जिग जैग तकनीक का कमाल: सिवान में ईंट- भट्ठों पर 40% कम लगेगा कोयला, 75% घटेगा जहरीला धुआं
सिवान जिले में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए 220 ईंट भट्ठों में से 65% से अधिक में जिग-जैग तकनीक लगाई जा चुकी है।

ईंट-भट्ठों पर जिग-जैग तकनीक। (जागरण)
HighLights
सिवान के 65% से अधिक ईंट भट्ठों में जिग-जैग तकनीक स्थापित।
प्रदूषण नियंत्रण और हानिकारक उत्सर्जन में 75% तक की कमी।
ईंधन खपत में 40% की बचत, ईंटों की गुणवत्ता में सुधार।
जागरण संवाददाता, सिवान। जिले में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर ईंट-भट्ठों में जिग जैग तकनीक लगाने का काम तेजी से चल रहा है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और बिहार के पर्यावरण संरक्षण विभाग के निर्देश पर जिले के सभी ईंट भट्ठों में इस तकनीक को अनिवार्य किया गया है।
जिले में संचालित कुल 220 ईंट भट्ठों में से 65 प्रतिशत से अधिक में जिग जैग तकनीक लगाने का कार्य पूरा हो चुका है। शेष भट्ठों में भी इसे स्थापित करने की प्रक्रिया जारी है।
जिला खनन विकास पदाधिकारी रागिनी कुमारी ने बताया कि जिग जैग तकनीक से ईंट-भट्ठों से निकलने वाले धुएं और हानिकारक उत्सर्जन को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
इससे वातावरण में प्रदूषण का स्तर कम होगा। साथ ही, भट्ठों में काम करने वाले मजदूरों के स्वास्थ्य की सुरक्षा होगी। इसके अलावा आसपास के जलस्रोतों, मिट्टी और फसलों को प्रदूषण से बचाने में भी मदद मिलेगी।
धुएं से फैलती हैं कई गंभीर बीमारियां
अब तक परंपरागत ईंट-भट्ठों में ईंट पकाने के लिए कोयले और लकड़ी का इस्तेमाल होता रहा है। कई बार जल्दी आग पकड़ाने के लिए टायर और प्लास्टिक जैसी वस्तुएं भी जला दी जाती हैं।
इससे कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाईआक्साइड, सल्फर डाईआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड और सूक्ष्म कण जैसे प्रदूषक निकलते हैं।
इनके संपर्क में आने से अस्थमा, खांसी, सांस की तकलीफ, आंखों में जलन और फेफड़ों से संबंधित गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से हृदय संबंधी बीमारियां भी हो सकती हैं। इसका असर आसपास की मिट्टी और पानी पर भी पड़ता है।
ऐसे काम करती है जिग जैग तकनीक
जिग जैग तकनीक में भट्ठे के अंदर ईंटों की भराई विशेष तरीके से की जाती है। ईंटों को जेड आकार में व्यवस्थित किया जाता है, जिससे गर्म हवा और धुएं को निकलने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।
हवा के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए पंखे की व्यवस्था की जाती है। इससे ईंधन का बेहतर दहन होता है और धुएं में मौजूद प्रदूषक कणों को कम करने में मदद मिलती है। परिणामस्वरूप ईंट पकाने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है और प्रदूषण में कमी आती है।
वीआईपी ईंट उद्योग के संचालक अहसान अली ने बताया कि पुराने ईंट भट्ठें को पारंपरिक तरीके से जिग जैग तकनीक में बदलने में लगभग 20 से 25 लाख रूपये खर्च आता हैं, जबकि नया जिग जैग सेटअप करने में करीब 70 लाख अधिक खर्च करना पड़ता है।
40 प्रतिशत तक कम होगी ईंधन की खपत
जिग जैग तकनीक के इस्तेमाल से कोयले और लकड़ी जैसे ईंधन की खपत में लगभग 40 प्रतिशत तक कमी आने की उम्मीद है। इससे उत्पादन लागत घटने के साथ ईंटों की गुणवत्ता और मजबूती में भी सुधार होगा।
विभाग के अनुसार, इस तकनीक से पकाई गई ईंटें अधिक लाल और मजबूत बनती हैं। साथ ही, काले धुएं और हानिकारक उत्सर्जन में लगभग 75 प्रतिशत तक कमी आने का दावा किया जाता है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ ईंट भट्ठा संचालकों को भी लाभ मिल सकता है।
