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    तृणमूल में वर्चस्व की लड़ाई, अपने ही बनाए पार्टी के संविधान में फंसती दिख रहीं ममता

    Updated: Fri, 03 Jul 2026 09:00 PM (GMT+05:30)

    ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई में कमजोर पड़ रही हैं क्योंकि पार्टी ने अपने संविधान के अनुसार सांगठनिक चुनाव नहीं कराए हैं। ...और पढ़ें

    ममता बनर्जी

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    जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद ममता बनर्जी अब तृणमूल कांग्रेस पर वर्चस्व की लड़ाई में कमजोर पड़ती दिख रही है।

    इसकी बड़ी वजह उनका अपना ही बनाया पार्टी का संविधान है। जिसके तहत उन्हें अपनी पार्टी का सांगठनिक चुनाव प्रत्येक तीन साल में अनिवार्य रूप से कराना था।

    इस बीच जो जानकारी सामने आ रही है, उनमें यह है पार्टी का सांगठनिक चुनाव 2022 के बाद से हुआ ही नहीं है। ऐसे में मई 2026 में पार्टी के भीतर हुई बगावत के समय पार्टी के पास कोई संवैधानिक सांगठनिक ढांचा अस्तित्व में नहीं था।

    यही वजह है कि ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले पार्टी के बागी गुट ने पार्टी का सांगठनिक चुनाव कराकर खुद को असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा ठोक दिया। जो पार्टी पर ममता बनर्जी के वर्चस्व की लड़ाई को कमजोर करते हुए दिखाई दे रही है।

    ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई में कमजोर

    तृणमूल कांग्रेस पर किसका अधिकार रहेगा, इसका फैसला चुनाव आयोग को करना है। फिलहाल दोनों गुटों ने आयोग का दरवाजा खटखटाया है।

    आयोग ने भी दोनों गुटों से नोटिस जारी कर छह जुलाई तक पार्टी पर अपनी दावेदारी को प्रमाणित करने को कहा है। वहीं सूत्रों की मानें तो किसी पार्टी पर किसका अधिकार होगा, इसका फैसला चुनाव आयोग मुख्य रूप में तीन बिंदुओं पर करता है।

    इनमें पहला पार्टी के संविधान के आधार पर, दूसरा किसके साथ पार्टी के कितने डेलीगेट्स का साथ है जबकि तीसरा विधानसभा व लोकसभा में किसके पास बहुमत है।

    इनमें से पार्टी के संविधान को न मानने के चलते और पुरानी कार्यकारिणी के अस्तित्व में न होने के चलते ममता पहले से ही इस लड़ाई में पिछड़ गई है।

    बागी गुट ने चुनाव आयोग में असली TMC का दावा किया

    विधायकों की संख्या के आधार पर देखे तो हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी के निर्वाचित 80 विधायकों में से 60 विधायक बागी गुट के साथ चले गए।

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    सूत्रों की मानें तो पार्टी पर दोनों गुटों की ओर से दावेदारी के बाद आयोग ने पार्टी संविधान सहित पार्टी के सांगठनिक चुनाव आदि से जुड़ी पूरी जानकारी जुटाई है। जिसमें यह पाया है कि पार्टी ने अपने संविधान का पालन नहीं किया है।

    जबकि पार्टी गठन के दौरान उनकी ओर से यह शपथ पत्र दिया जाता है कि वह अपने संविधान का पालन करेगी और तय समय पर चुनाव कराएगी।

    गौरतलब है कि लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 29 ए के तहत पार्टी अपने संविधान के पालन करने का वचन देती है। जिसका पालन न करने पर आयोग पार्टी का मान्यता रद कर सकता है और चुनाव चिन्ह जब्त कर सकता है।