चारधाम यात्रा 2026: धामों के अलावा उत्तराखंड के इन जगहों को भी करें एक्सप्लोर
उत्तराखंड की चारधाम यात्रा 19 अप्रैल से शुरू हो रही है। यह लेख केवल धामों के दर्शन से परे, यात्रा को और समृद्ध बनाने वाले महत्वपूर्ण पड़ावों पर प्रकाश ...और पढ़ें

19 अप्रैल को यमुनोत्री व गंगोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ उत्तराखंड हिमालय की चारधाम यात्रा शुरू हो रही है। वहीं, 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बदरीनाथ धाम के कपाट खुलेंगे।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
दिनेश कुकरेती, देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की चारधाम यात्रा 19 अप्रैल को यमुनोत्री व गंगोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ शुरू हो रही है।
22 अप्रैल को केदारनाथ धाम और 23 अप्रैल को बदरीनाथ धाम के कपाट खोले जाएंगे। यह चारधाम यात्रा आस्था का सबसे बड़ा मार्ग मानी जाती है, लेकिन यह केवल धामों तक पहुंचने भर की यात्रा नहीं है।

इन रास्तों में ऐसे अनेक पड़ाव हैं, जो इस यात्रा को और समृद्ध करते हैं। केदारनाथ की ओर बढ़ते हुए त्रियुगीनारायण और चौराबाड़ी ताल जैसे स्थल जहां इतिहास और आस्था का संगम दिखाते हैं, वहीं भैरवनाथ मंदिर और रुद्र गुफा जैसे स्थान आत्मिक शांति का अनुभव कराते हैं।
बदरीनाथ मार्ग पर औली, ज्योतिर्मठ और बामणी गांव प्रकृति और लोकसंस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करते हैं, तो माणा गांव और वसुधारा जलप्रपात यात्रा को एक अलग ही विस्तार देते हैं।

यदि यात्री इन पड़ावों को समझते हुए रुक-रुक कर यात्रा करें, तो चारधाम केवल दर्शन नहीं, बल्कि एक गहरी अनुभूति में बदल सकती है।

ऊंचे-ऊंचे पहाड़, हरियाली से लकदक जंगल, हिमाच्छादित चोटियां, खूबसूरत नौले, ताल व बुग्याल, अथाह जलराशि लिए गहरी सर्पाकार घाटियों से कल-कल आगे बढ़ती नदियां, मंद-मंद बहती शीतल पवन और लोकजीवन की मनोहारी झांकियां इस यात्रा को और भी रसमय बना सकती हैं।

इतिहास, संस्कृति और परंपरा के दर्शन
चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव है उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री धाम, जहां बड़कोट होते हुए पहुंचा जाता है।
बड़कोट के इर्द-गिर्द यमुना नदी के किनारे लाखामंडल, थान गांव, गंगनानी, तिलाड़ी का मैदान, यमुना का शीतकालीन प्रवास स्थल खरसाली, गुलाबी कांठा जैसे पर्यटन स्थलों की सैर एक-दो घंटे में की जा सकती है।
खासकर गुलाबी कांठा समुद्रतल से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर आनंद की अनुभूति कराने वाला बुग्याल है।

प्रकृति में डूबने का एहसास
यात्रा के दूसरे पड़ाव गंगोत्री धाम का रास्ता जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से होकर जाता है। गंगोत्री धाम के आसपास तो प्रकृति ने खुले हाथों नेमतें बिखेरी हैं।
गंगोत्री से 33 किमी दूर मां गंगा का शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा गांव है और मुखवा के पास ही मार्कंडेयपुरी।
लंबे सफर के इच्छुक नहीं हैं तो जाह्नवी व भागीरथी नदी के संगम पर स्थित भैरों घाटी, हर्षिल, केदारताल, नंदनवन, चीड़बासा, भोजबासा आदि मनोरम स्थलों की सैर भी कर सकते हैं। नंदनवन से तो आपका लौटने का मन ही नहीं करेगा।

गर्तांग गली
ऐतिहासिक गर्तांग गली जाने के लिए आपको गंगोत्री धाम से 12 किमी पहले लंका पहुंचना होगा। लंका से ढाई किमी की दूरी पर जाड़ गंगा घाटी में गर्तांगली मौजूद है।
वर्ष 1962 से पहले भारत-तिब्बत के बीच व्यापारिक गतिविधियों के संचालन को उत्तरकाशी पहुंचने का गर्तांगली ही एकमात्र मार्ग हुआ करता था।

