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    वाराणसी में तारीख पर तारीख, शहीद उद्यान अब भी अधूरा, 7.50 करोड़ की योजना पर नगर निगम की उदासीनता

    By Vns Arun Mishra Edited By: Abhishek sharma
    Updated: Tue, 11 Aug 2026 11:48 AM (IST)

    वाराणसी के सिगरा स्थित शहीद उद्यान पार्क का 7.5 करोड़ का जीर्णोद्धार कार्य तय समय सीमा के बाद भी अधूरा है। नगर निगम की उदासीनता और कार्यदायी संस्था की ...और पढ़ें

    वाराणसी के शहीद उद्यान पार्क का 7.5 करोड़ का प्रोजेक्ट अटका, नगर निगम की उदासीनता।

    वाराणसी के शहीद उद्यान पार्क का 7.5 करोड़ का प्रोजेक्ट अटका, नगर निगम की उदासीनता।

    HighLights

    1. शहीद उद्यान पार्क, सिगरा का जीर्णोद्धार कार्य अधूरा।

    2. 7.5 करोड़ रुपये की परियोजना तय समय से पीछे।

    3. नगर निगम की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में विकास की चमकदार तस्वीर के बीच शहीद उद्यान पार्क, सिगरा की हकीकत सरकारी उदासीनता की कहानी कह रही है। जिस काम की स्वीकृति चार जून 2025 को मिली, उसे एक दिसंबर 2025 से शुरू होकर 30 जून 2026 तक पूरा हो जाना था, लेकिन तय समय सीमा गुजरने के बाद भी पार्क अपने पुराने हाल में है।

    यानी कागज पर तय टाइमलाइन खत्म हुए डेढ़ महीने से अधिक हो चुके हैं, मगर काम की तस्वीर सवाल खड़े कर रही है। नगर निगम की ओर से पार्क के जीर्णोद्धार के लिए करीब 7.50 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की गई है। दस्तावेज में कुल लागत 750 लाख रुपये दर्ज है, जबकि मौके पर लगाए गए बोर्ड पर जीएसटी समेत लागत 748.93 लाख रुपये बताई गई है।

    करीब 2014.7 वर्गमीटर क्षेत्र में विकसित होने वाले पार्क में तीन मीटर चौड़ा सिंथेटिक जॉगिंग ट्रैक, पक्के पैदल मार्ग, बच्चों के खेलने का क्षेत्र, ओपन जिम, योग एवं ध्यान स्थल और म्यूजिकल फाउंटेन जैसी सुविधाएं प्रस्तावित हैं। लेकिन सवाल सिर्फ कार्यदायी संस्था सुदामा कंस्ट्रक्शन एन्ड बिल्डर्स लखनऊ की धीमी रफ्तार का नहीं है। नगर निगम की निगरानी और जवाबदेही भी कटघरे में है।

    जब कार्य पूरा करने की अंतिम तारीख 30 जून 2026 तय थी तो समय सीमा खत्म होने के बाद भी मौके पर काम की प्रगति क्यों नहीं दिखाई दे रही? कार्यदायी संस्था से समय विस्तार, प्रगति और देरी का कारण पूछा गया या नहीं? यदि काम तय मानकों और समयसीमा के अनुरूप नहीं हुआ तो नगर निगम ने अब तक क्या कार्रवाई की?

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    मौके का बोर्ड सरकारी दावे और जमीन की हकीकत के बीच खड़ी खामोशी का दस्तावेज बन गया है। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में करोड़ों की योजना की समयसीमा बीत जाए और जिम्मेदार महकमे की सक्रियता नजर न आए, तो सवाल सिर्फ पार्क का नहीं, निगरानी तंत्र की कार्यशैली का भी है।