Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    उत्तराखंड में श्रीअन्न पर संकट मंडराया, मंडुवा और झंगोरा की खेती में बड़ी गिरावट

    Updated: Mon, 29 Jun 2026 08:12 AM (IST)

    उत्तराखंड में पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच सालों में मंडुवा और झंगोरा जैसी श्रीअन्न फसलों के रकबे में 27% की भारी गिरावट आई है। ...और पढ़ें

    सांकेतिक तस्वीर।

    सांकेतिक तस्वीर।

    HighLights

    1. उत्तराखंड में मंडुवा-झंगोरा का रकबा 27% घटा।

    2. पलायन, वन्यजीवों से फसल क्षति मुख्य कारण।

    3. राज्य की आर्थिकी के लिए खतरे की घंटी।

    राज्य ब्यूरो, जागरण, देहरादून। केंद्र और राज्य सरकारें श्रीअन्न यानी मिलेट फसलों को पोषण व जलवायु अनुकूल खेती का आधार मानते हुए इन्हें लगातार प्रोत्साहित कर रही हैं। उत्तराखंड सरकार भी मंडुवा, झंगोरा जैसी मोटे अनाज की पारंपरिक फसलों की खरीद, विपणन और मूल्य संवर्द्धन पर जोर दे रही है।

    लेकिन, इन तमाम दावों के बीच पलायन निवारण आयोग की हालिया रिपोर्ट ने कृषि क्षेत्र की बेहद चिंताजनक और कड़वी हकीकत सामने रखी है। इसके मुताबिक वर्ष 2016-17 से 2021-22 के बीच पांच वर्ष में राज्य में मंडुवे और झंगोरा के रकबे में 27-27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

    पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट में सामने आई बात

    आयोग की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में वर्ष 2016-17 में मंडुवे का रकबा 1,06,385 हेक्टेयर था, जो 2021-22 में घटकर 77,927 हेक्टेयर रह गया। यानी पांच वर्षों में 28,438 हेक्टेयर भूमि पर मंडुवे की खेती पूरी तरह समाप्त हो गई। इसी प्रकार झंगोरे का रकबा भी इन पांच वर्षों में 51,410 हेक्टेयर से घटकर 37,594 हेक्टेयर रह गया है। ऐसे में श्रीअन्न की इन मुख्य फसलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

    यह हैं मुख्य कारण

    पलायन निवारण आयोग के उपाध्यक्ष डॉक्टर एसएस नेगी अनुसार गांवों से पलायन, वन्यजीवों से फसल क्षति, मौसम की बेरुखी, सिंचाई सुविधाओं का अभाव और कृषि कार्यों में श्रमिकों की कमी जैसे कारणों के चलते मंडुवा, झंगोरा समेत अन्य फसलों का रकबा घट रहा है। इसके चलते कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो रही है। यह चिंताजनक है।

    खबरें और भी

    यह भी पढ़ें- शहरवासियों का इंतजार खत्म, आज से ग्रेटर आगरा की नर्मदापुरम और गंगापुरम टाउनशिप में आवासीय भूखंंडों की बुकिंंग शुरू

    आर्थिकी के लिए खतरे की घंटी

    गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के विज्ञानियों डॉ. वीरेंद्र सिंह और डा.श्याम मणि त्रिपाठी के हालिया शोध में भी खेती के घटते रकबे के लिए उक्त बिंदुओं को इंगित किया गया है। विज्ञानियों के अनुसार खेती में श्रम की बढ़ती लागत, कमजोर बाजार तंत्र, सीमित मशीनीकरण के कारण किसान इस पोषणयुक्त फसल से दूर हो रहे हैं। यह राज्य की आर्थिकी के लिए एक खतरे की घंटी है।

    जिलेवार मंडुवा, झंगोरा के क्षेत्रफल में बदलाव (हेक्टेयर में)

    • जिला, मंडुवा, झंगोरा
    • चमोली, 04, 36
    • देहरादून, (-487), (-125)
    • पौड़ी, (-9801), (-6264)
    • रुद्रप्रयाग, (-625), 507
    • टिहरी, (-4166), (-4096)
    • उत्तरकाशी, 58, 122
    • अल्मोड़ा, (-9108), (-2876)
    • बागेश्वर, (-672), (-202)
    • चंपावत, (-1857), (-168)
    • नैनीताल, (-945), (-353)
    • पिथौरागढ़, (-843), (-397)
    • ऊधम सिंह नगर, 04, 00

    यह भी पढ़ें- बाइक-स्कूटी पर किए खतरनाक स्टंट, आगरा ट्रैफिक पुलिस ने काटा 37,500 का भारी भरकम चालान

    'मंडुवा, झंगोरा समेत मिलेट फसलों का रकबा बढ़ाने के लिए मिलेट नीति लागू की गई है। 10 वर्ष में इन फसलों का रकबा 70 हजार हेक्टेयर बढ़ाने का लक्ष्य है। इसके लिए प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। परती भूमि में भी मिलेट फसलों को उगाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।'

    -

    दिनेश कुमार, निदेशक, कृषि विभाग।