हिमालय में 24,440 ग्लेशियर झीलें, बेहद खतरनाक जोन में 221 लेक; पिघले तो बह जाएंगे पुल और बिजली प्रोजेक्ट्स
वाडिया संस्थान के अध्ययन में हिमालय में 24,440 हिमनदीय झीलें मिलीं, जिनमें से 221 बेहद खतरनाक स्थिति में हैं। इन झीलों के फटने से निचले इलाकों में आबा ...और पढ़ें

हिमालय में 24,440 ग्लेशियर झीलें।
HighLights
वाडिया संस्थान ने हिमालय में 24,440 हिमनदीय झीलें खोजीं।
इनमें से 221 झीलें बेहद खतरनाक स्थिति में हैं।
निचले क्षेत्रों में आबादी, परियोजनाओं पर जीएलओएफ का खतरा।
सुमन सेमवाल, देहरादून। हिमालय में हिमनदों के पीछे हटने के साथ केवल बर्फ ही नहीं घट रही, बल्कि उसके पीछे और आसपास बनने वाली झीलों का स्वरूप भी बदल रहा है। इस बदले आकार को समझने के लिए जब वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने अध्ययन किया तो हिमालय में 24 हजार, 440 ग्लेशियर झीलों की उपस्थिति पाई गई। इनमें से 221 झीलें बेहद खतरनाक स्थिति में है।
इस अध्ययन को हाल में अंतरराष्ट्रीय जर्नल जियोमैटिक्स, नेचुरल हैजर्ड्स एंड रिस्क में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन में वाडिया संस्थान के लितान मोहंती ने मुख्य शोधार्थी, जबकि सहलेखक की भूमिका में प्रतीक गंतायत (आस्ट्रिया स्थित इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड टेक्नोलाजी के विज्ञानी) रहे।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग वर्षों में किए गए पांच बड़े हिमनदीय झील अध्ययनों के आंकड़ों को एक साथ रखा। इनके आधार पर हिमालय में 24,440 हिमनदीय झीलों की पहचान की गई।
इनमें लगभग 12,100 सुप्राग्लेशियल झीलें हैं, यानी ऐसी झीलें जो ग्लेशियर की सतह पर बनती हैं। बाकी झीलों में ग्लेशियर के आगे बनी प्रोग्लेशियल झीलें, अपरदन से बनी झीलें, चट्टानी बांध वाली और घाटी अवरुद्ध झीलें आदि शामिल हैं।
10 हजार से अधिक झीलें 0.01 वर्ग किमी से बड़ी
अध्ययन में 10,101 झीलों का क्षेत्रफल 0.01 वर्ग किलोमीटर से अधिक पाया गया। वहीं, अधिकतर झीलें 4,500 से 5,500 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित पाई गईं। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया कि झीलों की संख्या और कुल क्षेत्रफल समय के साथ बढ़ रहे हैं। यह वृद्धि 17 से 76 प्रतिशत के बीच पाई गई।
यहां सबसे अधिक विस्तार
बेसिन स्तर पर झीलों के क्षेत्रफल में बदलाव की सबसे ऊंची दर कोसी, यारलुंग जांगबो, मानस, कर्णाली, ऊपरी सिंधु और तीस्ता बेसिनों में मिली। शोधकर्ताओं ने इन्हें भविष्य में जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) की दृष्टि से अधिक संवेदनशील क्षेत्र माना है।
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झीलों का विस्तार विशेष रूप से 4,000-5,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र में अधिक पाया गया। अध्ययन के सबसे अहम निष्कर्ष में से एक अलग-अलग पूर्व अध्ययनों में चिह्नित संवेदनशील झीलों को एक साथ मिलाकर 221 महत्वपूर्ण झीलों की पहचान रहा।
यहां सर्वाधिक संवेदनशील झीलें
| क्षेत्र / नदी बेसिन | संख्या / मान |
|---|---|
| कोसी बेसिन | 47 |
| यारलुंग जांगबो | 22 |
| तीस्ता | 22 |
| मानस | 21 |
| छिंगहाई-तिब्बती क्षेत्र | 15 |
| पंचनद | 12 |
| फेलकू | 8 |
खतरा सिर्फ झील फटने से नहीं, नीचे मौजूद लोगों के लिए है
विज्ञानियों ने केवल यह नहीं देखा कि झील कितनी बड़ी है, उन्होंने यह भी देखा कि यदि झील फटती है तो उसके नीचे कितनी आबादी, कितनी सड़कें, रेलवे, इमारतें और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
इसके लिए अध्ययन में भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी जीआइएस और एएचपी एनालिटिकल हायरार्की प्रोसेस का इस्तेमाल किया गया। लिहाजा, संस्तुति की गई कि जिन संवेदनशील बेसिन के निचले क्षेत्रों में आबादी अधिक है, वहां निगरानी उच्च स्तरीय होनी चाहिए।
कश्मीर से सिक्किम तक उच्च खतरा
संयुक्त खतरा मानचित्र में भारत के चेनाब और झेलम बेसिन (कश्मीर), चेनाब और ब्यास बेसिन (हिमाचल प्रदेश) तथा तीस्ता बेसिन (सिक्किम) को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया।
इसी तरह नेपाल में कोशी, तामाकोशी और दूधकोशी, जबकि भूटान में मानस बेसिन की कुरी चू उप-बेसिन उच्च खतरे वाले क्षेत्र के रूप में सामने आए। इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण झीलों की संख्या, संभावित बाढ़ मात्रा और आबादी तथा बुनियादी ढांचे का मेल खतरे को बढ़ाता है।
उत्तराखंड उच्च जोखिम में नहीं, पर खतरा बरकरार
अध्ययन में हिमालय के दक्षिणी हिस्से में जलविद्युत परियोजनाओं का भी विस्तृत डेटाबेस बनाया गया। शोधकर्ताओं ने कुल 1,242 जलविद्युत परियोजनाओं की पहचान की। इनमें सबसे ज्यादा परियोजनाएं ब्यास बेसिन में 384, रवि में 183, टौंस में 106, चेनाब में 58, तीस्ता में 55, काली में 40, सतलुज में 39, अलकनंदा में 32, भागीरथी में 31 और झेलम में 28 दर्ज हुईं।
इस लिहाज से उत्तराखंड को अध्ययन ने अलग से सर्वाधिक जोखिम वाला राज्य घोषित नहीं किया है, लेकिन यहां आबादी और जलविद्युत ढांचे की मौजूदगी के कारण जीएलओएफ जोखिम आकलन महत्वपूर्ण है। अध्ययन में आबादी घनत्व के मामले में नेपाल के बाद हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और भूटान को उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में रखा गया है।
पुरानी जीएलओएफ घटनाओं से भी तुलना
विज्ञानियों ने अपने खतरा आकलन की विश्वसनीयता जांचने के लिए वर्ष 1533 से 2024 के बीच दर्ज हिमालयी जीएलओएफ घटनाओं का डेटाबेस इस्तेमाल किया। इसमें 254 घटनाएं शामिल थीं। इनमें से लगभग 72.4 प्रतिशत यानी 184 घटनाएं उन बेसिनों में हुईं, जिन्हें इस अध्ययन के मॉडल ने अत्यधिक उच्च या उच्च खतरे वाली श्रेणी में रखा था।
इसके विपरीत केवल 0.39 प्रतिशत घटनाएं कम खतरे वाली श्रेणी में आने वाले बेसिनों में दर्ज हुईं। शोधकर्ताओं ने इसे अपने खतरा आकलन की मजबूती का महत्वपूर्ण संकेत माना है।
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