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    बिहार में CSR फंड में उछाल: एक दशक में दस गुना से अधिक बढ़ा निवेश, अब प्रतिवर्ष 2000 करोड़ रुपये का लक्ष्य

    Updated: Mon, 10 Aug 2026 07:00 AM (GMT+05:30)

    बिहार सरकार प्रतिवर्ष कम से कम 2000 करोड़ रुपये सीएसआर फंड आकर्षित करने का लक्ष्य बना रही है, जो वर्तमान में 1-1.5% की हिस्सेदारी से बढ़कर 2024-25 में ...और पढ़ें

    एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

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    HighLights

    1. बिहार का लक्ष्य 2000 करोड़ रुपये वार्षिक सीएसआर फंड।

    2. सीएसआर फंड 2014-15 में 39.69 करोड़ से बढ़कर 456.12 करोड़।

    3. सीएसआर सोसायटी गठित, 13 प्रमुख क्षेत्र चिह्नित।

    विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व कोष (सीएसआर फंड) में बिहार को अब तक चुटकी भर हिस्सेदारी मिलती रही, तो मूल कारण यह कि इरादे कभी मजबूत नहीं रहे।

    अब सरकार की अपेक्षा प्रतिवर्ष कम-से-कम 2000 करोड़ रुपये की है, जिसके लिए यथोचित पहल भी हो रही। ऐसे में संभव है कि आने वाले वर्षों में बिहार में सीएसआर फंड का प्रवाह बढ़े, जो अभी एक से डेढ़ प्रतिशत के दायरे में घूम रहा है।

    हालांकि, अब स्थिति एक दशक पहले जैसी कमतर भी नहीं। यह गवाही बही-खातों की है, जो बता रहे कि 2014-15 में 39.69 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में बिहार के हिस्से में 456.12 करोड़ रुपये आए। इससे आगे का हिसाब-किताब अभी सरकार ने नहीं जुटाया है।

    व्यवस्थागत कमी और प्रणालीगत दोष के साथ शीघ्र प्रभाव की ललक के कारण सीएसआर फंड में बड़ी हिस्सेदारी से बिहार अब तक वंचित रहा।

    ऐसा तब जबकि राष्ट्रीय स्तर पर सीएसआर फंड पूर्णतया खर्च नहीं हो पा रहा। ऐसे में अगर पहल सकारात्मक हो तो नि:संदेह बिहार में आवक बढ़ेगी।

    औद्योगिकीकरण-शहरीकरण के लिए बन रहा इको-सिस्टम भी इसमें सहायक होगा। दरअसल, कारपोरेट घराने अपनी निर्माण इकाई या मैन्युफैक्चरिंग हब के इर्द-गिर्द वाले परिक्षेत्र में सीएसआर फंड को खर्च करना पसंद करते हैं।

    इससे इतर दूसरी जगहों पर खर्च के लिए एक विश्वसनीय परिवेश चाहिए होता है। भरोसेमंद और योग्य क्रियान्वयन एजेंसियों की कमी के कारण सही परियोजनाएं तैयार नहीं हो पातीं।

    कंपनियों को डर होता है कि उनके फंड का सही प्रभाव धरातल पर दिखेगा या नहीं। इसका संज्ञान लेते हुए बिहार ने उपयुक्त पहल की।

    मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 21 सदस्यीय ''बिहार सीएसआर सोसायटी'' का गठन हुआ, जो सभी परियोजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित कर रही।

    कंपनियों को भटकाव से बचाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, स्वच्छता, पर्यावरण और महिला सशक्तीकरण सहित 13 प्रमुख क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं।

    सीएसआर फंड पाने के इच्छुक एनजीओ के लिए पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य है, जिससे फर्जीवाड़ा रुका है। अब तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी स्वयं हस्तक्षेप कर रहे, जो कारपोरेट घरानों के लिए अब तक की सबसे बड़ी गारंटी मानी जा रही।

    सीएसआर निधि के दाता 

    कंपनी अधिनियम के अनुसार, 500 करोड़ या उससे अधिक की वार्षिक निवल संपत्ति या 1000 करोड़ या उससे अधिक के वार्षिक टर्नओवर वाली या पांच करोड़ या उससे अधिक की शुद्ध वार्षिक लाभ वाली कंपनी का योगदान सीएसआर मद में अनिवार्य है। जन-कल्याण और राष्ट्र-निर्माण के मद यह खर्च पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम-से-कम दो प्रतिशत होना चाहिए।

    खबरें और भी

    सीएसआर फंड (करोड़ रुपये)

    क्षेत्र 2022-23 2023-24 2024-25
    बिहार 247.93 261.62 456.12
    भारत 31,183.28 35,917.98 40,794.00
    महाराष्ट्र 5,723.29 6,283.97 8,630.80
    गुजरात 2,066.67 2,780.14 4,549.10
    कर्नाटक 2,061.40 2,328.53 3,395.43

    नोट: महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक लगातार तीन वर्ष से सर्वाधिक राशि पाने वाले तीन राज्य हैं।

    कारण और निवारण

    कंपनियों की हिचकिचाहट 

    1. औद्योगिक आधार की कमी
    2. भरोसेमंद माध्यमों का अभाव
    3. निगरानी व विजिबिलिटी की चिंता
    4. नीतिगत स्पष्टता का नहीं होना

    सरकार की पहल 

    1. बिहार राज्य सीएसआर नीति
    2. समर्पित पोर्टल की शुरुआत
    3. सीएसआर सोसायटी का गठन
    4. प्राथमिकता क्षेत्र का निर्धारण

    आशा और निराशा

    प्रादेशिक : 2020-21 के बाद से बिहार को मिलने वाले सीएसआर फंड में उछाल आई है। 2014-15 में यह मात्र 39.69 करोड़ थी, जो बढ़कर 2024-25 में 456.12 करोड़ रुपये हो गई है।

    राष्ट्रीय : 2024-25 में देश में सीएसआर फंड से 40794 करोड़ रुपये खर्च हुए। उसमें बिहार की हिस्सेदारी मात्र 1.12 प्रतिशत की रही। 2022-23 में यह हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम रहा।

    बिहार में खर्च की प्रकृति 

    वित्तीय वर्ष 2024-25 में स्वास्थ्य और शिक्षा में सर्वाधिक क्रमश: 116.68 करोड़ और 114.22 करोड़ रुपये खर्च हुए। गरीबी, भुखमरी और कुपोषण के विरुद्ध 61.34 करोड़। कुल 45.14 करोड़ के साथ आजीविका संवर्द्धन परियोजनाएं चौथे स्थान पर रहीं।

    पांचवें क्रमांक पर ग्रामीण विकास मद में 41.19 करोड़ रुपये खर्च हुए। कुल 21 मद में राशि व्यय हुई। उसमें सर्वाधिक कम 10 लाख रुपये अनाथालय की स्थापना में गए।

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