यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 30, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
गोबर, मैला, नीम की खली, इनसे खेती दूनी फली
जैविक खादों में सबसे अछी होती है गोबर की खाद दूना होता है पैदावार

विजय द्विवेदी, श्रावस्ती : जेकरे खेत में पड़ा गोबर, उस किसान को जानो दूबर। घाघ कहते हैं कि जिस किसान के खेत में गोबर की खाद नहीं पड़ी वह गरीब व दरिद्र है। गोबर, मैला, नीम की खली, इनसे खेती दूनी फली। यानी गोबर मैला और नीम की खली खेतों में छोड़ने से पैदावार दूना होता है। जब खेत में गोबर, मैला व पत्तियां सड़ती हैं तब खेतों में दाना पड़ता है। यानी पैदावार अच्छी होती है। घाघ यह भी कहते हैं कि खाद घूरा न टरै, कर्म लिखा टर जाय। यानी खेत में लगे खाद के कूरे, खेत या उसके ढेरों के स्थान पर अच्छी पैदावार होने से कोई टाल नहीं सकता है, जो किसान अपने खेत में गोबर, चोकर व अरूसा नहीं छोड़ता उसमें अन्न कौन कहे भूसा भी नहीं होता है। जी हां घाघ ने इन कहावतों के माध्यम से जो खेती-किसानी के बारे में बताया है उसे परंपरा के साथ अब वैज्ञानिक भी मान रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. उमेश कुमार कहते हैं कि अगर किस्मत पलटना है तो गोबर की खाद से खेती करें। गोबर की खाद जैविक खादों में सबसे अच्छी होती है। यह किसानों को सरलता से मिल जाती है। इस खाद से पौधों को आहार के सभी तत्व मिल जाते हैं।
गोबर की खाद से बढ़ती है पैदावार
पौधों की वृद्धि के लिए छह तत्वों की जरूरत होती है। इसमें नत्रजन, स्फोरकार्बन, हाईड्रोजन, ऑक्सीजन, पोटास, चूना, लोहा, मैग्नीशियम, गंधक, जस्ता, मैग्नीज व बारेन शामिल हैं। इसमें से कार्बन हाईड्रोजन व ऑक्सीजन तत्वों को छोड़कर सभी मिट्टी से प्राप्त होती है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. कुमार बताते हैं कि गोबर की खाद से मिट्टी की संरचना बरकरार रहती है। नाइट्रोजन के प्रयोग से फसलों में कीट अधिक लगते हैं, जिसका असर पैदावार पर पड़ता है।
जैविक होती है गोबर की खाद
जिला कृषि अधिकारी आरपी राना बताते हैं कि गोबर की खाद जैविक होती है। इसमें सभी पोषक तत्व पाए जाते हैं। गोबर खाद से पौधों का बढ़वार व रोग लगने की संभावना बिल्कुल नहीं होती है। खेत में नमी बरकरार रहती है। इसके प्रयोग से मिट्टी की संरचना प्रभावित नहीं होती है, जबकि रसायनिक खाद से भूमि की संरचना प्रभावित होती है।
