हिमालय में ग्लेशियल झीलों का विस्तार, आईआईटी रुड़की ने बताया आपदा का बढ़ता जोखिम
आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर सौरभ विजय ने हिमालय में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते क्षेत्रफल और उनसे होने वाले आपदा के खतरे पर चिंता जताई है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
रीना डंडरियाल, रुड़की। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ की वजह को लेकर विज्ञानियों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन यह बात सही है कि आपदाएं संपूर्ण हिमालय क्षेत्र में आती रहेंगी और इनके जोखिम को भी कम किया जा सकता है अगर इसको माडल कर सकें।
ऐसा कहना है भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर सौरभ विजय का। वे कहते हैं कि संभावित इलाकों में जुलाई-अगस्त में भौतिक गतिविधियां कम हों और इन इलाकों में नदियों के किनारे बसावट को भी कम किया जाए। इन खतरों पर निरंतर शोध हों। सेटेलाइट मैपिंग के साथ ही फील्ड में जाकर गहनता से अध्ययन किया जाए, जो हो भी रहा है।
हिमालय के ग्लेशियरों में कई बार बदलाव बेहद धीमी गति से होता है, लेकिन उसके परिणाम अचानक सामने आ सकते हैं। ग्लेशियल झीलों का बढ़ता क्षेत्रफल इसी धीमे बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत है। आईआईटी रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर सौरभ विजय ने बताया कि उनकी टीम ने 2022 में एक अध्ययन के माध्यम से हिमालय के बदलते जल-परिदृश्य को आंकड़ों और उपग्रह तकनीक के जरिए समझने का प्रयास किया।
यह भी पढ़ें- एवरेस्ट से भी खतरनाक नेपाल बाढ़ का रेस्क्यू ऑपरेशन, पढ़ें सबसे बड़े एयरलिफ्ट ऑपरेशन की कहानी
वे कहते हैं कि आपदा आने के बाद उसके असर को मापने से बेहतर है कि खतरे के संकेतों को पहले ही पढ़ लिया जाए। यदि उपग्रहों से झीलों के आकार और उनके बदलाव को लगातार देखा जाए और इस जानकारी को जमीन पर मौजूद आपदा प्रबंधन व्यवस्था से जोड़ा जाए, तो संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और तैयारी बेहतर की जा सकती है।
हिमालय की ऊंचाइयों में जमा पानी आने वाले समय में जीवन और जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार भी है और कुछ परिस्थितियों में गंभीर आपदा का कारण भी बन सकता है। चुनौती इस बात की है कि विज्ञान और तकनीक की मदद से इस बदलते हिमालय को समय रहते समझा जाए। डा. सौरभ विजय कहते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और उनसे जुड़े जल निकायों की निगरानी को केवल समय-समय पर किए जाने वाले सर्वे तक सीमित रखने के बजाय नियमित उपग्रह निगरानी से जोड़ा जा सकता है।
ऐसी व्यवस्था में यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-सी झील तेजी से बढ़ रही है, कौन सी ग्लेशियर के सीधे संपर्क में हैं, किस झील का आकार कितना है और उसके नीचे की ओर कौन से क्षेत्र संभावित रूप से संवेदनशील हैं। भविष्य में ग्लेशियल झीलों के वार्षिक और मौसमी डेटाबेस विकसित करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही ग्लेशियल झीलों के आंकड़ों को जीएलओएफ खतरे, डाउनस्ट्रीम संवेदनशीलता और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों से जोड़ने की जरूरत है।
ग्लेशियल झीलों का विस्तार अब चिंता का विषय
