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पटना हाई कोर्ट से गोद लिए बेटे को राहत, अनुकंपा नियुक्ति को लेकर दिया अहम फैसला

Published: Tue, 08 Sep 2026 07:20 PM (IST)

पटना हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति मामले में कहा है कि दत्तक ग्रहण की वास्तविकता तय करने के लिए केवल पंजीकृत विलेख की तारीख निर्णायक नहीं है।

पटना हाई कोर्ट का अहम फैसला अनुकंपा नियुक्ति और गोदनामे पर

पटना हाई कोर्ट का अहम फैसला अनुकंपा नियुक्ति और गोदनामे पर

HighLights

  1. दत्तक ग्रहण विलेख की तारीख ही निर्णायक नहीं।

  2. अनुकंपा नियुक्ति के लिए सभी तथ्यात्मक परिदृश्य देखें।

  3. पटना हाई कोर्ट ने पुनर्विचार का निर्देश दिया।

विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि दत्तक ग्रहण की वास्तविकता तय करने के लिए केवल पंजीकृत दत्तक ग्रहण विलेख की तारीख को निर्णायक नहीं माना जा सकता। यदि अभिलेखों से यह संकेत मिलता हो कि दत्तक संबंध पहले ही स्थापित हो चुका था, तो अधिकारियों को पूरे तथ्यात्मक परिदृश्य और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच करनी होगी।

न्यायाधीश कुमार मनीष ने विजय कुमार साह की याचिका स्वीकार करते हुए नियुक्ति का दावा खारिज करने वाले आदेशों को रद कर दिया और उसे दिवंगत रेशमा देवी का कानूनी रूप से दत्तक पुत्र व आश्रित मानकर दावे पर पुनर्विचार का निर्देश दिया।

मामले के अनुसार रेशमा देवी बेगूसराय विद्युत आपूर्ति उपखंड में संदेशवाहक थीं और 25 नवंबर 2007 को सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। विजय उनके साथ बचपन से रह रहा था।

18 फरवरी 1999 को रेशमा देवी ने उसे पुत्र के रूप में गोद लेने संबंधी शपथपत्र दिया, जबकि 22 जुलाई 1999 को विजय ने भी इस संबंध को स्वीकार करते हुए शपथपत्र दिया। बाद में 12 जनवरी 2001 को पंजीकृत दत्तक ग्रहण विलेख हुआ।

विभाग ने नियुक्ति का दावा तीन आधारों पर खारिज किया था। पहला, 2001 में पंजीकृत विलेख के समय विजय की उम्र 15 वर्ष से अधिक थी। दूसरा, आवेदन पांच वर्ष की निर्धारित अवधि के बाद दिया गया। तीसरा, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र केवल मृत्युोत्तर लाभ प्राप्त करने तक सीमित था।

हाई कोर्ट ने कहा कि विजय जनवरी 2010 में ही विभाग से संपर्क कर चुका था। बाद में विभाग ने उससे उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, पारिवारिक सदस्य प्रमाणपत्र और निर्धारित प्रारूप में आवेदन मांगा। इसलिए निर्धारित प्रारूप में आवेदन दाखिल करने में हुई देरी याचिकाकर्ता के कारण नहीं थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस देरी के लिए स्वयं प्राधिकरण जिम्मेदार हो, उसका खामियाजा दावेदार को नहीं भुगतना चाहिए।

अदालत ने 22 दिसंबर 2017 और 27 मार्च 2018 के आदेश रद करते हुए विभाग को निर्देश दिया कि विजय को रेशमा देवी का कानूनी रूप से दत्तक पुत्र और आश्रित मानकर, तकनीकी आपत्तियों पर जोर दिए बिना, उसके अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर तीन माह के भीतर कारणयुक्त और स्पष्ट आदेश पारित करे।

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