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    15 अगस्त को नहीं, 30 जून 1949 को आजाद हुआ था यूपी का यह शहर; जानें दंगों, कर्फ्यू और विलय का पूरा इतिहास

    Updated: Thu, 13 Aug 2026 06:21 PM (IST)

    देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, लेकिन यूपी का रामपुर 30 जून 1949 को! जानें 2 साल की देरी, भीषण हिंसा, दंगे, मार्शल लॉ और नवाब रजा अली खान से लेकर सरदार ...और पढ़ें

    गांधी समाधि।

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    1. देश को मिली आजादी के समय यहां हुआ था बवाल, 31 अगस्त तक शहर में लगा था कर्फ्यू

    जागरण संवाददाता, रामपुर। देश भर में 15 अगस्त को आजादी का 79वां जश्न मनाया जाएगा, लेकिन रामपुर में यह 77वां आजादी का साल होगा। दरअसल, इस जिले को आजादी दो साल बाद मिली थी। रामपुर में करीब पौने दो सौ साल तक नवाबी रियासत का दौर रहा। रजा लाइब्रेरी में मौजूद गजट और इतिहासकारों के अनुसार 15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होने के बाद भी रामपुर में नवाबों की रियासत थी।

    उस दिन देश भर में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था। रामपुर में आजाद नहीं हो सका था। यहां लोग आजादी की मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे। देश के आजाद होने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल पहले गृहमंत्री बने थे।

    उनको देश में उस वक्त की मौजूद रियासतों का विलय कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने रामपुर की रियासत का विलय कराने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। उनकी मेहनत रंग लाई। रियासत के अंतिम शासक नवाब रजा अली खान थे, जिन्होंने भारत में विलय के समझौते पर 15 मई 1949 को हस्ताक्षर किए।

    30 जून 1949 नवाबी हुकूमत का अंतिम दिन था और पहली जुलाई 1949 को रामपुर आधिकारिक रूप से स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया और उत्तर प्रदेश का जिला घोषित किया गया था। तब से यहां गांधी समाधि पर हर साल 15 अगस्त को ध्वजारोहण किया जाता है।

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    शहर में लगा था कर्फ्यू और मार्शल ला

    रामपुर में करीब पौने दो सौ साल तक नवाबों का राज रहा। अगस्त 1947 में रामपुर में नवाब रजा अली खां का शासन था। कर्नल बशीर हुसैन जैदी उनके मुख्यमंत्री थे।

    शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता शौकत अली खां द्वारा लिखी रामपुर का इतिहास किताब के अनुसार दो अगस्त 1947 को मुस्लिम कांफ्रेस ने शहर की जामा मस्जिद में मीटिग करने की घोषणा की, लेकिन सरकार ने उसी दिन धारा 144 लागू कर इस पर रोक लगा दी।

    इसके विरोध में मुस्लिम कांफ्रेंस ने गिरफ्तारी देनी शुरू कर दी। लोगों ने प्रदर्शन भी किया, जिस पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया था। कुछ छात्रों को भी पुलिस ने पीट दिया था। इसके विरोध में छात्रों ने जुलूस निकाला तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया था।

    घटना के विरोध में चार अगस्त को छात्रों ने मोती मस्जिद के पास सभा की थी। इसके बाद जुलूस निकालने लगे। छात्र और पुलिस आमने सामने आ गई। पुलिस ने गोली चलाई तो छात्रों ने पथराव किया। कई छात्र मारे गए। इसके बाद शहर के तमाम लोग आक्रोशित हो गए।

    कई दिन तक जमकर उत्पात मचाया। कई पुलिस कर्मियों समेत दो दर्जन लोग मारे गए। उन अफसरों और पुलिस वालों के घरों को भी फूंक दिया गया, जिनकी गोली से छात्र मरे थे। हाई कोर्ट जला दिया गया।

    रियासत के गृहमंत्री इरशाद उल्लाह खां की कार को फूंक दिया। कई पुलिस वाले भी मारे गए थे। हालात बिगड़ते देख शहर में कर्फ्यू लगाने के साथ ही मार्शल ला लागू कर दिया गया। 31 अगस्त तक तमाम दफ्तर भी बंद रहे।

    शौकत अली खां की किताब के मुताबिक मुख्यमंत्री कर्नल बशीर हुसैन जैदी ने कुछ आसमाजिक तत्वों से पाकिस्तान में शामिल होने के नारे लगवाए और फिर इस आरोप में रियासत का विरोध कर रहे लोगों को गिरफ्तार करा दिया था।

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