डा. सौरभ विजय कहते हैं कि ग्लेशियरों के पीछे हटने और पिघलने से बनने वाली ग्लेशियल झीलों का विस्तार अब चिंता का महत्वपूर्ण विषय है। इन झीलों का बढ़ता आकार केवल हिमालय के बदलते पर्यावरण का संकेत नहीं है, बल्कि इनके अचानक फटने से पैदा होने वाले खतरे को देखते हुए आपदा प्रबंधन के लिए भी गंभीर चुनौती है।
उनकी टीम ने शोध के माध्यम से 2022 में आधुनिक उपग्रह तकनीक और स्वचालित मैपिंग प्रणाली के जरिए हाई माउंटेन एशिया क्षेत्र में 31,698 ग्लेशियल झीलों की पहचान की। इनका कुल क्षेत्रफल लगभग 2,240 वर्ग किलोमीटर पाया गया।
क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि
डा. सौरभ बताते हैं कि 2016-17 से 2022-24 के बीच विश्लेषित ग्लेशियल झीलों के कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हाई माउंटेन एशिया दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है और यहां ग्लेशियल झीलों की बड़ी संख्या मौजूद है। इन झीलों में जमा पानी एक ओर हिमालयी जल प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो दूसरी ओर कुछ परिस्थितियों में यही पानी अचानक विनाशकारी बाढ़ का कारण भी बन सकता है।
यह भी पढ़ें- नेपाल में विनाशकारी बाढ़ के 9 दिन बाद चमत्कार, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग से जिंदा निकाले गए दो मजदूर
ग्लेशियर के पीछे हटने से उसके सामने या आसपास मौजूद गहरे हिस्सों में पिघला हुआ पानी जमा होता है और धीरे-धीरे ग्लेशियल झील का आकार बढ़ सकता है। यदि झील का प्राकृतिक बांध कमजोर होता है या किसी बाहरी घटना के कारण पानी अचानक बाहर निकलता है तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) की स्थिति बन सकती है।
उनकी टीम का यह अध्ययन इसी वजह से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने न केवल ग्लेशियल झीलों की पहचान भर की, बल्कि यह समझने की कोशिश की कि समय के साथ इनका क्षेत्रफल और स्थानिक वितरण किस तरह बदल रहा है। अध्ययन में हाई माउंटेन एशिया में हाल के दशकों में जीएलओएफ की घटनाओं को देखते हुए ग्लेशियल झीलों की लगातार और उच्च स्थानिक-कालिक रिजाल्यूशन पर निगरानी जरूरी है।
स्वचालित प्रणाली की विकसित
विशाल और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में हजारों झीलों का जमीन पर जाकर सर्वेक्षण करना बेहद कठिन है। इस चुनौती से निपटने के लिए उनकी टीम ने एक पूरी तरह स्वचालित प्रणाली विकसित की। इस प्रणाली में लैंडसैट-8, सेंटिनल-1, सेंटिनल-2 और कापरनिकस डिजीटल एलिवेशन माडल जैसे खुले स्रोत वाले रिमोट सेंसिंग आंकड़ों को एकीकृत किया गया। इसका उद्देश्य ग्लेशियल झीलों को अधिक सटीकता से पहचानना, उनका क्षेत्रफल निर्धारित करना और समय के साथ उनमें होने वाले बदलाव को दर्ज करना था।
इस विधि की खासियत यह रही कि इससे छोटी ग्लेशियल झीलों की पहचान भी अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से की जा सकी। 20,000 से 100,000 वर्ग मीटर आकार वाली झीलों की पहचान में 96 प्रतिशत से अधिक सटीकता हासिल हुई। जबकि 100,000 वर्ग मीटर से बड़ी झीलों को भी सफलतापूर्वक मैप किया गया।
यह स्वचालित तरीका भविष्य में हाई माउंटेन एशिया और दुनिया के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के डेटाबेस को नियमित रूप से अपडेट करने में उपयोगी हो सकता है। वे कहते हैं कि ग्लेशियल झीलों की निगरानी में केवल संख्या महत्वपूर्ण नहीं है। बड़ी झीलों के आकार, उनकी वृद्धि की गति और ग्लेशियर से उनके संबंध को समझना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
