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    तृणमूल के गढ़ में कैसे खिला कमल? ममता के हर दांव का निकाला सटीक काट; भाजपा के 'साइलेंट' प्लान की Inside Story

    Updated: Mon, 04 May 2026 08:30 PM (IST)

    BJP win in Bengal 2026: पश्चिम बंगाल में भाजपा ने तृणमूल के हर दांव का सटीक काट पेश कर मैदान मार लिया है। ...और पढ़ें

    बंगाल में मोदी की वो 5 रणनीतियां जिन्होंने उखाड़ दी TMC की जड़ें। फोटो- पीटीआई

    बंगाल में मोदी की वो 5 रणनीतियां जिन्होंने उखाड़ दी TMC की जड़ें। फोटो- पीटीआई

    HighLights

    1. महिलाओं-युवाओं को दोगुने लाभ का वादा किया।

    2. बंगाली अस्मिता कार्ड को निष्प्रभावी बनाया।

    3. स्थानीय नारों व संस्कृति का सहारा लिया।

    राजीव कुमार झा,कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि रणनीति, वादों और नैरेटिव की लड़ाई का भी था। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस जहां अपनी कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर भरोसा जता रही थी और चुनाव में इसे भुनाने की कोशिश की। वहीं मुख्य विपक्षी भाजपा ने इन दोनों मोर्चों पर आक्रामक और योजनाबद्ध तरीके से जवाबी काट पेश किया।

    भाजपा सबका काट लेकर सामने आई और हर मोर्चे पर उसकी कारगर रणनीति तृणमूल पर भारी पड़ी और मैदान मार ले गई। सबसे बड़ा दांव भाजपा ने महिलाओं और युवाओं पर खेला। ममता सरकार की लोकप्रिय लक्ष्मी भंडार योजना, जिसके तहत महिलाओं को मासिक 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता मिलती है, उसके मुकाबले भाजपा ने अपने चुनावी संकल्प पत्र (भरोसा शपथ) में दोगुना राशि यानी मासिक 3,000 रुपये देने का वादा किया।

    इसके साथ ही महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त बस यात्रा, सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण, महिला पुलिस बटालियन का गठन और हर ब्लाक में महिला थाना खोलने जैसे वादों ने महिला मतदाताओं को खासा आकर्षित किया।

    महिलाओं और युवाओं को मिला पूरा समर्थन

    यही रणनीति युवाओं के मामले में भी अपनाई गई। चुनाव से पहले तृणमूल सरकार द्वारा बेरोजगार युवाओं के लिए शुरू की गई युवा साथी योजना के तहत मिलने वाले 1,500 रुपये के मासिक भत्ते के मुकाबले भाजपा ने इसे भी दोगुना यानी 3,000 रुपये करने का वादा किया।

    3,000 रुपये मासिक भत्ता और पांच वर्षों में एक करोड़ रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर देने का भाजपा का दावा, बेरोजगार युवाओं के बीच असरदार साबित हुआ। चुनावी नतीजे व भाजपा की जबर्दस्त जीत में इन दोनों वर्गों- महिलाओं और युवाओं का अपेक्षा से अधिक समर्थन साफ प्रतीत हो रहा है, जो पहले तृणमूल को मिलता था।

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    TMC के बंगाली अस्मिता के कार्ड को किया निष्प्रभावी

    सिर्फ वादों तक ही भाजपा सीमित नहीं रही। उसने तृणमूल के सबसे मजबूत हथियार-बंगाली अस्मिता के ट्रंप कार्ड को भी नेस्तनाबूत कर दिया, जिसे सत्तारूढ़ दल ने 2021 के विधानसभा चुनाव में खूब भुनाया था। यह मुद्दा निर्णायक साबित हुआ था, लेकिन इस बार भाजपा ने इसे पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया।

    टीएमसी ने इस बार भी चुनाव प्रचार में इस मुद्दे को जोर-शो से उठाया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी प्रत्येक चुनावी रैलियों में बार-बार यह आरोप लगाया कि भाजपा सत्ता में आने पर बंगाल की खान-पान संस्कृति पर असर डालेगी, खासकर बंगालियों के प्रिय मांस- मछली पर प्रतिबंध लगा देगी। पूरे चुनाव में मछली का मुद्दा छाया रहा।

    भाजपा ने इस आरोप का जवाब प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर दिया। भाजपा के कई उम्मीदवारों ने खुले तौर पर मछली के साथ चुनाव प्रचार किया। वहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं-पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद अनुराग ठाकुर और सांसद मनोज तिवारी- ने कोलकाता में सार्वजनिक तौर पर मछली खाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के खिलाफ नहीं है।

    BJP supporter

    मां काली और दुर्गा का लिया सहारा

    नैरेटिव की लड़ाई में भाजपा ने अपने पारंपरिक जय श्रीराम के नारे की जगह बंगाल में लोकप्रिय जय मां काली और जय मां दुर्गा जैसे स्थानीय और भावनात्मक रूप से जुड़े नारों को आगे बढ़ाया। इसके साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने अपनी प्रत्येक चुनावी रैलियों में स्थान विशेष के अनुसार स्थानीय मंदिरों, धार्मिक स्थलों व मनीषियों का नाम लेकर ही अपना भाषण शुरू किया और इसके जरिए क्षेत्रीय जुड़ाव को मजबूत करने की कोशिश की।

    इस तरह भाजपा ने चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहने दिया, बल्कि इसे योजनाओं की प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक भरोसे की लड़ाई में बदल दिया। नतीजों से साफ हो गया कि इस बार बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत की सबसे बड़ी वजह भाजपा की आक्रामक और बहुस्तरीय रणनीति रही।

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