रिफाइनिंग की ओर बढ़ी। साल 2000 तक रिफाइनरी कंपनी का सबसे बड़ा कमाने वाला कारोबार बनने वाली थी। धीरूभाई की पीढ़ी लाइसेंसी राज के दौर में बड़ी हुई थी, जबकि मुकेश और अनिल की पीढ़ी 1991 की नई आर्थिक नीति के दौर में कारोबार को आगे ले जा रही थी।

मुकेश ने खुद दोनों भाइयों की सोच को समझाते हुए कहा था कि,

वे ऐसे युवा भारतीय हैं जिनके ऊपर न तो किसी ऐतिहासिक बोझ का दबाव है और न ही किसी सौ साल पुराने पारिवारिक इतिहास का। उनके भीतर एक आग है, उन्हें कुछ कर के दिखाना है। और यही आग L&T की कहानी में भी दिखाई देती है।"

यह कहानी सिर्फ इस बात की नहीं है कि अंबानियों ने L&T के शेयर खरीदे या बोर्ड में जगह बनाई। यह उस दौर की कहानी है जब एक बड़ी भारतीय कंपनी की कमान को लेकर कॉरपोरेट ताकत, सरकारी संस्थाएं, अदालत, शेयरधारक और मीडिया एक-दूसरे के सामने खड़े थे। और इसी कहानी में धीरूभाई की एंट्री, उनका चेयरमैन बनना, फिर इस्तीफा, मुकेश-अनिल की बोर्ड में मौजूदगी और उसी दौर में अनिल अंबानी की टीना मुनीम से शादी ये सभी घटनाएं एक ही बड़े दौर की अलग-अलग तस्वीरें हैं।

(SOURCE- गीता पीरामल द्वारा लिखी गई किताब 'बिजनेस महाराजस' का एक अंश)

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