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कांग्रेस का चुनावी नैरेटिव उलझा, हरदा धड़े की दूरी से बढ़ेगी मुश्किल

Published: Mon, 14 Sep 2026 08:16 PM (IST)

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के ओएसडी पर ईडी की कार्रवाई के बाद कांग्रेस का चुनावी नैरेटिव उलझ गया है। पारदर्शिता ...और पढ़ें

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राज्य ब्यूरो, जागरण देहरादून। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस जिस नैरेटिव को धार देने में जुटी थी, वह पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के ओएसडी रहे चंदन सिंह जीना पर ईडी की कार्रवाई के बाद उलझता दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस राज्य में पारदर्शिता, भर्ती परीक्षा और युवाओं के सवालों को लेकर सरकार को घेर रही है, लेकिन वर्ष 2016 में कांग्रेस के शासनकाल में हुई ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में अनियमितता से जुड़े मनी लांड्रिंग मामले में अब जीना पर हुई कार्रवाई ने पार्टी काे रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है।

कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल यही है कि क्या हरदा और उनके समर्थकों की चुनावी सक्रियता पहले जैसी रहेगी। रावत भले ही कांग्रेस के सांगठनिक पदों से अलग होने की पेशकश कर चुके हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव अभी भी बरकरार है।

मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष समेत विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हरदा की अपनी राजनीतिक पकड़ और समर्थकों का नेटवर्क है। बदली परिस्थितियों के बीच यदि रावत खेमा चुनावी तैयारियों से दूरी बनाता है या संगठन के कार्यक्रमों में उसकी सक्रियता कम होती है तो इसका असर केवल एक नेता तक सीमित नहीं रहेगा।

टिकट वितरण से लेकर चुनावी प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की लामबंदी तक इसका असर पड़ सकता है। हालांकि, कांग्रेस के भीतर यह धारणा भी है कि पार्टी को अब पुरानी नेतृत्व शैली से आगे बढ़कर नई पीढ़ी को केंद्र में रखकर चुनावी अभियान में उतरना होगा।

ऐसे में रावत की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर चल रही बहस 2027 के चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। यह सवाल भी कांग्रेस के भीतर और बाहर उठ रहा है कि क्या पार्टी में अब रावत की प्रासंगिकता नहीं रह गई है। वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में रावत कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में रहे, लेकिन पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई थी, यही बिंदु इस विषय को बहस के केंद्र में रखे हुए है।

पारदर्शिता के नैरेटिव पर लगा झटका

कांग्रेस ने हालिया दिनों में पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया को मुद्दा बनाने की कोशिश की है। सरकार की ओर से भी भर्ती में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई को उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के पूर्व ओएसडी पर कार्रवाई ने पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है।

भले ही रावत स्वयं आरोपों से इन्कार कर रहे हों और जांच को राजनीतिक नजरिये से देख रहे हों, लेकिन सियासत में धारणा भी महत्वपूर्ण होती है। भाजपा को कांग्रेस के पुराने कार्यकाल और भर्ती से जुड़े विवादों को फिर से उठाने का अवसर मिल गया है।

इससे कांग्रेस जिस मुद्दे पर सरकार को घेरना चाहती थी, उसी पर वह रक्षात्मक दिख रही है। पार्टी का कहना है कि 10 साल पुराने मामले को ऐन चुनाव से पहले कुरेदना राजनीतिक साजिश है।

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