त्रियुगीनारायण
यात्रा के तीसरे पड़ाव रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ धाम का रास्ता गौरीकुंड से होकर जाता है। आप धाम से तीन किमी ऊपर चौराबाड़ी ताल (गांधी सरोवर) की सैर भी कर सकते हैं।
यह वही झील है, जो जून 2013 में केदारनाथ धाम समेत केदारघाटी की तबाही का कारण बनी थी।
केदारनाथ धाम से लौटते हुए वक्त मिले तो त्रियुगीनारायण की सैर यात्रा को यादगार बना देगी। मान्यता है कि यहीं भगवान शिव और देवी पार्वती परिणय सूत्र में बंधे थे।

भैरवनाथ मंदिर और रुद्र गुफा
केदारनाथ धाम में केदारपुरी के रक्षक बाबा भैरवनाथ मंदिर में दर्शन नहीं किए तो क्या किया। मंदाकिनी नदी के दूसरी ओर दुग्ध गंगा के पास पहाड़ी पर स्थित रुद्र गुफा भी आपके स्वागत को तैयार है।
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वापसी में आप गुप्तकाशी स्थित विश्वनाथ मंदिर और ऊखीमठ पहुंचकर पंचगद्दी स्थल ओंकारेश्वर धाम के भी दर्शन कर सकते हैं। मां काली का धाम कालीमठ भी गुप्तकाशी के पास ही पड़ता है।

औली की सैर
यात्रा का अंतिम पड़ाव चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम ज्योतिर्मठ से महज 45 किमी की दूरी पर है। ज्योतिर्मठ स्थित बदरीनाथ धाम के शीतकालीन गद्दीस्थल भगवान नृसिंह के दर्शन कर विश्व प्रसिद्ध स्कीइंग स्थल औली की सैर की जा सकती है।
बदरीनाथ धाम के पास ही एक किमी की दूरी पर नंदा देवी का मायका बामणी गांव है। यहां देवी उर्वशी और भगवान नारायण की जन्म स्थली लीलाढुंगी के दर्शन आपकी यात्रा को यादगार बना देंगे।

देश का प्रथम गांव माणा
बदरीनाथ धाम से तीन किमी आगे चीन सीमा पर देश के प्रथम गांव माणा में भोटिया जनजाति के परिवार रहते हैं, जो बदरीनाथ धाम के हक-हकूकधारी भी हैं। माणा गांव के पास माता मूर्ति मंदिर और भीमपुल की यात्रा भी दिव्यता की अनुभूति कराती है।
माणा गांव के उत्तर में गणेश गुफा, माणा गांव के ऊपर 200 मीटर की दूरी पर व्यास गुफा और बदरीनाथ से एक किमी दूर नारायण पर्वत पर भृगु गुफा मौजूद है। माणा गांव से आठ किमी दूर 122 मीटर ऊंचा जल प्रपात है, जिसे वसुधारा नाम से जाना जाता है।

मौसम
चारों धाम समुद्रतल से दस हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हैं। यहां मौसम पल-पल रंग बदलता रहता है और कभी भी वर्षा और बर्फबारी होने लगती है।
इसलिए यहां आने के लिए गर्म कपड़े और जरूरी दवाइयां साथ लेकर चलें। यात्रा से पूर्व स्वास्थ्य की जांच भी अनिवार्य रूप से करा लें।

खाने-ठहरने की सुविधा
चारधाम के पड़ावों पर होम स्टे, होटल व धर्मशालाओं की कमी नहीं है। यहां आप पारंपरिक व्यंजन मंडुवे की रोटी, हरा नमक, तिल, भट व भांग की चटनी, आलू के गुटखे, पहाड़ी राजमा, उड़द व कुलथ की दाल, आलू का थिंचोंणी, फाणू, चैंसू, कंडाली का साग, झंगोरे की खीर, पिंडालू के पत्यूड़, भरवां परांठे, दाल के पकौड़े, रोट, अरसा आदि का जायका भी ले सकते हैं।
चारधाम पहुंचने के लिए देहरादून से हेली सेवा और ऋषिकेश से यात्री वाहन सुविधा उपलब्ध है। हां! यह जरूर ध्यान रहे कि आपका न्यूनतम उत्तराखंड प्रवास कम से कम सप्ताहभर का तो होना ही चाहिए और अगर आप चारों धाम में दर्शन के इच्छुक हैं तो प्रवास की अवधि 12 से 15 दिन होनी जरूरी है।