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होर्मुज स्ट्रेट में क्यों भारी पड़ रहा ईरान? आखिर कैसे अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को दे रहा है चकमा

Published: Sun, 29 Mar 2026 12:55 PM (IST)

होर्मुज स्ट्रेट पिछले चार हफ्तों से बाधित है, जिससे वैश्विक तेल बाजार प्रभावित हो रहे हैं। ईरान की धमकियों और हमलों ने इसे जोखिम भरा बना दिया है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। होर्मुज स्ट्रेट पिछले चार हफ्तों से लगभग ठप पड़ा है और इस वजह से वैश्विक तेल बाजारों में हाहाकार मचा हुआ है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और खेती के लिए जरूरी उर्वरक इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरते हैं। ईरान की धमकियों और जहाजों पर बढ़ते हमलों ने इस व्यापारिक मार्ग को इतना जोखिम भरा बना दिया है कि अब यहां से ट्रैफिक न के बराबर रह गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप एक तरफ कूटनीतिक रास्तों से इस नाकेबंदी को खत्म करने का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट में हजारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और नौसेना के जरिए टैंकरों को सुरक्षा देने की तैयारी भी चल रही है। हालांकि, तमाम सैन्य दबाव के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि इस इलाके में फिलहाल ईरान का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।

कैसे ईरान होर्मुज इलाके में अमेरिका को मात दे रहा है?

ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी लंबी तटरेखा और वहां की भौगोलिक बनावट है। ईरान का कोस्टलाइन सैन्य ठिकानों से भरा पड़ा है, जिसका सीधा मतलब यह है कि वह खाड़ी के भीतर बहुत दूर तक मौजूद किसी भी टैंकर को आसानी से अपना निशाना बना सकता है। यहां की पहाड़ियां, तंग घाटियां और छोटे द्वीप एंटी-शिप मिसाइल लॉन्चर्स को छिपाने के लिए बेहतरीन जगह मुहैया कराते हैं।

इन्हीं भौगोलिक फायदों के कारण अमेरिका या किसी भी अन्य देश के लिए इन मिसाइल बैटरियों को ढूंढकर तबाह करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। ये मोबाइल लॉन्चर्स एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाए जा सकते हैं, जिससे दुश्मन के रडार और सैटेलाइट्स को चकमा देना आसान हो जाता है।

अनकन्वेंशनल वारफेयर का फायदा उठा रहा ईरान

ईरान केवल सीधी जंग पर भरोसा नहीं करता, बल्कि उसकी असली ताकत उसकी 'अनकन्वेंशनल वारफेयर' यानी अपरंपरागत युद्ध रणनीति में है। इसमें सबसे ऊपर आते हैं 'शाहिद' जैसे अटैक ड्रोन्स (UAVs)। ये ड्रोन बनाने में बेहद सस्ते हैं और इन्हें भारी संख्या में लॉन्च किया जा सकता है। हैरत कि बात यह है कि ईरान के इन सस्ते ड्रोन्स को गिराने के लिए अमेरिका को जो मिसाइलें दागनी पड़ती हैं, उनकी कीमत करोड़ों में होती है।

इसके अलावा, ईरान समुद्री सुरंगों का व्यापक जाल बिछाने में सक्षम है। छोटी नावों के जरिए गुपचुप तरीके से बिछाई गई इन सुरंगों का पता लगाना और उन्हें हटाना किसी भी आधुनिक नौसेना के लिए सिरदर्द साबित होता है। इसके साथ ही, ईरान के पास 'मिजेट सबमरीन्स' (छोटी पनडुब्बियां) और 'विस्फोटक ड्रोन बोट्स' का जखीरा है, जो विशालकाय टैंकरों को पल भर में तबाह कर सकते हैं।

अमेरिका के आगे क्या हैं चुनौतियां?

अमेरिका इस संकट से निपटने के लिए एक बहुस्तरीय सुरक्षा चक्र (Layered Defense) तैयार करने की सोच रहा है। इसमें सैटेलाइट निगरानी, युद्धपोतों के जरिए सुरक्षा और टैंकरों के आगे गश्त करने वाले विमान शामिल हैं। टारगेट यह है कि कमर्शियल जहाजों को एक सुरक्षित गलियारा दिया जा सके ताकि वैश्विक सप्लाई चेन दोबारा शुरू हो सके।

लेकिन जानकारों का मानना है कि ईरान की 'मल्टी-लेयर्ड ऑफेंसिव स्ट्रेटजी' को भेदना इतना आसान नहीं है। इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के मुताबिक, तनाव शुरू होने के बाद से ईरान कम से कम 19 जहाजों पर हमला कर चुका है। दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने चुनिंदा देशों जैसे चीन, भारत और पाकिस्तान से जुड़े जहाजों को सुरक्षित निकलने दिया है, जिससे यह साफ होता है कि वह अपनी सैन्य ताकत के साथ-साथ कूटनीतिक कार्ड भी बहुत सोच-समझकर खेल रहा है।

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