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मसूरी का 15 फीसदी इलाका भूस्खलन की जद में, अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

Published: Mon, 27 Jul 2026 06:44 AM (IST)

मसूरी और आसपास का 15% क्षेत्र भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, यह खुलासा वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन में हुआ है।

यह तस्वीर AI जेनेरेटेड है

यह तस्वीर AI जेनेरेटेड है

HighLights

  1. मसूरी का 15% क्षेत्र भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील।

  2. वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन में सामने आई हकीकत।

  3. अनियोजित निर्माण, चट्टानों की दरारें बढ़ा रहीं भूस्खलन का खतरा।

सुमन सेमवाल, देहरादून। पहाड़ों की रानी मसूरी और उसके आसपास का करीब 15 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है। यह हकीकत वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानियों की ओर से किए गए विस्तृत भूगर्भीय अध्ययन में सामने आई है।

84 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में किए गए इस अध्ययन में विज्ञानियों ने पाया कि मसूरी के कई प्रमुख पर्यटन और आबादी वाले इलाके अत्यधिक और बहुत उच्च भूस्खलन संवेदनशील जोन में आते हैं। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'अर्थ सिस्टम साइंस' में प्रकाशित किया गया है।

अध्ययन के अनुसार, 84 वर्ग किमी क्षेत्र का उच्च-रिजोल्यूशन उपग्रह चित्रों और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआइएस) की मदद से विश्लेषण किया गया। इसमें सामने आया कि करीब 15 प्रतिशत क्षेत्र अत्यधिक और उच्च भूस्खलन संभावित, 29 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम और 56 प्रतिशत क्षेत्र कम से बहुत कम जोखिम वाले वर्ग में आता है।

यानी अध्ययन क्षेत्र का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी स्तर पर भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्र में है। विज्ञानियों ने जिन स्थानों को सबसे अधिक संवेदनशील पाया, उनमें भट्टाघाट, जार्ज एवरेस्ट, कैंपटी फाल, खट्टापानी, लाइब्रेरी रोड, गलोगीधार और हाथीपांव शामिल हैं। अध्ययन में बताया गया कि इन इलाकों की चट्टानें अत्यधिक दरारयुक्त क्रोल लाइमस्टोन से बनी हैं तथा यहां ढाल 60 डिग्री से अधिक है। यही कारण है कि भारी वर्षा या मानवीय हस्तक्षेप होने पर इन क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।

सड़क और अन्य अनियोजित निर्माण ने बढ़ाई चुनौती

शोधकर्ताओं ने भूस्खलन के पीछे कई भूगर्भीय और मानवीय कारणों की भी पहचान की। इनमें चट्टानों की संरचना, भूमि उपयोग में बदलाव, तीखी ढाल, ढाल की दिशा, ऊंचाई, सड़क कटिंग, जल निकासी और भूगर्भीय दरारें प्रमुख हैं। विज्ञानियों ने इन सभी कारकों का संयुक्त विश्लेषण कर लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी इंडेक्स (एलएसआई) तैयार किया, जिससे पूरे क्षेत्र को पांच जोखिम श्रेणियों में बांटा गया।

अध्ययन का मॉडल माना गया सफल

अध्ययन की विश्वसनीयता जांचने के लिए विज्ञानियों ने सक्सेस रेट कर्व (एसआरसी) और प्रिडिक्शन रेट कर्व (पीआरसी) का उपयोग किया। इसमें एसआरसी का एरिया अंडर कर्व (एयूसी) 0.75 और पीआरसी का एयूसी 0.70 प्राप्त हुआ, जिसे विज्ञानियों ने अच्छा पूर्वानुमान स्तर माना है। इसका अर्थ है कि तैयार किया गया जोखिम मानचित्र वास्तविक भूस्खलन वाले क्षेत्रों से काफी हद तक मेल खाता है।

तेजी से हो रहे निर्माण, मानकों का पालन आवश्यक

विज्ञानियों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन तेजी से हो रहे निर्माण कार्य, सड़क चौड़ीकरण और अनियोजित विकास ने इसके खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। विज्ञानियों का मानना है कि यह अध्ययन केवल मसूरी ही नहीं, बल्कि प्रदेश और देश के अन्य पर्वतीय शहरों के लिए भी भूस्खलन जोखिम, खतरा और संवेदनशीलता का आधार बन सकता है।

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